09 दिसंबर, 2019 को नई दिल्ली में फिक्की अराइज़ सम्मेलन 2019 के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | दिसम्बर 9, 2019

मुझे आज फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) द्वारा आयोजित किए जा रहे स्कूल शिक्षा और राष्ट्र निर्माण के सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर आप सभी के बीच आकर अत्यधिक हर्ष की अनुभूति हो रही है। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि इस वर्ष का सम्मेलन 'फ्यूचर रेडी लर्नर्स एंड स्कूल्स ’ विषय पर केंद्रित होगा।

शिक्षा क्षेत्र में हो रहे परिवर्तन के दृष्टिगत यह विषय अत्यधिक प्रासंगिक है। आज शिक्षा में प्रतिमान परिवर्तन हो रहा है क्योंकि नई प्रौद्योगिकियां अर्थव्यवस्था और समाज को प्रभावित कर रही हैं।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि सम्मेलन का उद्देश्य दूरदर्शी रूप-रेखा तैयार करना और नवोन्मेष, समावेशिता, स्वायत्तता और संपोषणीयता के लिए सरोकार आधारित स्कूली शिक्षा के नए मॉडल को विकसित करना है, जिससे हमें इस तीव्र और अभूतपूर्व बदलाव को लागू करने में सहायता मिल सके।

यह वास्तव में उल्लेखनीय है कि सम्मेलन में राज्य और केंद्र सरकार के अधिकारियों, नियामकों, प्रमुख शिक्षकों, विचारकों, देश और विश्व की परामर्शदात्री फर्मों और संस्थानों सहित 700 से अधिक प्रतिनिधियों के भाग लेने की संभावना है।

मुझे विश्वास है कि सम्मेलन में ऐसा समाधान तलाशा जाएगा जिसके माध्यम से के-12 क्षेत्र हमारे शिक्षा क्षेत्र में एक निश्चित, सकारात्मक बदलाव लाने के लिए सरकार के साथ मिलकर कार्य सकता है।

मेरी प्यारी बहनों और भाइयों,

पिछले दो दशकों में, भारत ने शिक्षा सहित कई क्षेत्रों में खुद को वैश्विक परिदृश्य पर मजबूती से स्थापित किया है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के मूलभूत तत्व सुदृढ़ और स्थिर हैं और हम विकास की राह पर अग्रसर हैं।

युवा लोगों के एक राष्ट्र के रूप में, भारत को एक अत्यधिक जनसांख्यिकीय लाभ की स्थिति प्राप्त है - 1.25 बिलियन से अधिक की जनसंख्या में से 672 मिलियन अर्थात लगभग 50 प्रतिशत जनसँख्या 15 से 59 वर्ष की आयु-वर्ग में है।

'मेक इन इंडिया', 'डिजिटल इंडिया’ और 'स्टार्ट-अप इंडिया' जैसे फ्लैगशिप कार्यक्रमों पर सरकार का ध्यान स्पष्ट तौर पर विकास के मुख्य वाहक के तौर पर भारत की अदभुत युवा आबादी के साथ निकट भविष्य में वैश्विक नेता बनने की आकांक्षा को व्यक्त करता है।

वर्ष 2030 तक, 4-17 वर्ष की आयु-वर्ग के स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या 300 मिलियन होने का अनुमान लगाया गया है। 18-23 वर्ष के आयु वर्ग के 140 मिलियन युवा 2030 तक महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने के लिए तैयार होंगे।

इस महत्वपूर्ण अवसर पर, हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या हमारे स्कूल और विश्वविद्यालय भविष्य की चुनौतियों के लिए युवाओं को शिक्षित करने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार हैं?

राष्ट्रीय कौशल विकास और उद्यमिता नीति, 2015 के अनुसार, वर्ष 2022 तक कार्यबल में 104.62 मिलियन नए प्रवेशकों को कुशल बनाना आवश्यक है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के कारण हमने स्कूलों में नामांकन में सफलतापूर्वक वृद्धि की है।

हमने स्कूली शिक्षा पूरी करने वाले छात्रों की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की है। परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष 2015 में 6 से 18 साल के बीच स्कूल जाने वाली उम्र के 62 मिलियन बच्चे 'आउट ऑफ स्कूल' थे।

हम अभी भी अधिगम परिणामों में वांछित सीमा तक सुधार नहीं कर पाए हैं।

यद्यपि पिछले दो दशकों में भारत की उच्च शिक्षा क्षेत्र क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है परन्तु हमारे स्नातकों की नियोजनीयता में गिरावट को दर्शाने वाली रिपोर्ट चिंता का बड़ा कारण है।

इन समस्याओं का हल एक ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित करने में निहित है जो पहुंच, समानता, गुणवत्ता, वहनीयता और जवाबदेही पर आधारित होने के साथ ही हमारे युवाओं में आवश्यक कौशलों तथा मूल्यों के विकास पर केंद्रित हो।

