09 अगस्त, 2019 को नई दिल्ली में श्री गुजर मल मोदी की 117वीं जन्म जयंती समारोह के अवसर पर प्रो. एस. के. सतीश को गुजर मल मोदी पुरस्कार-2019 प्रदान करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का संबोधन

नई दिल्ली | अगस्त 9, 2019

“मुझे मोदी परिवार के बीच उपस्थित होने और स्वर्गीय श्री गुजर मल मोदी के 117वें जयंती समारोह में आप सभी के साथ शामिल होने तथा प्रोफेसर एस. के.सतीश और डा. महाराज किशन भान (पद्मभूषण) को गुजर मल मोदी पुरस्कार- 2019 प्रदान करते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है।

इस अवसर पर मैं मोदी ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्रीज़ के संस्थापक श्री गूजर मल मोदी, जो एक महान मानवतावादी थे, को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ । वह आधुनिक औद्योगिक भारत के प्रमुख प्रणेताओं में से एक थे।

मुझे बताया गया है कि बहादुर गुजर माल मोदी ने अपने कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए अनेक कल्याणकारी कदम उठाए थे। उन्होंने उनके लिए स्कूल, शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल, मंदिर और आवासीय परिसर बनवाए। वह लोगों के धन को लोगों को ही वापस करने में विश्वास रखते थे और सामाजिक हित के लिए अपने व्यापार उपक्रमों द्वारा अर्जित किए गए लाभ के एक बड़े हिस्से को वापस करने के लिए जागरूक प्रयास करते थे।

श्री गुजर मल मोदी को एक उद्यमी उद्योगपति के रूप में उनकी उपलब्धियों और उनके अपार जनहितैषी कार्यों के लिए भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित पद्म भूषण प्रदान किया गया था।

आज मोदी परिवार इस महान समाज-सेवी की 117 वीं जयंती मना रहा है।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि 1988 के बाद से फाउंडेशन देश की ऐसी तैंतीस हस्तियों को सम्मानित कर चुका है, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। इस सूची में डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, डा. अनिल काकोडकर, प्रो. एम. जी.के. मेनन और डा. कस्तूरीरंगन का नाम शामिल है ।

मुझे यह जानकर खुशी हुई है कि योजना आयोग के पूर्व सदस्य डा. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में जूरी ने इस वर्ष प्रो. एस.के. सतीश और डा. महाराज किशन भान को सम्मानित करने का निर्णय लिया है।

दिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज के अध्यक्ष और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) में एटमॉस्पेरिक एंड ओशनिक साइंसेज के प्रोफेसर प्रो. एस.के. सतीश ने प्रकाश के महत्वपूर्ण प्रभाव - पृथ्वी-वायुमंडलीय प्रणाली के विकिरण संतुलन पर वायुमंडलीय एरोसोल कणों के अवशोषण और क्षेत्रीय जलवायु को समझने में उत्कृष्ट योगदान दिया है ।

मानसून का अध्ययन करने के लिए जलवायु मॉडल में व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले एरोसोल के विकिरण प्रभाव के मूल्यांकन में प्रो.सतीश के प्रयास वास्तव में प्रशंसनीय हैं। आज उनको जो सम्मान मिला है, उसके लिए मैं उन्हें हार्दिक बधाई देता हूं।

कश्मीर के पद्म भूषण से सम्मानित डा. महाराज किशन भान वर्तमान में टाटा ट्रस्ट्स द्वारा स्थापित हेल्थ सिस्टम ट्रांसफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म और राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन के तकनीकी सलाहकार समूह के अध्यक्ष हैं।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि उनके अग्रणी शोध से एम्स, नई दिल्ली में उनके द्वारा एक नवोन्मेषी वायरस स्ट्रेन से पृथक किए गए रोटावायरस वैक्सीन का विकास हुआ। एक दशक के लंबे प्रयास से विकसित किया गया यह वैक्सीन अब देश के टीकाकरण कार्यक्रम के माध्यम से दिया जाता है और अन्य विकासशील देशों में उपयोग किया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में बच्चों को दिए गए इस वैक्सीन की 100 मिलियन से अधिक खुराकों से अनगिनत बच्चों की जिंदगी बची है। उनके प्रयासों ने भारतीय अकादमियों तथा उद्योगों द्वारा ट्रान्स्लेशनल बायोमेडिकल विज्ञान और नवाचार को प्रेरित किया है।

