08 मार्च, 2020 को हैदराबाद में आई डब्ल्यू आई एन (इंटरनेशनल वूमेन नेटवर्क) – ए पोर्टल कन्सीव्ड बाइ फाउंडेशन ऑफ़ फ्यूचरिस्टिक सिटीज़ के उद्घाटन के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | मार्च 8, 2020

“अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के महत्वपूर्ण अवसर पर आप सभी को मेरी शुभकामनाएँ! वास्तव में इस वर्ष का विषय "मैं समानता की भावना वाली पीढ़ी हूँ: महिलाओं के अधिकारों को साकार करती" सबसे अधिक सामयिक और उचित है क्योंकि यह बीजिंग घोषणा और कार्यवाही मंच की 25वीं वर्षगांठ का प्रतीक है। महिलाओं पर चौथे विश्व सम्मेलन में 1995 में बीजिंग में अपनायी गयी यह घोषणा महिलाओं के अधिकारों और सशक्तीकरण के लिए सबसे दूरदर्शी एजेंडा मानी गई है।

सशक्तीकरण कैसे प्राप्त किया जाता है? यह महिलाओं की शिक्षा सुनिश्चित करके और सभी क्षेत्रों में उन्हें् समान अवसर प्रदान करके प्राप्त किया जा सकता है। लैंगिक समानता अब सामान्य बात होनी चाहिए और लैंगिक भेदभाव अतीत की बात होनी चाहिए।

समय की जरूरत है कि लैंगिक समानता पर की गई घोषणाओं और प्रस्तावों को अमली जामा पहनाया जाए। किसी लड़की को घर, स्कूल, कॉलेज या कार्यस्थल पर किसी भी तरह के भेदभाव का सामना नहीं करना चाहिए। जब उच्चघतम न्यासयालय ने हाल ही में सेना के नॉन-कॉम्बैट सपोर्ट यूनिट में अपने समकक्ष पुरुषों के साथ महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के पक्ष में फैसला सुनाया तो मेरा ह्रदय प्रसन्न्र‍ता से भर गया था।

प्रिय बहनों,

हमें यह याद रखने की आवश्यकता है कि भारत की लगभग 50 प्रतिशत जनसंख्या महिलाओं की है। कोई भी देश प्रगति नहीं कर सकता है यदि महिलाओं को समान अवसरों से वंचित किया जाता है और उन्हें। पिछड़ा रखा जाता है। महिलाओं ने बार-बार यह साबित किया है कि सही अवसर प्रदान किए जाने पर वह किसी से भी किसी भी मामले में पीछे नहीं हैं, चाहे वह राजनीतिक नेतृत्व की बात हो या मंगल ग्रह पर अंतरिक्ष यान भेजने की।

हालाँकि, शिक्षा आर्थिक, राजनीतिक या सामाजिक सशक्तीकरण की कुंजी है। यह सुनिश्चित करना हम में से प्रत्येक का कर्तव्य है कि कोई भी लड़की स्कूजल जाने से वंचित न रहे। अभी हाल ही में संसद को बताया गया है कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना का जबरदस्त प्रभाव पड़ा है और सभी स्तरों पर लड़कियों का सकल नामांकन अनुपात लड़कों की तुलना में अधिक हो गया है।

यह कहा जाता है कि "यदि हम एक पुरूष को शिक्षित करते हैं, तो हम एक व्यक्ति को शिक्षित करते हैं लेकिन अगर हम एक महिला को शिक्षित करते हैं, तो हम एक पूरे परिवार को शिक्षित करते हैं"। इस प्रकार, एक शिक्षित महिला न केवल परिवार की भलाई और समृद्धि में योगदान करेगी, बल्कि समाज के विकास में भी योगदान करेगी।

एक शिक्षित महिला में कौशल, आत्मविश्वास होगा और वह एक बेहतर माता बन सकेगी। वह बेहतर पोषण भी प्रदान करेगी और इसलिए यह सुनिश्चित करेगी कि उसके बच्चे स्वस्थ हों।

मुझे यह देखकर बहुत खुशी मिलती है कि लड़कियाँ शिक्षा के क्षेत्र में लड़कों को पछाड़ रही हैं और विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में अधिक से अधिक स्वर्ण पदक प्राप्त कर रही हैं।

महिलाओं की शिक्षा के उल्लेखनीय लाभों में प्रजनन दर में कमी, शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर में कमी शामिल है। लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में मदद करने के साथ-साथ शिक्षा महिलाओं को बेहतर निर्णय लेने में समर्थ बनाएगी। एक शिक्षित महिला शिक्षा के महत्व को समझती है और वह लड़कियों को स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित करेगी।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश को स्वितंत्रता मिलने के 72 साल बाद भी हम महिलाओं के प्रति लैंगिक भेदभाव, अत्याचार और हिंसा की खबरें सुनते रहते हैं। ऐसी सामाजिक बुराइयों को बिल्कुंल भी सहन नहीं किया जाना चाहिए। कोई भी सभ्य समाज महिलाओं के खिलाफ किसी भी प्रकार के भेदभाव या अत्याचार को स्वीकार नहीं कर सकता है।

महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वालों को त्वारित सजा मिलनी चाहिए।

