08 दिसंबर, 2019 को नई दिल्ली में पिलर्स ऑफ डेमोक्रेसी पर वीरेंद्र भाटिया स्मारक व्याख्यान के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | दिसम्बर 8, 2019

"मुझे महत्वपूर्ण विषय- 'लोकतंत्र के स्तंभ' पर वीरेन्द्र भाटिया स्मारक व्याख्यान देने के लिए यहां उपस्थित होने में खुशी महसूस हो रही है। मैं आयोजकों का आभारी हूं कि उन्होंने मुझे आपके साथ अपने विचार रखने के लिए यहां आमंत्रित किया है।

26 नवंबर को, हम संविधान दिवस मनाते हैं तथा हमारे संविधान में सन्निहित स्वप्नदर्शी आदर्शों का स्मरण करते हैं एवं हमारे देश के शासन के ढांचे के तीन पक्षों और स्तंभों को अधिक शक्तिशाली किए जाने की आवश्यकता है।

मुझे खुशी है कि इस वर्ष के वीरेन्द्र भाटिया स्मारक व्याख्यान में भाषण भारतीय लोकतंत्र के स्तंभों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है क्योंकि हम एक ऐसी स्थिति में हैं जहां से हमें तीन स्तंभों की कार्य पद्धति की ईमानदारी से समीक्षा करने एवं उनको और अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। यह उचित है कि आप और हम स्वर्गीय श्री भाटिया को उनके लंबे एवं विशिष्ट कार्यकाल में दो महत्वपूर्ण स्तंभों- न्यायपालिका में पेशेवर वकील एवं विधानपालिका में राज्य सभा के सदस्य के रूप में किए गए अपरिमित योगदान के लिए याद कर रहे हैं।

22 अप्रैल, 1947 को पाकिस्तान के सियालकोट के गांव शेखूपुरा में जन्में श्री भाटिया उत्तर प्रदेश के महाधिवक्ता के पद तक पहुंचे।

श्री भाटिया को उत्तर प्रदेश में तीन महत्वपूर्ण वदों अर्थात् यू.पी. के महाधिवक्ता, बार कांउसिल के अध्यक्ष और चार बार उच्च न्यायालय अवध बार एसोसिएशन के अध्यक्ष पद पर रहने का असाधारण गौरव प्राप्त हुआ था।

श्री भाटिया ने वकीलों की समस्या को सुलझाने के लिए पहल की तथा वकीलों के लिए कई महत्वपूर्ण कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं।

प्रिय भाइयों एवं बहनों,

लोकतंत्र की ताकत प्रत्येक स्तंभ की ताकत एवं स्तंभों के एक दूसरे के लिए परस्पर पूरक होने के तरीके पर निर्भर करती है।

कोई भी अस्थिर/डगमगाने वाला स्तंभ लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर बनाता है।

हमारे तीनों स्तंभों में से प्रत्येक को विधायिका, कार्यपालिका ओर न्यायपालिका को पेशेवर क्षमता, उच्च नैतिक आचरण एवं राष्ट्रीय विकास के प्रति उनकी वचनबद्धता में ताकतवर बनाने की आवश्यकता है।

हमारे स्तंभों में से प्रत्येक स्तंभ को अपनी शक्तियों के प्रयोग में स्वतंत्र होने की आवश्यकता है लेकिन राष्ट्रीय एकता, अखंडता और खुशहाली के बीच संबंधों की मजबूती के जरिए संगठित रूप से अन्य दो स्तंभों के साथ कड़ी के रूप काम करने की आवश्यकता है।

पिछले 70 सालों से, हमारा देश विश्व के सबसे बड़े एवं सर्वोत्तम कार्यपद्धति वाले संसदीय लोकतंत्र के रूप में उभर कर सामने आया है।

विधान मंडल, सामान्यत:, लोगों की आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं के प्रति उत्तरदायी रहा है। बहुत से कानूनों को लागू किया गया तथा हमारी शासन प्रणाली को पहले से बेहतर बनाने के लिए 103 बार संविधान में संशोधन किया गया।