उन्हें चिकित्सा अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास में एक अग्रणी नवोन्मेषी के रूप में विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है। मैं डॉ. भान को उनकी उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए बधाई देता हूं।

यह सभी जानते हैं कि आधारभूत विज्ञानों में अनुसंधान सभी प्रौद्योगिकीय उन्नतियों का मूल सिद्धांत है। एक ऐसे वातावरण का निर्माण करना आवश्यक है जहां संवहनीयता पर विशेष जोर के साथ सरकारें, विश्वविद्यालय, कॉरपोरेट घराने एवं अन्य सभी लोग विज्ञान पारितंत्र को आगे प्रोत्साहित करने के लिए एक-जुट हों।

प्रतिभाशाली युवाओं को प्रेरित करने और प्रोत्साहित करने का एक तरीका हमारे अनुसंधानकर्ताओं और वैज्ञानिकों की उपलब्धियों की पहचान करना और उनकी सराहना करना है, जो कि जी.एम. मोदी फाउंडेशन वर्षों पहले से करता आ रहा है। पिछले 31 वर्षों से आप जिस तरह से वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित रहे हैं, उसके लिए मैं इस फाउंडेशन को बधाई देता हूँ।

मेरे प्यारे भाइयों और बहनों,

मुझे विश्वास है कि आप सभी लोगों को हमारे देश द्वारा अनेक मोर्चों पर की जा रही अपार प्रगति की जानकारी है। हमारे पास एक स्थिर लोकतंत्र और एक सक्रिय अर्थव्यवस्था है। हमारी 65% जनसंख्या 35 वर्ष से कम होने के कारण हमारी जनसांख्यिकी में अपार संभावनाएं हैं।

मेरा दृढ़ विश्वास है कि भारत के लिए तेज गति से समावेशी और सतत विकास के पथ पर आगे बढ़ने हेतु नवाचार अनिवार्य है। आज हम गरीबी, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, रोग, अलाभदायक कृषि एवं कम दक्षता वाली औद्योगिक प्रक्रियाओं जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

हमें उन सीमित संसाधनों, जो हमारे पास उपलब्ध हैं, का उपयोग करके इन समस्याओं का समाधान खोजना होगा।

नमोन्मेषी और लीक से हटकर समाधान ही आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका है।

नवोन्मेष एक संस्कृति है, एक मानसिकता है।

जब आपके पास एक नवोन्मेषण संस्कृति होती है, तो जो वैज्ञानिक या इंजीनियर नहीं हैं, वे भी नवाचार और वैज्ञानिक साक्षरता को अपनाएंगे। इस प्रकार नवोन्मेष समाज के मूल मूल्यों में निहित हो जाएगा, जिससे आर्थिक वृद्धि और विकास को बढ़ावा मिलेगा।

निरंतर नवोन्मेष की यह संस्कृति आज भारत की जरूरत है, यही वह चीज है जो भारत को विश्व में अग्रणी बनाएगी।

नवोन्मेष में निवेश एक उज्ज्वल भविष्य में निवेश करना है।

नवोन्मेष की इस संस्कृति की नींव हमारे स्कूलों और कॉलेजों में रखी जानी चाहिए।

बच्चों में हमारे आसपास की दुनिया के बारे में एक स्वाभाविक जिज्ञासा होती है। यह जिज्ञासा सभी आविष्कारों की नींव है। हमें अपने बच्चों को सवाल पूछने, आलोचना करने और अतार्किकता को अस्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

