09 सितंबर, 2020 को नई दिल्ली में हिमालय दिवस के अवसर पर आयोजित एक वेबिनार में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | सितम्बर 9, 2020

बहनों और भाइयों,

हिमालय दिवस मनाने हेतु आप सभी के साथ जुड़ने पर मुझे हर्ष की अनुभूति हो रही है।

हिमालय हमारे लिए पारिस्थितिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

पुरातन काल से, यह भारत की प्राकृतिक सीमा रही है।

जैसा कि महान कवि कालीदास ने अपने महाकाव्य कुमारसंभव में लिखा है।

अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयों नाम नगाधिराजः।

(इस देश की उत्तरी सीमा पर हिमालय - पहाड़ों का राजा और देवताओं का निवास स्थान-स्थित है)।

ये ऊंची पर्वत श्रृंखलाएं हमारे देश को मध्य एशिया से आने वाली ठंडी और शुष्क हवाओं से बचाती हैं। ये मानसूनी हवाओं के लिए एक अवरोध के रूप में भी कार्य करती हैं और इस प्रकार उत्तर भारत में अधिकांश वर्षा करवाती हैं। इन श्रृंखलाओं के बिना भारत एक सूखा रेगिस्तान होता।

दक्षिण एशिया में जल, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के मामले में हिमालय के पारिस्थितिकीय तंत्रों का अपार योगदान है।

इस क्षेत्र के 54,000 से अधिक ग्लेशियर में लगभग 6,100 क्यूबिक किलोमीटर बर्फ के भंडार हैं, जो दो ध्रुवीय आवरणों के बाहर विश्व का सबसे बड़ा बर्फ का भंडार है। ये ग्लेशियर एशिया में 10 प्रमुख नदी प्रणालियों के स्रोत हैं, जो लगभग आधी मानवता के लिए जीवन रेखा है।

500 गीगावाट से अधिक जल विद्युत क्षमता के साथ हिमालय दक्षिण एशिया में ऊर्जा सुरक्षा में अहम भूमिका निभा सकता है। यदि समुचित दोहन किया जाए, तो यह जल विद्युत स्वच्छ ऊर्जा के लिए भरोसेमंद पहुंच प्रदान करते हुए पारंपरिक ईंधनों के उपयोग में कमी लाकर कार्बन उत्सर्जन में भी कमी ला सकती है।

यह क्षेत्र विविध पारिस्थितिकीय प्रणालियों में पौधों और जानवरों का एक समृद्ध भंडार है और इसे 36 वैश्विक जैव विविधता वाले प्रमुख स्थानों में से एक स्थान के तौर पर मान्यता प्रदान की गई है, जो इसके पारिस्थितिकीय महत्व को उचित रूप से दर्शाता है।

अपने विशाल हरित आवरण के साथ हिमालय कार्बन डाइऑक्साइड के लिए 'सिंक' के रूप में कार्य करता है।

हालांकि, हाल के दशकों में नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को विभिन्न प्रकार के दबाव और क्षय के जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है।

शोध से यह पता चला है कि 'वैश्विक तापवृद्धि के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि वर्ष 2000 से पहले, ग्लेशियर की सतह औसतन 22 सेंटीमीटर प्रति वर्ष तक पिघल रही थी ... जबकि वर्तमान शताब्दी में पिघलने की औसत दर दोगुनी होकर लगभग 43 सेमी प्रतिवर्ष हो गई है।

ग्लेशियर पिघलने की इस दर से उन लगभग 1.3 बिलियन लोगों के जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ने की संभावना है, जो पानी -पेयजल, सिंचाई और ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए इन पर निर्भर हैं।

प्रिय बहनों और भाइयों,

हम प्रकृति का इस तरह अनादर जारी नहीं रख सकते। यदि हम प्रकृति की उपेक्षा या अति-शोषण करते हैं तो हम अपने भविष्य के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं।

हमारे लिए हिमालय एक बहुमूल्य खजाना है। हमे उनकी रक्षा और संरक्षण करना चाहिए। वास्तव में, हमारी संस्कृति हमें यही शिक्षा देती है। हमें बेहतर भविष्य के लिए प्रकृति का सम्मान और संस्कृति का संरक्षण करना चाहिए।

हमें अपने विकास के प्रतिमान पर इस तरह से पुनर्विचार करना चाहिए कि मानव एवं प्रकृति का सह–अस्तित्व हो और दोनों एक साथ पल्लवित हो सकें।

विकास पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

सरकार ने हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षण और परिरक्षण के लिए कई कार्यक्रम प्रारंभ किए हैं। 'ए नेशनल मिशन फॉर सस्टेनिंग द हिमालयन इकोसिस्टम' की 'राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना' (एनएपीसीसी) के तहत आठ मिशनों में से एक मिशन के रूप में अभिकल्पना की गई है।

'सिक्योर हिमालय' भारत सरकार और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की एक और पहल है, जिसके लिए 'ग्लोबल एनवायरमेंट फैसिलिटी' द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। इसका उद्देश्य स्थानीय समुदायों के जीवन और आजीविका का संवर्धन करते हुए उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में जैव विविधता, भूमि और वन संसाधनों का संरक्षण करना है।

