10 अक्टूबर, 2017 को नई दिल्ली में श्री नरेन्द्र मोहन स्मारक व्याख्यान में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

नई दिल्ली | अक्टूबर 10, 2017

बदलते सामाजिक परिवेश में नए भारत के निर्माण की चुनौतियां

मित्रों,
आज मुझे खुशी हो रही है कि दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक स्व. नरेन्द्र मोहन की स्मृति में आयोजित व्याख्यान माला में मुझे आपने आमंत्रित किया।

नरेन्द्र मोहन जी को एक प्रखर संपादक के रूप में, एक प्रतिभाशाली वक्ता के रूप में, एक क्रियाशील सांसद के रूप में बहुत अच्छी तरह जानता हूं। उनसे मेरा परिचय बहुत साल पुराना है।

उनके संपादन में निकलने वाले दैनिक जागरण से पहले से परिचित था लेकिन उनसे बात-मुलाकात का अवसर तब मिला जब मैं राज्य सभा का सदस्य बना।

वैसे 2 साल पहले 1996 में राज्य सभा के सदस्य बन चुके थे। जब भी अवसर मिलता था तो मैं उनके विचारों को ध्यानपूर्वक सुनता था और आनंद पाता था।

वे अपनी बात तर्कों के साथ, तथ्यों के साथ प्रस्तुत करते थे। उनके विचार प्रवाह से मैं बहुत प्रभावित हो गया। उनके विचारधारा से बहुत लोग लाभान्वित हुए।

मुझे आज इस महान व्यक्ति के स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने का जो अवसर आपने प्रदान किया है उसके लिए बहुत आभारी हूं।

नरेन्द्र मोहन जैसे महान व्यक्तियों के बारे में जब हम सोचते हैं तो बहुत प्रेरणा मिल जाती है। हमारे समाज और देश में समस्याएं और चुनौतियों का समाधान ढ़ूढ़ने में मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

हम सब मानते हैं और जानते हैं कि भारत देश सुसंपन्न, समृद्ध देश था, लेकिन कई परिवर्तन आए और देश में सामाजिक परिवेश बदल गया। विश्व में भी बहुत परिवर्तन हुआ।

बहुत देश हमारे देश से बहुत आगे निकल गए। हम पिछड़ गए। हम आजाद तो हो गए लेकिन आजादी के फल पूरी तरह हमारे लोगों को नहीं पहुंचा सके। प्रयत्न तो बहुत करते रहे और आज भी कर रहे हैं लेकिन जिस संकल्प से भारत को विदेशियों के पकड़ से मुक्त कराई, उस दृढ़ संकल्प पर हम सुदृढ़ नहीं रह पाए। ढीलापन आ गया, कभी निराशा, कभी उदासीनता। इसलिए हम आज इस परिस्थिति में हैं। गरीबी, गंदगी, दूषण, प्रदूषण, अस्वस्थता, अनर्थकारी हिंसा, अशिक्षित समाज, असमानताएँ। ये सब आज हमारे सामाजिक चित्रपट में पहचान सकते हैं। इस चित्रपट को बदलना है। इन चुनौतियों को देखकर पीछे हटना नहीं चाहिए। आगे बढ़ने की क्षमता, शक्ति हममे है। पिछले हजारों वर्षों से जो संस्कार और विचारधारा और विकासशील कार्योन्मुखता हमारे पूर्वजों ने हमें दिया वह हमारे लिए प्रेरणास्रोत बनना चाहिए।

भारत की पुनर्निर्माण कार्य एक पुनीत कार्य है। इसमें सबका योगदान होना चाहिए। नरेन्द्र मोहन जी जैसे निर्भीक, कर्मठ पत्रकारों की भी विशेष भूमिका होनी चाहिए। सत्यनिष्टा से समाज को श्रेयस की ओर ले जाने वाले पत्रकारों की जरूरत है। पूरे समाज को एक और बार जागरूक कराना है। कार्योन्मुखी करना है। केवल बात करने से देश नहीं बदलेगा।

इसीलिए तेलुगु के प्रमुख कवि गुर्जाडा अप्पाराव जी ने कहा कि - च्वोट्टि माट्टलू कट्टि पेट्टोयि। गट्टि मेल तला पेट्टावोय।छ केवल बोलना बंद करके ठोस काम करना बहुत जरूरी है। अगर संकल्प से सिद्धि तक पहुंचना है तो हमें कार्यरत होना आवश्यक है। साधना की आवश्यकता है। परिश्रम की आवश्यकता है। वचनबद्धता और अनुशासन की आवश्यकता है।

नए भारत का अविष्कार होना चाहिए। आधुनिक विश्व के परिप्रेक्ष्य में भारत का रूप कल्पना हमें करना है। यह भव्य भारती कैसी होनी चाहिए। मेरे विचार में हमारा भारत - स्वच्छ और स्वस्थ्य भारत होना चाहिए। साक्षर और सक्षम भारत होना चाहिए। सुस्थिर और समरस भारत होना चाहिए। सश्य श्यामल और समृद्ध भारत होना चाहिए। सशक्त और सुखद भारत होना चाहिए।

भारत के अंदरूनी शक्ति को पुन: पहचानना और सही दिशा में प्रयोग करना आवश्यक है।

हमारे समाज में जो कमियां हैं, कमजोरियों हैं, उनको पहचानकर निर्मूलन करना हमारे लिए परम, पवित्र कर्तव्य बनना चाहिए। अच्छे विचारों से नीतियां बनाने होंगे। सच्ची श्रद्धा से उन नीतियों का आहरण आकरन होगा और समय-समय पर आत्मावलोकन करके कार्यक्रमों को बेहतर बनाना होगा। जनमत का आदर करते हुए जनहित ही हमारे परिप्रेक्ष्य हो तो हमें सफलता मिल सकती है। नव-भारत की ओर हिम्मत से आगे बढ़ सकते हैं। कामयाब हो सकते हैं।

अनेक महानुभाव हमारे इतिहास में आश्चर्यजनक उपलब्धियां प्राप्त करके हमारे लिए प्रेरणास्रोत बनते रहे हैं। उसी प्रेरणा से, उसी उत्साह से मैं आकांक्षा करता हूं कि हम मिलकर चुनौतियों का डटकर सामना करें और नव-भारत के दिव्यधाम का आविष्कार करें।
धन्यवाद।
जय हिन्द।