स्कूल न जाने वाले बच्चों को वापस स्कूलों में लाना देश की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

हमें यह सुनिश्चित करने का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि बालिकाओं और बच्चों के ऐसे समूह जिनकी बीच में ही पढाई छोड़ने की अत्यधिक संभावना रहती है, जैसे- अनाथ, बाल-मजदूर, निराश्रित बच्चे और दंगों तथा प्राकृतिक आपदाओं के शिकार बच्चे, को औपचारिक शिक्षा प्रणाली में शामिल किया जाए।

हमें अधिगम परिणामों को बेहतर बनाने के लिए अपनी शिक्षण, प्रशिक्षण प्रणालियों का पुनःअभिकल्पन और पुनःनिर्धारण करना होगा।

वैश्विक स्तर पर, शिक्षकों के शिक्षण और शिक्षार्थियों के ज्ञान आत्मसात करने के तौर-तरीकों में अत्यधिक बदलाव आया है। शिक्षण के दौरान हमें सतत तौर पर नवाचार करते हुए शिक्षार्थियों को संदर्भ और सामग्री दोनों प्रदान करनी चाहिए, ताकि वे रटकर सीखने की प्रवृति को छोड़कर पढाई जाने वाली विषय-वस्तु का गंभीर रूप से विश्लेषण करते हुए उसे आत्मसात कर सकें।

प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण और साक्षरता दरों के संवर्धन के साथ-साथ हमें उच्च शिक्षा में वित्त पोषण बढ़ोतरी, अवसंरचना सुदृढीकरण और पेशेवर प्रबंधन सहित शिक्षा के सभी स्तरों पर पहुँच और गुणवत्ता में सुधार करना चाहिए।

मेरी प्यारी बहनों और भाइयों,

जब देश ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में बदल रहा है, तब गुणवत्तापरक स्कूल शिक्षा और नवाचार को बढ़ावा देने में शिक्षकों की भागीदारी काफी महत्वपूर्ण है।

दुनिया में एक प्रमुख अर्थव्यवस्था बनने के लिए, भारत को एक ऐसी उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रणाली विकसित करने का प्रयास करना चाहिए जो 'नए दौर' के कौशलों के साथ कार्यबल तैयार करने में सहायक हो।

सरकार शिक्षा के लिए एक मजबूत और लचीला ढांचा प्रदान करने, हमारे युवाओं को कुशल बनाने और दृढ़ता के साथ एक ऐसी संस्थापना विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास कर रही है जो विकास और अनुसंधान, गुणवत्ता को बढ़ावा देने के साथ ही एक ऐसा परिवेश निर्मित करे जो नवाचार के अनुकूल हो।

सरकार ने भारत में वैश्विक मानकों के अनुरूप शिक्षा प्रणाली स्थापित करने के लिए कई महत्वपूर्ण पहलें की हैं।

प्रारूप राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 का उद्देश्य सभी को उच्च-गुणवत्तापरक शिक्षा प्रदान करके भारत को एक न्यायसंगत और जीवंत ज्ञान समाज में परिवर्तित करना है। इसमें शिक्षा का अधिकार अधिनियम के दायरे में पूर्व-प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को शामिल करके इसका विस्तार करते हुए अगली पीढ़ी के सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया गया है।

स्कूल शिक्षा पर, पूर्व-नर्सरी से 12 वीं कक्षा तक इनको विभाजित किए बिना, समग्र रूप से विचार करने के उद्देश्य से सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए), राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आरएमएसए) और अध्यापक शिक्षा (टीई) को समाहित करते हुए समग्र स्कूल शिक्षा योजना (समग्र शिक्षा) भी तैयार की गई है।

अनुसंधान, नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए अटल नवाचार मिशन (एआईएम) के तहत अटल टिंकरिंग प्रयोगशालाओं (एटीएल) की स्थापना के लिए 3,000 अतिरिक्त स्कूलों का चयन किया गया है, जिससे एटीएल स्कूलों की कुल संख्या 5400 से अधिक हो गई है। देश में माध्यमिक स्कूल के बच्चों के बीच नवाचार और उद्यमशीलता की भावना के पोषण हेतु चयनित स्कूलों को अटल टिंकरिंग लैब्स की स्थापना के लिए अगले पांच वर्षों में 20 लाख रुपये का अनुदान प्रदान किया जाएगा।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि हमारा शिक्षा क्षेत्र एनसीईआरटी के ई-संसाधन केन्द्र 'ई-पाठशाला' और सीबीएसई की 'निर्णय सहायता' प्रणाली 'सारांश' जैसी पहलों के माध्यम से सूचना प्रौद्योगिकी की कई संभावनाओं को लागू कर रहा है।

प्रौद्योगिकियों और डिजिटलीकरण की नई लहर ने हमारे उद्योग को अभूतपूर्व तरीके से बदल दिया है।