बहनों और भाइयों,

हमारे विकास संबंधी दृष्टिकोण में क्षेत्र की पारिस्थितिकी, पारंपरिक ज्ञान और संस्कृति को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इसके लिए श्री अनिल प्रकाश जोशीजी जैसे कई प्रतिबद्ध हरित कार्यकर्ताओं के प्रयासों के साथ ही सरकार में रमेशजी जैसे प्रबुद्ध नेताओं की आवश्यकता है।

स्थानीय समुदाय कृषि और अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए वनों पर निर्भर हैं और हमें एक ऐसा विकास मॉडल विकसित करने हेतु प्रयास करना चाहिए,जो आर्थिक गतिविधि और क्षेत्र के मौलिक पर्यावरण के बीच संतुलन कायम कर सके। यह न केवल हिमालयी राज्यों के लिए महत्वपूर्ण है, अपितु वहां से निकलने वाली नदियों पर निर्भर सभी उत्तर भारतीय राज्यों के भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण है।

किसी नाजुक पारिस्थितिकी में जैविक कृषि को बढ़ावा देना सबसे अच्छा तरीका हो सकता है। सिक्किम, मेघालय और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने इस दिशा में पहले ही प्रयास किए हैं लेकिन चुनौतियां अभी बनी हुई हैं। सरकारों, वैज्ञानिकों, विश्वविद्यालयों और अन्यों द्वारा इन चुनौतियों का समाधान खोजने के लिए और प्रयास किए जाने चाहिए।

हिमालय में पर्यटन आर्थिक विकास का एक और महत्वपूर्ण मार्ग है।। पर्यटक इन शानदार पहाड़ों में प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ पवित्र तीर्थयात्राओं के लिए भी आते हैं।

उत्तर भारत के अधिकांश खूबसूरत 'हिल स्टेशन' हिमालयी राज्यों में स्थित हैं और इसमें दुनिया की 10 में से 9 सबसे ऊंची चोटियाँ हैं, जो साहसिक खेलों के लिए भी पर्याप्त अवसर प्रदान करती हैं।

हमारे प्राचीन ऋषियों और मुनियों ने शांत और निर्मल हिमालय को अपनी 'तपोभूमि' बनाया और इसलिए यहां हमारे कई पवित्रतम मंदिर/पूजास्थल पाए जाते हैं। इसे भगवान शिव और देवी पार्वती, जिनके नाम का ही अर्थ है 'पहाड़ की बेटी,' का निवास माना जाता है।

हिमालय की इस आध्यात्मिक पहचान की ओर इंगित करते हुए भगवान कृष्ण ने स्वयं गीता के दसवें अध्याय में कहा है -

"अचल वस्तुओं में, मैं हिमालय हूं।"

इन महान पर्वत श्रृंखलाओं के पारिस्थितिकीय और आध्यात्मिक महत्व को ध्यान में रखते हुए, हमें पर्यटन के लिए पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित एक ऐसा दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास करना चाहिए जो दीर्घावधि के लिए संधारणीय हो।

पर्यटकों के साथ-साथ स्थानीय लोगों में भी प्रदूषण, कूड़े और ठोस कचरे की समस्या के बारे में जागरूकता फैलाई जानी चाहिए, जो अधिकतर उच्च हिमालयी पर्यटक स्थलों को प्रभावित करते हैं। लोगों को यहर समझना होगा कि यदि पर्यावरण का क्षय होता है तो पर्यटन भी प्रभावित होगा।

प्रिय बहनों और भाइयों,

हिमालयी क्षेत्र आकर्षक बहुलतावादी विविधता की पच्चीकारी को दर्शाता है। हमें एक ऐसी संपूर्ण हिमालयी विकास रणनीति की आवश्यकता है जो क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित हो।

हमारे राष्ट्रीय जीवन में हिमालय के महत्व पर शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल जी ने "संसद में हिमालय" नाम से एक अच्छा सन्दर्भ ग्रन्थ लिखा है। पोखरियाल जी स्वयं इस क्षेत्र से भली भांति परिचित हैं और अपने सार्वजनिक जीवन में इसका प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। उन्होंने इस पुस्तक की एक प्रति मुझे भेंट की है। आपका आभारी हूं।

आज जब हम हिमालय दिवस मना रहें हैं, तो हमें यह स्मरण करना चाहिए कि हमारे पास पहले से जो प्राकृतिक निधियां मौजूद हैं उनका संरक्षण करना हमारा परम कर्तव्य है।

मैं श्री जोशीजी जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं के अथक प्रयासों की सराहना करता हूं जो इसे जीवन के मिशन के रूप में अपनाकर इस क्षेत्र में कृषि और लोगों की आजीविका के लिए समुचित पर्यावरणीय रूप से संधारणीय प्रौद्योगिकियां विकसित कर रहे हैं। हिमालय हमारे देश के अतीत और वर्तमान के साथ जुड़ा हुआ है।

ये पवर्त श्रृखलाएं हमारा भविष्य हैं।

आइए हम सुनिश्चित करें कि यह भविष्य सुरक्षित रहे और ये पहाड़ आगामी वर्षों में हमारी रक्षा और पोषण करते रहें।

धन्यवाद

जय हिन्द!