07 सितंबर, 2021 को चेन्नई से 36वें राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा समारोह के उद्घाटन के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा वर्चुअली दिया गया भाषण

चेन्नई | सितम्बर 7, 2021

“मैं 36वें राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़े का आयोजन करने और ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में भी सकारात्मकता और आशा का संदेश फैलाने के लिए एम्स, नई दिल्ली और राष्ट्रीय नेत्र बैंक की पूरी टीम की सराहना करता हूं।
मेरे लिए इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भाग लेना सम्मान की बात है।
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि कॉर्निया संबंधी अंधता दुनिया में अंधेपन के प्रमुख कारणों में से एक है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि दुनिया की लगभग 5% आबादी अकेले कॉर्निया संबंधी बीमारियों के कारण नेत्रहीनता से ग्रस्त है।
भारत में, लगभग 68 लाख लोग कम से कम एक आंख में कॉर्निया संबंधी अंधता से पीड़ित हैं; इनमें से 10 लाख लोग दोनों आंखों से दृष्टि बाधित हैं।
2019 के राष्ट्रीय दृष्टिहीनता एवं दृष्टिबाधिता सर्वेक्षण में कहा गया कि भारत में 50 वर्ष से कम आयु के रोगियों में अंधेपन का प्रमुख कारण कॉर्निया संबंधी अंधता है, जो कुल मामलों का लगभग 37.5 प्रतिशत है। ये गंभीर आंकड़े हैं।
इसके अलावा, कॉर्निया संबंधी अंधता 50 वर्ष से अधिक आयु के रोगियों में अंधेपन का दूसरा प्रमुख कारण है।
कॉर्निया संबंधी अंधता के साथ जी रहे हमारे लाखों देशवासियों और बच्चों की दुर्दशा पूर्णत: कल्पनातीत है।
वर्तमान में, कॉर्निया का प्रत्यारोपण ही कॉर्निया संबंधी अंधता का एकमात्र उपचार है।
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि नेत्रदान के इच्छुक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनका कॉर्निया लिया जाता है और कॉर्निया संबंधी अंधता से पीड़ित व्यक्ति की आंखों में प्रत्यारोपित किया जाता है।
हालांकि, डोनर टिश्यू की मांग और आपूर्ति के बीच बहुत बड़ा अंतर है।
  यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतने सारे लोग कॉर्निया संबंधी अंधता से इसलिए पीड़ित हैं क्योंकि प्रत्यारोपण के लिए डोनर कॉर्निया टिश्यू की कमी है।
इसलिए समय की मांग है कि नेत्रदान के महत्व के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाई जाए।
प्रत्येक राज्य में स्थानीय भाषाओं में बड़े पैमाने पर मल्टीमीडिया अभियान शुरू किए जाने चाहिएं, जिनमें विभिन्न क्षेत्रों की जानी-मानी हस्तियां और प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल हों।
लोगों को इस संबंध में लिए जागरूक किया जाना चाहिए कि अपने नेत्रदान करने के इस नेक कार्य से वे कॉर्निया संबंधी अंधता से पीड़ित लोगों को इस सुंदर दुनिया को देखने के लिए उनकी दृष्टि लौटा पाते हैं।
यदि हम सभी अपनी आंखें दान करने का संकल्प लें, तो हम कॉर्निया प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा कर रहे सभी बकाया मामलों को निपटा सकते हैं।
इस लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है और हमें इसे पूरा करने के लिए अथक प्रयास करना चाहिए।
चूंकि 80-90 प्रतिशत मामलों में अंधापन टाला जा सकता है, इसलिए हमें मोतियाबिंद, ग्लूकोमा और नेत्र संबंधी अन्य समस्याओं के इलाज के लिए नेत्र देखभाल सुविधाओं को बढ़ाने की आवश्यकता है।
ग्लूकोमा से होने वाले अंधेपन को रोका जा सकता है यदि इसका शीघ्र निदान और उपचार किया जाए।
साथ ही, देश भर में निवारक और उपचारात्मक नेत्र देखभाल को मजबूत करने के लिए एक बहु-आयामी नीति तैयार करने की तत्काल आवश्यकता है।
निस्संदेह, केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें तथा साथ ही निजी क्षेत्र भी व्यापक नेत्र देखभाल सेवाओं के माध्यम से अंधेपन को कम करने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं।
यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि ये सेवाएं ग्रामीण क्षेत्रों, विशेष रूप से देश के दूरदराज के हिस्सों में उपलब्ध हों।
 ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को व्यापक नेत्र देखभाल सेवाएं प्रदान करने के लिए सरकार के प्रयासों को गति देने में पंचायती राज संस्थाओ, शहरी स्थानीय निकायों और गैर सरकारी संगठनों को शामिल किया जाना चाहिए।
ग्रामीण आबादी का बड़ा वर्ग गुणवत्तापूर्ण नेत्र देखभाल से वंचित है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले बहुत से लोग निजी अस्पतालों में उपलब्ध महंगे उपचार का खर्च नहीं उठा सकते हैं।
इसलिए, हमें अपने सार्वजनिक क्षेत्र के नेत्र देखभाल अस्पतालों को नवीनतम तकनीकों से सुसज्जित करना चाहिए ताकि वे गुणवत्तापूर्ण उपचार प्रदान कर सकें।
यह वास्तव में सराहनीय है कि 'राष्ट्रीय दृष्टिहीनता एवं दृष्टि बाधिता नियंत्रण कार्यक्रम' का उद्देश्य व्यापक सार्वभौमिक नेत्र देखभाल सेवाओं और गुणवत्तापूर्ण सेवा प्रदायगी के माध्यम से दृष्टि बाधिता की रोकथाम और उपचार करना है।
मुझे बताया गया है कि वर्ष 1965 में आरपी सेंटर, एम्स में राष्ट्रीय नेत्र बैंक की स्थापना नेत्रदान के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देने, नेत्रदाता के नेत्रों को सहेजने, प्रत्यारोपण सर्जरी करने और अनुसंधान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी।
लोगों में जागरूकता को बढ़ावा दे करके, डोनर टिश्यू के निर्माण को सुकर बनाकर और उनके न्यायोचित वितरणा को सुनिश्चित करके डोनर टिश्यू की मांग और आपूर्ति के बीच की खाई को पाटने के लिए एक संरचित नेत्र-बैंकिंग प्रणाली महत्वपूर्ण है।
 मुझे बताया गया है कि पिछले 56 वर्षों में, राष्ट्रीय नेत्र बैंक ने 31000 से अधिक कॉर्निया एकत्र किए हैं और 20000 से अधिक कॉर्निया प्रत्यारोपण सर्जरी की हैं।
राष्ट्रीय नेत्र बैंक ने कोविड वैश्विक महामारी से पहले के 4 वर्षों के दौरान लगातार प्रति वर्ष 1000 से अधिक सर्जरी की है।
राष्ट्रीय नेत्र बैंक की टीम पिछले पांच दशकों के दौरान कॉर्निया संबंधी अंधता से प्रभावित हजारों लोगों को दृष्टि प्रदान करके उन्हें सशक्त बनाकर एक सराहनीय कार्य कर रही है।
राष्ट्रीय नेत्र बैंक की टीम को हजारों लोगों की दृष्टि बहाल करने के नेक प्रयास के लिए मेरी शुभकामनाएं।
प्रिय बहनों और भाइयों,
सभी जानते हैं कि छोटे बच्चों में आंखों की बीमारी एक आम समस्या है।
ऐसा माना जाता था कि शायद शहरी स्कूली बच्चों को आंखों की बीमारी होने का खतरा अधिक होता है। लेकिन अब ग्रामीण स्कूलों में भी हम देखते हैं कि कुछ बच्चे निकट दृष्टि दोष से पीड़ित हैं।
बच्चों के वीडियो गेम, मोबाइल, कंप्यूटर, टेलीविजन के अत्यधिक इस्तेमाल से उनके नेत्र स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
इसलिए, प्रौद्योगिकी के अत्यधिक उपयोग के प्रतिकूल प्रभावों की रोकथाम के लिए बच्चों द्वारा डिजिटल उपकरणों के उपयोग को नियंत्रित करने की अत्यधिक आवश्यकता है।
हाल के महीनों में, मैं इस बात पर बल देता रहा हूं कि बच्चों में गैजेट की बढ़ती लत चिंता का विषय है जिस पर तत्काल ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
आज पूरी दुनिया कोविड-19 वैश्विक महामारी की उत्तरोत्तर लहरों से जूझ रही है।
विश्व स्तर पर, सभी देश संक्रमण के स्थानीय प्रसार और सामुदायिक प्रसार को रोकने के लिए प्रयास कर रहे हैं और इस नए संक्रमण से जूझते हुए हर जगह स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढांचा चरमरा गया है।
 भारत ने अपनी विशाल आबादी और सीमित संसाधनों के बावजूद महामारी पर काबू पाने में जबरदस्त काम किया है।
 हालाँकि, बहुत सी नियमित गैर-आपातकालीन चिकित्सा क्रियाकलापों को इस महामारी की वजह से सर्वाधिक नुकसान उठाना पड़ा है और नेत्र-बैंकिंग प्रणाली भी इसका शिकार हुई है।