इसके परिणामस्वरूप, विध्वंसकारी प्रौद्योगिकियों की दुनिया में भविष्य के कार्यबल के लिए आवश्यक कौशल पूरी तरह से भिन्न होंगे।

कुशल कार्यबल की कमी को दूर करने के लिए भारतीय कारपोरेट और शैक्षिक क्षेत्र में कौशल प्रशिक्षण, प्रतिभा अधिग्रहण और प्रतिधारण के लिए समय और धन का अत्यधिक निवेश किया जा रहा है । बाजार में एक बहुत बड़ा शून्य है क्योंकि हम शैक्षणिक संस्थानों में ज्ञान प्राप्त करते हैं न कि नौकरियों के लिए आवश्यक कौशल प्राप्त करते हैं।

इस शून्य को भरने के लिए, सरकार और भारतीय उद्योग अब उन्नत प्रौद्योगिकी हस्तक्षेपों के माध्यम से अकादमिक अधिगम के साथ-साथ कौशल विकास और पुनः कौशल प्रशिक्षण को कार्यान्वित कर रहे हैं।

हमें अपने नौजवानों को 'ऑटोमेशन', 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस', 'इंटरनेट ऑफ थिंग्स' और 'बिग डेटा' की विशेषज्ञता के लिए प्रशिक्षित करना होगा ताकि वे हमारे देश में चौथी औद्योगिक क्रांति की अगुवाई कर सकें।

उद्यमिता शिक्षा और प्रशिक्षण भी आवश्यक है ताकि हम युवा लोगों को भविष्य में नौकरी चाहने वालों की अपेक्षा नौकरी प्रदाता बना सकें।

मेरी प्यारी बहनों और भाइयों,

यद्यपि हम युवाओं को नियोजनीय बनाने के लिए उन्हें शिक्षित करने और कौशल प्रदान करने की आवश्यकता की बात करते हैं परन्तु मेरा दृढ़ मत है कि शिक्षा केवल रोजगार के लिए नहीं बल्कि सशक्तिकरण और ज्ञानवर्धन के लिए भी है।

स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा था कि "शिक्षा मनुष्य में पहले से ही मौजूद पूर्णता की अभिव्यक्ति है"।

शिक्षा तभी सार्थक होती है जब वह हर व्यक्ति में श्रेष्ठता लाने और उन्हें अधिक दयालु मानव बनाने में सक्षम हो ।

मूल्य आधारित शिक्षा प्रदान करना समय की मांग है।

धैर्य, ईमानदारी, सम्मान, सहिष्णुता और सहानुभूति जैसे मूल्यों को विकसित करने पर बल दिया जाना चाहिए।

युवाओं को न केवल यह सिखाया जाना चाहिए कि उनके कौशलों, प्रतिभा और क्षमताओं को कैसे विकसित किया जाए अपितु उन्हें यह भी सिखाया जाना चाहिए कि इन कौशल, प्रतिभाओं और क्षमताओं का उपयोग दुनिया के कल्याण और बेहतरी के लिए कैसे किया जाए।

उन्हें प्रकृति से प्यार करना और सभी जीवों के साथ सद्भाव से रहना सिखाया जाना चाहिए। हमें उनमें युवावस्था से ही पर्यावरण की रक्षा और संरक्षण के लिए जोश भरना चाहिए।

बच्चों को हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रति संवेदनशील होना चाहिए और उन्हें उतनी ही भाषाओं को चुनने और कला रूपों का अभ्यास करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए जितना वे कर सकते हैं।

मैं विशेष रूप से हमारे शिक्षण संस्थानों में जेंडर अध्ययन का समर्थन करता हूँ ताकि बच्चे सभी जेंडर के लोगों का सम्मान करना सीखें और उनके प्रति संवेदनशील बनें।

हमें युवाओं के दिमाग से पूर्वाग्रहों को दूर करना चाहिए और उन्हें खुला मन-मष्तिष्क रखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और निरर्थक बातों तथा तर्कहीनता को अस्वीकार करने के लिए पर्याप्त निडर होना चाहिए।

हमें ऐसे युवाओं की एक पीढ़ी तैयार करनी होगी जो भारत को न केवल एक सुदृढ़ अर्थव्यवस्था बनाएगी अपितु इसका विश्व के सबसे समावेशी, अभिनव और सामंजस्यपूर्ण समाज में स्थान भी सुरक्षित करेगी।

मैं फिक्की अराईज को स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की दिशा में सरकारी और गैर-सरकारी दोनों स्तर पर किए जा रहे प्रयासों को गति प्रदान में योगदान के लिए बधाई देता हूं।

मुझे आशा है कि इस सम्मेलन में सुविज्ञ बहस और खुली चर्चा होगी और यह ज्ञान, सूचना और अनुभवों के आदान-प्रदान के लिए एक मंच के रूप में कार्य करेगा, जो अनवरत बनी हुई चुनौतियों के रचनात्मक समाधान का वाहक बनेगा।

धन्यवाद!

जय हिन्द!"