रचनात्मकता और जिज्ञासा को प्रेरित करने के लिए हमारी शिक्षा प्रणाली का कायापलट करना होगा । इसको बच्चों में इस मूल जिज्ञासा को ज्ञान में परिवर्तित करना चाहिए जो हमें समस्याओं का समाधान खोजने तथा आविष्कार करने की शक्ति प्रदान करती है।

हमें एक साथ शिक्षा के एक नए मॉडल का निर्माण करना चाहिए, एक ऐसा मॉडल जो बदलाव का विरोध नहीं करे बल्कि हमेशा खुला और अनुकूल हो । हमें शिक्षार्थियों के रूप में सदियों से विकसित की गई 'सर्वोत्तम प्रथाओं' को आधार बनाना चाहिए और 'अगली प्रथाओं' का निर्माण करना चाहिए जो हमारे भविष्य के लिए हमारे विज़न के अनुकूल हों।

अटल इनोवेशन मिशन के तहत भारत में 5500 से अधिक स्कूलों में स्थापित 'अटल टिंकरिंग लैब्स' जैसी पहल के माध्यम से एक शुरुआत की गई है ताकि युवा मानसिकता में जिज्ञासा, रचनात्मकता और कल्पनात्मक्ता को और अधिक विकसित किया जा सके और डिजाइन मानसिकता, कम्प्यूटेशनल सोच, अनुकूली शिक्षा, भौतिक कंप्यूटिंग आदि जैसे कौशल को हृदयंगम किया जा सके। कई और ऐसी पहलें जो नवाचार के लिए मंच के रूप में काम करती हैं, उनको आगे बढ़ाना चाहिए।

हमारे विश्वविद्यालयों को आधारभूत विज्ञानों के साथ-साथ अत्याधुनिक तकनीक के उत्कृष्टता केन्द्रों के रूप में काम करना चाहिए। उन्हें अनुसंधान और विकास के शक्तिकेन्द्र बनना चाहिए।

इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए, हमारे विश्वविद्यालयों द्वारा चलाई जा रही अनुसंधान परियोजनाओं को अंतरराष्ट्रीय मानकों और मानदंडों के अनुरूप होना चाहिए। प्रायः यह कहा जाता है कि भारतीय शिक्षा और अनुसंधान की एक बड़ी कमजोरी यह है कि कुल भारतीय अनुसंधान में यहां के विश्वविद्यालयों का योगदान अपेक्षाकृत बहुत कम है।

संस्थागत स्तर पर शिक्षण को अनुसंधान से जोड़ने की आवश्यकता है। सरकार को संकाय विकास में निवेश करने, अनुसंधान के लिए प्रोत्साहन देने, अनुसंधान में संस्थानों के बीच सहयोगात्मक प्रयासों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

हमारे विश्वविद्यालयों को इसे अपनाने के लिए प्रौद्योगिकी ग्रहण करने से आगे बढ़ना चाहिए।

हमारे विश्वविद्यालयों को ज्ञान-सृजन केंद्र बनाने में परिणाम आधारित अनुसंधान वित्तपोषण, नवीन अनुसंधान के लिए उद्भवन केंद्रों की स्थापना और केंद्रीय शैक्षिक संस्थानों में अनुसंधान पार्क स्थापित करने जैसी पहलें अत्यधिक योगदान दे सकती है।

अतीत के विपरीत, विभिन्न विषयों के बीच स्पष्ट विभाजन लगभग समाप्त हो गया है। आज के शोधकर्ता खुद को रूढ़ियों में सीमित नहीं कर सकते हैं और उनमें अन्य संबंधित विषयों की बुनियादी समझ होनी चाहिए। मुद्दे भी अब विषय -विशिष्ट नहीं रहे हैं और कई विषयों को छूते हैं। अंतर-विषयक तरीके से एक समग्र अनुसंधान दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता है।

उदाहरण के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण सभी के लिए महत्वपूर्ण विषय हैं और इन्हें विशेष विषयों तक सीमित नहीं किया जा सकता है।

