07 जुलाई, 2019 को नई दिल्ली में वेदांत भारती द्वारा भारतीय ज्ञान परंपरा की झलक देने वाली, दस भाषाओं में प्रकाशित विवेकदीपनी नामक संक्षिप्त पुस्तक का विमोचन करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | जुलाई 7, 2019

“मुझे सुबोध भाषा में भारतीय ज्ञान की झलक दिखाने वाली सूक्तियों की लघु पुस्तिका विवेकदीपिनी का विमोचन करने के अवसर पर आप सभी से मिल कर बड़ी खुशी हो रही है।

मुझे इस पुस्तक का विमोचन करते हुए बड़ी खुशी हो रही है और मैं आशा करता हूं कि भारत की महान आध्यात्मिक और साहित्यिक प्रतिभा श्री आदि शंकराचार्य द्वारा लिखित यह गौरव ग्रंथ 'प्रश्नोत्तर रत्नमालिका’ बड़ी संख्या में पाठकों को पसंद आएगा।

मैं श्री आदि शंकराचार्य के ज्ञानपूर्ण संदेशों का अंग्रेजी, कन्नड़, हिंदी, तमिल, बांग्लार, उड़िया, तेलुगु, मलयालम, मराठी और गुजराती भाषाओं के माध्यतम से प्रचार- प्रसार करने के लिए वेदांत भारती और श्री एस.एस. नागानंद जी की सराहना करता हूं। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि कर्नाटक के लगभग 10000 विद्यालयों में छात्रों को विवेकदीपिनी के चुनिंदा श्लोक पढ़ाए जा रहे हैं। मुझे यकीन है कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में विवेकदीपिनी का अनुवाद करने की आपकी सराहनीय योजना से देश भर के विभिन्न राज्यों के अधिकाधिक स्कूलों और अधिकाधिक पाठकों तक भारतीय ज्ञान के सार्वभौमिक संदेश का प्रसार होगा।

बहनों और भाइयों,

यह हम भारतीयों का सौभाग्य है कि वर्षों से आदि शंकराचार्य और स्वामी विवेकानंद जैसे आध्यात्मिक गुरूओं ने हमारे देश के नैतिक मूल्योंर की नींव रखी है।

प्रिय बहनों और भाइयों,

आदि शंकराचार्य द्वारा लिखित प्रश्नोत्तर रत्नमालिका के 67 श्लोकों को आधार बनाकर लिखी गई विविकदीपिनी में उन चुनिन्दा 36 सूक्तियों का संकलन है जो प्रश्न-उत्तर स्वरूप में है।

इन ज्ञानपूर्ण सूक्तियों की धर्म और समुदाय विशेष से इतर सार्वभौमिक प्रासंगिकता है।

ये विश्व के प्रति भारत के नैतिकता और सदाचारपूर्ण दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती हैं।

बहनों और भाइयों,

इस पुस्तक का नाम 'प्रश्नोत्तर रत्नमालिका', प्रश्नोत्तर रूपी रत्नों की माला है। इसमें कई महत्वपूर्ण विषयों का समावेश है और यह अनेक महत्वपूर्ण प्रश्नों के सारगर्भित उत्तर देती है।उदाहरण के लिए, "एक पंडित या विद्वान व्यक्ति कौन होता है"? इस प्रश्न का उत्तर है "विवेकी", "जिसके पास ज्ञान है"। इस प्रश्न के लिए कि पवित्रता क्या है, इसका उत्तर है "यस्य मानसमं शुद्धम्" (जिसका मन शुद्ध है)। ये श्लोक खुशी, संतृप्ति और ज्ञान के लिए मानवीय खोज को परिभाषित करते हैं जो सशक्त और उद्दात बनाते हैं।

किसी छात्र के इस प्रश्न पर कि "किम सत्यम" (सत्य क्या है?), शिक्षक उत्तर देता है कि "भूतहीताम" या "सभी प्राणियों के कल्याण"। इसमें अच्छे व्यवहार पर बल दिया गया है। एक साधु को 'अच्छे आचरण' वाले व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है।

यह लघु पुस्तिका विवेकेदीपिनी प्रश्नोत्तर रत्नमाला का सारांश है। यह खुशी की बात है कि इस पुस्तक का दस भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया है। हमें प्राचीन भारत के ज्ञान के प्रसार के लिए इस तरह के प्रयासों की और अधिक आवश्यकता है।