वास्तव में, यह याद रखना उचित होगा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कई दशक पहले क्या कहा था। उन्होंने कहा था: "मैं बेटे के जन्म पर अत्यतधिक खुशी और बेटी के जन्म पर शोक मनाने का कोई कारण नहीं देखता हूं। दोनों ईश्वतर का उपहार हैं। उनके पास जीने का समान अधिकार है और दुनिया को चलाए रखने के लिए दोनों समान रूप से आवश्यक है।"

प्रिय बहनों और भाइयों, मूल रूप से, लोगों और समाज की मानसिकता में व्या पक बदलाव की आवश्यबकता है।

छोटी उम्र से ही लड़कों को लड़कियों का सम्मान करना सिखाया जाना चाहिए। लड़कों के बीच सही मूल्यों को विकसित करने और उनके चरित्र को आकार देने में माता-पिता और शिक्षकों की बहुत बड़ी भूमिका है।

वास्तहव में, लैंगिक समानता हमारे प्राचीन भारत की सांस्कृतिक विचारधारा में एक मुख्य सिद्धांत है। वैदिक काल के दौरान, गार्गी और मैत्रेयी जैसी महिला दार्शनिक वेदों पर बहस में भाग लेती थीं और अपने पुरुष समकालीनों के साथ प्रतिस्पर्धा करती थीं।

प्राचीन काल में महिलाओं को दिए जाने वाले सम्मान को इस श्लो

महिलाओं का सम्मान करना, उनकी प्रतिभा और उनके योगदान को पहचानना भारतीय जीवन शैली में शामिल है। हमारी अनेक नदियाँ महिलाओं के नाम पर हैं।

जब भी मौका दिया गया है, उन्होंने खेल से लेकर लड़ाकू विमान उड़ाने तक विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है।

भारत के विस्तृदत, समृद्ध इतिहास में उत्कृ ष्टे महिलाओं के अनेक उदाहरण हैं। जैसे चंद्रगुप्तर II की पुत्री प्रभावती, जिसने अपने राज्य में प्रशासनिक कर्तव्यों का पालन किया; रजिया सुल्ताना, दिल्ली पर शासन करने वाली एकमात्र महिला सम्राज्ञी और गांडवाना की रानी दुर्गावती। हमें मोला जैसी प्रसिद्ध कवयिसत्रियों को याद करना चाहिए जिन्होंने तेलुगु में रामायण लिखी थी; अक्का महादेवी, 12वीं शताब्दी की कन्नड़ कवयित्री तथा तमिल कवयित्री अंदल और अव्वाइयार।

विगत में, महिलाओं ने बहु-राष्ट्रीय कंपनियों की प्रमुख बनने के साथ-साथ कई क्षेत्रों में उत्कृइष्ट स्थांन हासिल किए हैं और कुछ क्षेत्रों में पुरुषों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है।

उदाहरण के लिए झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, महान गायिका लता मंगेशकर, अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला, बैडमिंटन खिलाड़ी पी.वी. सिंधु, मुक्केबाजी चैंपियन मैरी कॉम, क्रिकेटर मिताली राज, टेनिस का सितारा सानिया मिर्जा और भारोत्तो्लक कर्णम मल्लेश्वरी कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंरने भारत के गौरव और कीर्ति में वृद्धि की है।

जबकि हमारे इतिहास में उत्कृऔष्ट महिलाओं की इतनी लंबी वंशावली है, दुर्भाग्य से लैंगिक भेदभाव की एक समानांतर प्रवृत्ति भी चलन में है। इसकी परिणती कम साक्षरता, कम शिक्षा में हुई है जिसके परिणामस्वरूप कार्यबल और राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व कम है।

जैसा कि आप सभी जानते हैं, 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 के संशोधन के बाद, बेटियों को उनके पिता की पैतृक संपत्ति में समान अधिकार प्रदान किए गए हैं। इस संबंध में आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री एन.टी. रामाराव अग्रणी थे जिन्होंने ऐतिहासिक कानूनों के माध्यम से पैतृक संपत्ति में महिलाओं को समान अधिकार दिए थे।

हालांकि, ऐसा प्रतीत होता है कि कृषि भूमि की विरासत के मामले में समानता नहीं है, क्योंमकि कुछ राज्य इसे पैतृक संपत्ति के हिस्से के रूप में शामिल करते हैं और कुछ नहीं। मुझे लगता है कि इस संबंध में देश भर में एकरूपता की आवश्यकता है।

यह ध्यान देने योग्यए है कि कृषि भूमि का अधिकार ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाता है और उनके आत्मसम्मान को भी बढ़ाता है। हमें कृषि भूमि सहित परिवार विरासत में महिलाओं का समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना चाहिए।

साथ ही आजीविका कौशल के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं की सहायता करना भी उन्हें वित्तीय स्वतंत्रता प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

जहां ग्रामीण महिलाओं में साक्षरता की कमी है वहां साक्षरता को बढ़ावा देने तथा उनके बीच उद्यमशीलता की भावना का पोषण करने से उनके आर्थिक सशक्तीकरण का मार्ग प्रशस्त होगा।

धन्यवाद!

जय हिन्द!"