नि:संदेह, सुधार के लिए हमेशा अवसर होता है। हाल ही में, एक आम धारणा बनी है कि संसद व राज्य विधानसभाओं में बहसों की गुणवत्ता का स्तर गिर रहा है। कभी-कभी यह देखकर निराशा होती है कि पहले की तुलना में ज्यादा हंगामा होना एक आम बात हो गई है। इससे हमें दुख होता है जब कटुता और भावनात्क आवेग कार्यवाहियों में प्रमुखता से हावी रहते हैं।

कार्यपालिका नामक स्तंभ विधानमंडलों द्वारा प्रतिपादित नीतियों के कार्यान्वयन द्वारा देश चलाने के लिए अपने आप को सुधारने के लिए प्रयासरत है। नीतिगत उद्देश्य को कार्यक्रम संबंधी प्रयोजन में बदलने एवं सेवाओं का प्रभावी रूप से वितरण, कार्यशील लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण पहलू है। आम लोगों को नीति निर्माण के केंद्र में रखकर, यह निश्चित करना कि लोकतांत्रिक कार्यपद्धति के लाभ हाशिये पर रह रहे लोगों तक पहुंचाना ही एक जीवत और गतिशील लोकतंत्र के लिए मूल भावना होनी चाहिए।

विभिन्न कानूनों का प्रभावी प्रसार और प्रवर्तन एवं लोक केंद्रित योजनाओं का कार्यान्वयन हमारे लोकतंत्र की नींव को आधार देता है।

वास्तव में, लोकतंत्र तभी सफल होता है एवं अपनी प्रासंगिकता एवं ताकत को तभी बनाए रख सकता है जब विकास के दायरे के केंद्र में लोग हों।

जैसाकि महात्मा गांधी ने कहा था, "बाहरी परिधि आंतरिक वृत को कुचलने में शक्ति नहीं लगाएगी लेकिन अंदर की सभी चीजों को ताकत देगी तथा इसी से ही उसे अपनी ताकत मिलेगी।" गांधी जी के अनुसार पदानुक्रमिक पिरामिड के समान ढांचे की बजाय हमारे पास महासागरीय वृत होना चाहिए जहां "अंतिम प्रथम के बराबर है अथवा अन्य शब्दों में, कोई भी प्रथम नहीं है एवं न ही कोई अंतिम है।" गांधी जी जानते थे कि यह आदर्शवादी परिकल्पना थी लेकिन फिर भी आवश्यक परिकल्पना थी। लेकिन फिर भी आवश्यक परिकल्पना की आकांक्षा के लिए उन्होंने इसे निर्विवाद रूप से माना। उन्होंने कहा था कि "भारत को इसकी सच्ची तस्वीर के साथ जीने दो, यद्यपि यह अपनी संपूर्णता में कभी भी मूर्त रूप नहीं ले पाएगी।"

शक्तियों का स्थानीय निकायों को अंतरण, आधारभूत ढांचे का निर्माण, सेवा वितरण को सुधारना, शासन को लोकानुकूल बनाना, पारदर्शी होना ये सभी चीजें हमें गांधी जी के स्वप्न के नजदीक ले जा सकती हैं। जब हम राष्ट्रपिता को सम्मानपूर्वक श्रद्धांजलि देते हैं तो हमें उनके जीवन के प्रमुख संदेशों को आत्मसात कर लेना चाहिए।

न्यायपालिका तीसरा स्तंभ है। यह एक महत्वपूर्ण स्तंभ है जो देश के कानूनों को प्रमुखता से क्रियान्वित करता है एवं न्याय की भावना एवं न्यायपूर्ण व्यवहार का समाज में व्यापक रूप से फैलना सुनिश्चित करता है। इसकी प्रमुख जिम्मेदारी है कि यह कानूनों की व्याख्या करे जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि विधायिका एवं कार्यपालिका को संवैधानिक ढांचे के मुताबिक चलना चाहिए तथा नियम निर्माण एवं कानूनों का कार्यान्वयन हमारे संविधान के आधारभूत सिद्धांतों के अनुसार हो।