हमारे देश में एक बहुमूल्यक खजाना है। यह एक ऐसा खजाना है जिसका सकारात्मक प्रभाव दुनिया भर में महसूस किया गया है। यह एक ऐसा खजाना है, जो हमें वैश्विक स्तर पर शांति, नैतिक आचरण और सतत विकास का प्रतिनिधित्वज करने के लिए प्रेरित करता है।

यह धर्म का मार्ग है, ऐसा मार्ग जो हमें संभालता है और हमसे एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करवाता है जो न केवल अपने लिए बल्कि संपूर्ण मानवता और संपूर्ण ग्रह के लिए अच्छा है।

हमें इस प्राचीन ज्ञान को पुनः खोजना चाहिए, जो कभी-कभी अनदेखा और अनसुना हो जाता है और इसलिए पूरी तरह से समझ में नहीं आता है।

यदि हम इस खजाने के बारे में पता नहीं है, तो हम अतीत के साथ जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी को खो देंगे। हम अपने वर्तमान को समृद्ध करने की क्षमता खो देंगे।

हमें उस नेक विचार प्रक्रिया के साथ कड़ी जोड़ने, इसे अपने समकालीन जीवन संदर्भ में ढालने की जरूरत है।

आदि शंकर की रचनाएँ आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि के संदर्भ में उनकी असाधारण गहराइयों के अलावा विश्व साहित्य की बेहतरीन साहित्यिक कृतियों में से एक हैं। वे हमें वशीभूत करते हैं और हमें रोमांचित करते हैं। वे और अन्य भारतीय विचारक हमारे समाज के नैतिक स्तंभों को सुदृढ़ करते हैं। लेकिन यह केवल जागरूकता, अध्ययन और जो सबसे महत्वपूर्ण है, समावेशन और व्यवहार परिवर्तन के माध्यम से ही हो सकता है।

इस पुस्तक के श्लोकों में सार्वभौमिक सत्य है। वे हमारे गहन चिंतन के लिए शुरुआती बिंदु हैं।

उदाहरण के लिए, श्लोक 16 में यह प्रश्न है कि “आपका मित्र कौन है? इसका उत्तर है "जो आपको पाप करने की अनुमति नहीं देता है वह आपका सबसे अच्छा दोस्त है।"

" अलंकरण क्या है?" उत्तर है, "चरित्र सच्चा अलंकरण है"।

श्लोक 18 में हमें चार शुभ कार्यों के बारे में बताया गया है , जो किसी व्यक्ति को जितनी बार संभव हो, करना चाहिए - विनम्र शब्दों के साथ दान पुण्य , बिना अभिमान के ज्ञान, संयम के साथ वीरता, दान के साथ धन।

आप सहमत होंगे कि ज्ञान के ये श्लोक वास्तव में सार्वभौमिक हैं। यह बौद्धिक विरासत हैं जिस पर हर भारतीय को न केवल गर्व करना चाहिए बल्कि रोजमर्रा के जीवन में उन मूल्यों का पालन भी करना चाहिए।

हमें एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण, बड़े पैमाने पर जागरूकता और ज्ञान साझा करने के आंदोलन की आवश्यकता है जो भारतीय विचारों को आम आदमी तक पहुंचाए।

वेदांत भारती जैसे गैर-सरकारी संगठनों सहित हमारे स्कूलों और कॉलेजों को भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में समाहित सहिष्णुता, समावेश, सद्भाव, शांति, मंगल-भावना, नैतिक आचरण, उत्कृष्टता और सहानुभूति, जो भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में स्पष्टता के साथ परिलक्षित होती है, के सार्वभौमिक संदेश को फैलाने के लिए नेतृत्व करना चाहिए।

हमें एक ऐसा समाज बनाना होगा जो वास्तव में "शेयर और केयर" के मूल भारतीय दर्शन और मूल्यों को प्रदर्शित करता हो।

मुझे खुशी है कि वेदांत भारती ने हमारे नागरिकों को हमारी बौद्धिक परंपरा से जोड़ने के लिए यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी ली है। मेरा सुझाव है कि वेदांत भारती को इस ज्ञान यज्ञ को जारी रखना चाहिए और पिछले दो हजार वर्षों में ऋषि- मुनियों और विचरवान व्यक्तियों की लंबी वंशावली द्वारा रखी गई नैतिक नींव पर एक नए भारत के निर्माण में योगदान देना चाहिए।

मैं एक बार फिर श्री एस.एस. नागानंद जी को इस तरह सुबोध आख्यान लिखने के लिए बधाई देता हूं। मैं उन्हें और वेदांत भारती को भविष्य में कई और उपयोगी प्रकाशनों की सफलता के लिए शुभकामनाएं देता हूं।

जय हिन्द।"