08 सितंबर, 2021 को राजभवन, चेन्नई से केआरईए विश्वविद्यालय में मानविकी के उन्नत अध्ययन के लिए मोटूरी सत्यनारायण केंद्र का वर्चुअल रूप से उद्घाटन करने के उपरांत सभा को में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

चेन्नई | सितम्बर 8, 2021

“प्रिय बहनों और भाइयों,
आज केआरईए विश्वविद्यालय के मोटूरि सत्यनारायण सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडी इन ह्यूमैनिटीज का उद्घाटन करके मुझे बहुत खुशी हो रही है। मैं केआरईए की यात्रा के इस महत्वपूर्ण पड़ाव, जो मानविकी और सामाजिक विज्ञान में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का पर्याय है, से जुडे़ सभी प्रबंधकों, कर्मचारियों की सराहना करता हूं।
मुझे विश्वास है कि यह केन्द्र जिसका नाम भारत के सुप्रसिद्ध सपूत पद्म भूषण श्री मोटूरि सत्यनारायण गरु के नाम पर रखा गया है, शैक्षणिक कड़ाई और गुणवत्ता पर बल देते हुए शिक्षण और अधिगम का परिवर्तनकारी और सक्रिय केंद्र बनेगा। स्वतंत्रता सेनानी, भारतीय संविधान के निर्माताओं में से एक और एक संसद सदस्य के रूप में मोटूरि सत्यनारायण गरु एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे और भारत के एक राजनीतिक इतिहास के एक प्रमुख व्यक्तित्व थे।
महात्मा गांधी के प्रबल अनुयायी और साथी, श्री मोटूरि सत्यनारायण गरू जीवन के सभी क्षेत्रों में भारतीय भाषाओं का प्रयोग करने के एक प्रमुख समर्थक थे। उन्होंने दक्षिण भारत में हिंदी की वकालत करने के कार्य को अपने जीवन का मुख्य मिशन बनाया, जबकि साथ ही विभिन्न प्रकाशनों के माध्यम से अपनी मातृभाषा तेलुगु को भी बढ़ावा दिया। संयोगवश, वे तेलुगु भाषा समिति के संस्थापक सचिव भी थे।
प्रिय बहनों और भाइयों,
हमें भारतीय भाषाओं, विशेष रूप से हमारी मातृभाषा को शिक्षा और प्रशासन के सभी स्तरों पर उचित महत्व देना चाहिए। हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि भाषा हमारी सांस्कृतिक विरासत के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है; यह हमें पहचान, आत्म सम्मान देती है और हमें वह बनाती है जो हम हैं। इसलिए, मैं प्राय: बोलता हूँ कि अपनी मातृभाषा में बात करने में गर्व महसूस कीजिए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एक दूरदर्शी दस्तावेज़ है जो उदार कलाओं के महत्व को पहचानती है और समकालीन समय के अनुरूप शिक्षा में बहु-विषयकता के दृष्टिकोण पर बल देती है। इसका उद्देश्य भारतीय शिक्षा का एकीकरण करना है और 'पेशेवर बनाम उदार शिक्षा' के बीच की कठोर और कृत्रिम बाधाओं को समाप्त करना है।
जैसा कि एनईपी में सही उल्लेख किया गया है कि प्राचीन काल में भी, 'उत्तम शिक्षा' की व्याख्या 64 कलाओं के ज्ञान के रूप में की गई थी। इस ज्ञान में रसायन विज्ञान तथा गणित जैसे वैज्ञानिक क्षेत्रों, बढ़ईगिरी और कपड़ों का विनिर्माण जैसे 'व्यवसायिक' क्षेत्रों और चिकित्सा और इंजीनियरिंग जैसे 'पेशेवर' क्षेत्रों में ज्ञान के साथ ही संचार, चर्चा और वाद-विवाद जैसे व्यवहारिक कौशल का ज्ञान भी शामिल है।
शिक्षा के प्रति इस प्रकार के समग्र दृष्टिकोण को उदार कलाओं पर जोर देते हुए पुनरूज्जीवित करना होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हाल के दशकों में शिक्षा में उदार कलाओं को द्वितीयक स्थान पर लाया गया है। उदार कलाएं व्यक्ति में समीक्षात्मक सोच, समस्या का समाधान और अनुकूलन से संबंधित गुणों का पोषण करती हैं। 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था में इन गुणों की बहुत अधिक मांग है जहाँ अर्थव्यवस्था का कोई भी क्षेत्र अकेले कार्य नहीं करता है। इसलिए हमें उदार कलाओं में अपनी 'परम्परा' की पुन: खोज करनी होगी ताकि समग्र रूप से विकसित व्यक्तियों को तैयार किया जा सके।
इस संबंध में, स्टेम -विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित के क्षेत्रों में पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों को उनके पूर्व स्नातक पाठ्यक्रमों में उदार कलाओं और सामाजिक विज्ञान संबंधी विषयों में पर्याप्त शिक्षा देनी चाहिए। ऐसे पाठ्यक्रमों जहाँ मानविकी और कलाएं अच्छी तरह से सम्मिलित हैं, के विभिन्न मूल्यांकनों से यह पता चलता है कि विद्यार्थियों में रचनात्मकता और नवोन्मेष, उच्च सामाजिक और नैतिक जागरुकता, बेहतर समीक्षात्मक सोच, टीम वर्क और संचार कौशल में वृद्धि हुई है।