बहनों और भाइयों,

विधायिका एवं कार्यपालिका की तरह ही न्यायिक प्रक्रिया को भी अधिकाधिक लोगों के अनुकूल होना चाहिए। यह हम सब की जिम्मेदारी है हम यह सुनिश्चित करें कि न्यायिक वितरण व्यवस्था सुलभ, विश्वसनीय, न्यायोचित एवं सभी के लिए पारदर्शिता युक्त हो।

विभिन्न न्यायालयों में मामले लंबित होना चिंता का कारण है। बार एवं पीठों द्वारा त्वरित कार्रवाई करने और सामूहिक प्रयासो से लंबित मामलों की संख्या को कम किए जाने की आवश्यकता है। देरी से किया गया न्याय, न्याय न करने जैसा है। निर्वतमान विधायकों एवं सांसदो के खिलाफ आपराधिक मामले एवं चुनाव संबंधी याचिकाओं जैसे विशेष श्रेणी के मामलों को समयबद्ध तरीके से निपटाने की आवश्यकता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि दलबदल विरोधी कानून के अंर्तगत चुनावी याचिकाएं, आपराधिक मामले एवं अयोग्यता संबंधी कार्यवाहियों को समयबद्ध तरीके निपटायी जाएं। विधान मंडल के जो सदस्य दल बदलते हैं, उनकी अयोग्यता संबंधी मामलों एवं मुकदमों के संबंध में, विधायी निकायों के सभापति को अनिवार्य रूप से निर्धारित समय-सीमा तय करनी चाहिए।

इन मामलों में न्याय वितरण में किसी भी प्रकार की देरी से लोगों का न्यायिक एवं विधायी निकायों में से विश्वास घटने लगता है।

महिलाओं के प्रति हो रहा अपराध भी बड़ी चिंता का विषय है। हमें कानून प्रवर्तन के प्रति उत्तरदायी संस्थानों को बनाना चाहिए तथा न्याय वितरण को और अधिक चुस्त बनाना चाहिए। हमें और अधिक त्वरित गति से मामले निपटाने वाले न्यायालयों की आवश्यकता है। वास्तव में, प्रक्रिया अपने आप में शीघ्र घटित होने वाली हो। गति एंव निष्पक्षता कुशल न्यायिक प्रणाली के प्रमुख घटक हैं।

वर्तमान में हम न्याय वितरण प्रणाली की स्थिति पर राष्ट्रीय बहस के बीच में है।

हम अपने संस्थानों को मापदंडों की निष्क्रियता और दुष्क्रियता के हल्केपन के माध्यम से कमजोर नहीं होने दे सकते।

सक्षम, पारदर्शी, सुलभ और एंव वहनीय न्यायप्रणाली सुशासन का प्रमुख मापदंड है। इससे आम लोगों को सुविधा होगी और साथ-साथ जीवन भी आसान होगा और इससे सरकार में विश्वास पैदा होगा।

हमें अराजकता को जन्म देने वाली और अधिक खतरनाक गिरावट को एवं शक्तियों के अनियंत्रित इस्तेमाल के तरीके को रोकना चाहिए। जितना हम अपने सदन को व्यवस्थित करते हैं उतना ही अच्छा होता जाता है। हमें प्रणाली को सुधारना एवं इसे पुन: जीवित करना चाहिए तथा इसकी अनुक्रियाशीलता को बढाना चाहिए।

बहनों और भाइयों,

मीडिया चौथा स्तंभ बनकर उभरा है क्योंकि आम जनता की राय को ढालने में इसकी व्यापक उपस्थिति एवं सुस्पष्ट प्रभाव है।

एक स्वतंत्र एंव निष्पक्ष मीडिया का अस्तित्व बेजुबानों को आवाज देने के प्रति समर्पित है जो कि एक स्वस्थ लोकतंत्र की आधारशिला है।

भारतीय मीडिया ने आपातकाल के दौरान कुछ पलों के अपवाद को पीछे छोड़ते हुए बड़े विश्वसनीय तरीके से अपनी भूमिका निभायी है।