मुझे बताया गया है कि भारत सहित विभिन्न देशों के नेत्र-बैंकिंग दिशानिर्देशों में सक्रिय लॉकडाउन उपायों को लागू किए जाने पर नेत्रदाता से कॉर्निया की प्राप्ति और वैकल्पिक कॉर्निया प्रत्यारोपण सर्जरी को अस्थायी रूप से लंबित रखने की सलाह दी गई थी।
मेरा मानना है कि इसके कारण राष्ट्रव्यापी और राज्यव्यापी लॉकडाउन के दौरान पूरे भारत में कॉर्निया प्रत्यारोपण सर्जरी में लगभग 52% और नेत्रदान संग्रहण में 63% की गिरावट के साथ कॉर्निया की लगभग नगण्य प्राप्ति हो पाई।
जैसे-जैसे इस नए वायरस के बारे में हमारी जानकारी बढ़ी है, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि डोनर कॉर्निया के जरिए वायरस के फैलने की संभावना बहुत कम है।
  हमारे देश में, हॉस्पिटल कॉर्निया रिट्रीवल प्रोग्राम के माध्यम से गैर-कोविड अस्पतालों में नेत्र बैंकिंग संबंधी क्रियाकलापों को फिर से शुरू किया गया है।
हालांकि, मुझे बताया गया है कि महामारी के कारण कॉर्नियल पुनर्प्राप्ति पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण कॉर्नियल प्रत्यारोपण के लिए आवश्यक टिश्यू की कमी हो गई है।
 इससे डोनर टिश्यू की मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर और लंबित मामलों की संख्या बढ़ गया है।
टिश्यू की उपलब्धता के मौजूदा संकट से निपटने के लिए, टिश्यू के दीर्घकालिक संरक्षण और ऐसी वैकल्पिक शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं जिनमें डोनर टिश्यू की आवश्यकता नहीं होती है, जैसे अभिनव उपायों पर विचार किया जाना चाहिए।
 जैसे-जैसे कोविड-19 के बारे में हमारी समझ बढ़ेगी, हमें नेत्र-बैंकिंग और टिश्यू प्राप्ति के संबंध में दिशानिर्देशों को संशोधित करने की आवश्यकता पड़ सकती है ताकि लगातार बदलती चुनौतियों और आवश्यकताओं के अनुकूल कार्य किया जा सके।
वैकल्पिक सर्जरी के फिर से शुरू होने से कॉर्निया संबंधी टिश्यू की मांग में और वृद्धि होगी।
इस प्रकार, ऐसे कठिन समय में, हमें कॉर्निया संबंधी टिश्यू की उपलब्धता और इसकी वास्तविक आवश्यकता के बीच के इस अंतर को पाटने के अपने प्रयासों को और तेज करने की आवश्यकता है।
प्रिय बहनों और भाइयों,
हमारा देश 'वसुधैव कुटुम्बकम' में विश्वास रखता है। हमें याद रखना चाहिए कि 'साझा करना और देखभाल करना(शेयर एंड केयर)' की भावना भारतीय दर्शन के मूल में है।
हमारी संस्कृति एक ऐसी संस्कृति है जहां शिबि और दधीचि जैसे राजाओं और महात्माओं ने अपना शरीर दान किया था। ये उदाहरण हमारे समाज के मूल मूल्यों, आदर्शों और संस्कारों के मुताबिक हैं।
हमें लोगों को प्रेरित करने और अंगदान को बढ़ावा देने के लिए इन मूल्यों और इतिहास को आधुनिक संदर्भ में फिर से परिभाषित करना होगा।
अंग दान करके व्यक्ति न केवल किसी व्यक्ति को अधिक परिपूर्ण जीवन जीने में मदद करता है, बल्कि दूसरों के लिए समाज की व्यापक भलाई के लिए काम करने के लिए एक उदाहरण भी स्थापित करता है।
मिथकों और झूठी मान्यताओं के कारण, कई लोग अपने मृत परिवार के सदस्यों की आंखें दान करने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं।
इसलिए, ऐसी मान्यताओं को नकारना और नेत्रदान के महत्व के संबंध में जागरूकता पैदा करना अनिवार्य है।
आइए हम अपने उन साथियों को "दृष्टि का उपहार" दें, जिन्हें इसकी आवश्यकता है। मरने के बाद भी जीने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता है कि आप अपनी आंखें दान करें!
मैं यहां उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति से अनुरोध करना चाहता हूं कि न केवल अपनी आंखें दान करने का संकल्प लें बल्कि दृष्टि का उपहार देने के इस नेक काम के बारे में जागरूकता फैलाने का भी संकल्प लें।
मैं अपना भाषण इस संदेश के साथ समाप्त करना चाहता हूं- अपनी आंखें दान करें और मृत्यु के बाद भी अपनी आंखे जिंदा रखें।"
जय हिन्द!”