मुझे खुशी है कि कई इंजीनियरिंग कॉलेज इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। मुझे यह जानकर हर्ष हो रहा है कि आईआईटी बम्बई ने हाल ही में एक अंतर-विषयक स्नातक पाठ्यक्रम आरम्भ किया है जिसमें उदार कलाएं, विज्ञान और इंजीनियरिंग एक ही कार्यक्रम में शामिल हैं। मुझे जानकारी दी गई है कि केआरईए विश्वविद्यालय भी ऐसे पाठ्यक्रम उपलब्ध कराता है। ऐसा करने से रोजगार के नए रास्ते खोलने के लिए अवसरों को विस्तार देने में सहायता मिलेगी।
मित्रों,
अधिक से अधिक संस्थानों को ऐसे बहु-विषयक पाठ्यक्रम प्रदान करने पर विचार करना चाहिए। आगामी वर्षों में रोजगार के कई क्षेत्रों में कर्मचारियों को विविध क्षेत्रों में व्यापक ज्ञान की जरूरत पड़ेगी। हमें ऐसे युवाओं की जरूरत है जिन्हें न केवल अपने विशेषज्ञता के क्षेत्र की गहन जानकारी हो, बल्कि जिनमें अन्य क्षेत्रों के परिप्रेक्ष्य को आत्मसात करने, सभी विषयों से प्राप्त ज्ञान को एकीकृत करने की क्षमता हो और उत्तम संचार जानकारीयुक्त चर्चा और बहस के लिए व्यावहारिक कौशल हो। विशिष्ट क्षेत्र में विशेषज्ञता होने के साथ ही विविध विषयों में गहरा ज्ञान प्राप्त करने से हमारी जनसांख्यिकीय लाभांश की पूरी संभावनाओं को मूर्त रूप प्रदान करने में सहायता मिलेगी।
भाइयों और बहनों,
मेरी अभिभावकों से यह अपील है कि वे कम उम्र से ही बच्चों में विभिन्न कलाओं, साहित्य और सामाजिक विज्ञान के प्रति जिज्ञासा को प्रोत्साहित और पैदा करें। विज्ञान और इंजीनियरिंग के शीर्ष राष्ट्रीय संस्थानों में अपना स्थान बनाने की होड़ में हम विद्यालयों में भाषाओं और सामाजिक विज्ञान जैसे आवश्यक विषयों की अनदेखी कर रहे हैं।
इसके अलावा रटकर पढ़ाई करने की परिपाटी बच्चों की रचनात्मक क्षमताओं को नष्ट कर देंगी। इसके बजाय हमें ऐसे इंजीनियर, डॉक्टर और वैज्ञानिक तैयार करने होंगे जो मानव जाति के समक्ष उपस्थित चुनौतियों से निपटने के लिए नवोन्मेषी समाधान ढूंढे।
उदार कलाओं के उच्च शैक्षणिक संस्थानों को भी अपने परिसरों में अन्वेषण और रचनात्मकता की इस भावना को जारी रखना चाहिए। सामाजिक विज्ञानों से संबंधित अनुसंधान में हमें और अधिक विविध स्वरों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है और विश्वविद्यालयों को अपवर्जनात्मक स्थल और प्रतिध्वनि कक्ष बनने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। मेरी राय में सामाजिक विज्ञानों के विद्वानों को पेशेवरों और नीति-निर्माताओं के साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि उन्हें वास्तविक जीवन से जुड़े ऐसे मुद्दों की अच्छी जानकारी हो सके जिन्हें वे समझने और विश्लेषण करने का प्रयास कर रहे होंगे।
अंत में, जबकि तकनीकी संस्थानों को कला को अपने पाठ्यक्रम से जोड़ना चाहिए, कला और मानविकी पृष्ठभूमि के छात्रों को कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऐसे अन्य प्रमुख क्षेत्रों जैसे वैज्ञानिक विषयों की जानकारी प्राप्त करने के विकल्प दिए जाने चाहिए।उन्हें नवीनतम तकनीकी विकास से परिचित होना चाहिए और इन प्रगतियों को अपने शोध कार्य में कुशलता से लागू करना चाहिए।
जहां तक संकाय के सदस्यों का संबंध है, सहयोग के शैक्षणिक वातावरण में अधिगम, मान्यता और सशक्तिकरण, करियर के विकास का आधार होना चाहिए। उन्हें शिक्षार्थियों को मौजूदा समय और युग में उनके लिए उपलब्ध रोजगार के अवसरों की बढ़ती विस्तृत श्रृंखला तक पहुँचने के लिए तैयार करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
इस संबंध में, मुझे विश्वास है कि यह केंद्र नवोन्मेषी अनुसंधान को बढ़ावा देगा, समाज विज्ञानियों की एक नई पीढ़ी का पोषण करेगा, विषयों के भीतर और उनसे परे जांच प्रथाओं को मजबूत करेगा और महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दों के बारे में नई अंतर्दृष्टि प्रदान करेगा। मैं विश्वविद्यालय के संस्थापकों, प्रशासकों और कुलपति को इस केंद्र की स्थापना में उनके प्रयासों के लिए बधाई देता हूं। स्वर्गीय श्री मोटूरि सत्यनारायण गरु के परिवार को मेरी हार्दिक बधाई, जो इस कार्य का उदारतापूर्वक निधियन करने और इस केंद्र के सफल कामकाज के लिए एक कोष तैयार करने के लिए आगे आए हैं।
पुन:, मैं यह कहना चाहता हूं कि मुझे इस केंद्र का उद्घाटन करके बहुत खुशी रही है। मुझे विश्वास है ऐसे प्रयासों से भारत अन्य क्षेत्रों के साथ ही मानविकी और समाज विज्ञान के क्षेत्र में अधिगम का एक केंद्र बनेगा और विश्व मंच पर पुन: विश्वगुरु बनकर उभरेगा। आइए हम साथ मिलकर प्रयास करें और पुन: जोशपूर्ण, समावेशी, बहुविषयक अधिगम के लिए उत्कृष्ट स्थान बनाएं।
आप सभी का धन्यवाद  
जय हिंद!”