तथापि, हाल ही में इन्टरनेट, व्यावसायीकरण, मालिकाना तरीकों में बदलाव एवं "समाचारों के साथ अपने मत", मिथ्या समाचारों का प्रसार, पेड न्यूज एवं प्रचार-प्रसार के कारण कुछ परेशान करने वाली प्रवृत्तियां सामने आई हैं।

अन्य संस्थानों की तरह, मीडिया का भी अपना नियंत्रण और संतुलन तंत्र होना चाहिए। आचार संहिता का पालन विश्वास के तौर पर और वृतिदक्षता के प्रति मीडिया की प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति के रूप में स्वैच्छिक रूप में किया जाना चाहिए।

हम भारतीय संविधान को अंगीकार किए जाने के 70वें साल को मना रहे हैं, हमें लागों की सेवा करने के लिए सभी संस्थानों को मजबूत करने के लिए दृढ संकल्प लेना होगा। हमें प्रत्येक के लिए बेहतर विश्व के निर्माण के लिए अपने आपको नई दिशा देने व पुन: समर्पित होने की आवश्यकता है। सरकार के सभी अंगों, इस भवन के सभी स्तंभों को राष्ट्र हित की रक्षा के लिए कार्य करना होगा।

यह एक नाजुक संतुलनकारी कार्य है। प्रत्येक स्तंभ को अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर कार्य करना होगा लेकिन व्यापक परिदृश्य का अवलोकन करते रहना चाहिए। यह ऑर्केस्ट्रा एक स्वर समता की तरह है, जहां प्रत्येक संगीतकार अपना वाद्ययंत्र बजाता है लेकिन एक मधुर ध्वनि उत्पन्न करने के प्रति सजग रहता है। यही अन्तिम लक्ष्य है। हमें ऐसे भारत का निर्माण करना होगा जिस पर हम सभी को गर्व हो।

लोगों के जीवन की गुणवत्ता को सुधारना तथा स्वराज्य को सुराज्य में बदलना हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

भारत हर मोर्चे पर निरंतर उन्नति कर रहा है, हमें अपनी आधारशिला को मजबूत रखने की आवश्यकता है। हमें समावेशी विकास के लिए आम सहमति को मजबूत करना है। हमें समस्त विश्व से नए विचारों को ग्रहण करने की आवश्यकता है तथा अपने पारंपरिक मूल्यों को निरंतर बनाए रखने की जरूरत है। हमें अपने संविधान में प्रतिपादित किए गए उत्तम मूलभूत कर्त्तव्यों के प्रति सजग रहना होगा।

सभी स्तंभों को अपने आप को विश्व में श्रेष्ठतम रूप में ढालने के लिए सजग प्रयास करने होंगे। हमें आगे बढने के लिए आत्मविश्वास प्राप्त करने हेतु पीछे देखना चाहिए। हमें दूरदर्शी व सक्रिय रहना चाहिए। जैसा कि एक प्रमुख तेलुगू कवि, गुराजड़ा अप्पाराव, ने अपनी एक अविस्मरणीय कविता में लिखा था,-

(हमेशा पीछे देखने में क्या तर्क है? तुम्हें आगे एवं भविष्य को देखना चाहिए,

तुम्हें धीमा नहीं पड़ना चाहिए, तुम्हें संकोची नहीं होना चाहिए,

तुम्हें साहस और विश्वास के साथ भविष्य में आगे बढना चाहिए।

यदि तुम आगे नहीं बढते, तो तुम पीछे छूट जाओगे!)

मैं श्री गौरव भाटिया एवं उनके परिवार के सभी सदस्यों का श्री वीरेन्द्र भाटिया द्वारा राष्ट्रीय विकास में अनुकरणीय रूप से निभाई गई सक्रिय भागीदारी की भावना को जीवित रखने के लिए इस स्मारक व्याख्यान को आयोजित करने के लिए अभिनंदन करता हूं।

जय हिंद!"