विज्ञान और सामाजिक विज्ञान दोनों में नए अनुसंधान का कैनवास विशाल है और निश्चित रूप से युवा अनुसंधानकर्ताओं को विभिन्न तथ्यों पर एक व्यापक दृष्टिकोण प्राप्त करने में मदद करेगा। इसके कुछ उदाहरण जैव-प्रौद्योगिकी में उभरते क्षेत्र, जेनेटिक इंजीनियरिंग, जैव-विविधता, नए पदार्थ, माइक्रो-मशीनें, जैव-चिकित्सा सिमुलेशन और उपकरण, अंतरिक्ष में स्थायी मानव निवास सहित अंतरिक्ष अनुसंधान और प्रौद्योगिकी में नए प्रभुत्व और इसी प्रकार महासागरों में नई सीमाएं हैं।

मैं अपने शिक्षण संस्थानों से मौजूदा विषयों के मिलन बिन्दुओं में नव-बोध के सृजन के लिए एकजुट होने का आग्रह करता हूं।

मेरी प्यारी बहनों और भाइयों,

उद्यमिता को बढ़ावा देने के बारे में बहुत कुछ कहा जा रहा है। नवाचार के लिए सरकार की प्राथमिकता 'स्टार्ट-अप इंडिया और ' स्टैंड-अप इंडिया’ जैसे मिशनों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।

मैं दृढ़तापूर्वक मानता हूं कि नवाचार और उद्यमशीलता साथ-साथ चलते हैं। हमारे विश्वविद्यालयों को उद्यमशीलता के फलने-फूलने के लिए सुरक्षित स्थान के रूप में काम करना चाहिए। हमें अपने मेधावी युवाओं को सहयोग करने और टीमों में एक साथ काम करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि व्यापारिक विचारों को व्यवहार्य, टिकाऊ और सबसे महत्वपूर्ण, सामाजिक रूप से प्रासंगिक बनाया जा सके।

सभी नवाचारों का अंतिम उद्देश्य मानव स्थिति की बेहतरी, पीड़ा का निवारण और स्थिरता, शांति और सद्भाव को बढ़ावा देना है।

मैं आप सभी, विशेषकर युवा नवप्रवर्तकों से एक बड़ा विज़न रखने और फिर अपने विज़न को साकार करने के लिए छोटे-छोटे कदम उठाने का आग्रह करता हूं । कभी-कभी, नवाचार अत्याधुनिक तकनीक के बारे में नहीं होता है, अपितु जटिल समस्याओं के सरल समाधान के बारे में होता है। भारत एक ऐसा देश है जो अपने मितव्ययी नवाचारों के लिए जाना जाता है। हमें अपनी इस प्रतिस्पर्धात्मक विशिष्टता को बनाए रखना चाहिए और चुनौतियों का सामना करने के लिए

इसका सर्वोत्तम संभव सीमा तक उपयोग करना चाहिए।

मैं आपको यह भी बता दूं कि हर एक अत्याधुनिक तकनीक अपने साथ विध्वंसकारी हस्तक्षेप भी लाती है। हमें एक समाज के रूप में परिपक्व और विवेकपूर्ण होना चाहिए ताकि इन विध्वंसों का प्रबंधन किया जा सके जो बहुत बार प्रतिमानों को बदल देते हैं।

मैं आपसे आग्रह करता हूं कि विज्ञान एक गतिमान लक्ष्य है, जो हमेशा आगे बढ़ता रहता है और प्रगति करता है। हमें खुद को अद्यतन रखने और कड़ी मेहनत करने के लिए तैयार रहने की जरूरत है।

मैं एक बार पुनः प्रो एस.के. सतीश और डा. महाराज किशन भान को बधाई देता हूं। मुझे उम्मीद है कि बहादुर गुजर मल मोदी द्वारा किए गए परोपकारी क्रियाकलापों की विरासत को आने वाले समय में उनके परिवार द्वारा आगे बढ़ाया जाएगा। मैं आप सभी को आपके भविष्य के प्रयासों के लिए शुभकामनाएं देता हूं।

धन्यवाद!

जय हिन्द!"