07 जुलाई, 2018 को चेन्नई में, चेन्नई अंतर्राष्ट्रीय केंद्र की दूसरी वर्षगांठ समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का भाषण

चेन्नई | जुलाई 7, 2018

"70 वर्ष से अधिक पहले, हमने सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय और प्रतिष्ठा और अवसर की समता सुरक्षित करने की प्रतिबद्धता के साथ स्वयं को एक संविधान समर्पित किया था। तथापि, आज भी, हम समावेशी विकास के लिए प्रयासरत हैं और देश गरीबी, निरक्षरता और शहरी ग्रामीण विभाजन जैसी कई चुनौतियों से जूझ रहा है।

यहां तक कि यदि भारत विकासशील से विकसित देश बन जाता है, फिर भी देश को इस शहरी-ग्रामीण विभाजन पर ध्यान देना और उस अंतर को समाप्त करना बड़ी चुनौतियों में से एक है। यदि इस अंतर को पाटा नहीं गया, तो यह देश की प्रगति में बाधक बन सकता है।

नि:संदेह, भारत ने आजादी के बाद से विभिन्न क्षेत्रों में प्रभावशाली कदम उठाए हैं और यह तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। देश अगले 10-15 वर्षों में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए तैयार है। विकास की इस गाथा में शहरीकरण एक प्रमुख उत्प्रेरक रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों और बड़े कस्बों में हजारों लोग के पलायन से, शहरीकरण एक अपरिवर्तनीय घटना बन गया है। यह अनुमान लगाया गया है कि 2030 तक भारत की जनसंख्या का 50 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में रह रहा होगा।

सुशासन का एक महत्वपूर्ण संकेतक असमानताओं को कम करना और समावेशी विकास सुनिश्चित करना है। यह और भी आवश्यक हो जाता है जब हम विकास और विभिन्न लाभों तक पहुंचने की दृष्टि से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच एक व्यापक अंतर को पाटना चाहते हों। मुझे लगता है कि ग्रामीण पूर्वाग्रह वाली कुछ नीतियों को बदलना चाहिए ताकि विकास और संवृद्धि के लाभ सभी नागरिकों तक पहुंच सकें।

हम सभी जानते हैं कि गांवों से शहरी क्षेत्रों में लोगों के पलायन के मुख्य कारण नौकरी के अवसरों की कमी, अपर्याप्त चिकित्सा और शैक्षणिक सुविधाएं हैं। बिजली की अनियमित आपूर्ति, पेयजल की कमी और अपर्याप्त स्वच्छता गांवों में रहने वाले लोगों के समक्ष आने वाली प्रमुख चुनौतियां हैं।

प्रधान मंत्री, श्री नरेंद्र मोदी के 'सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन' के लिए तीन शब्द के मंत्र को सभी हितधारकों-सरकार, स्थानीय निकायों, शैक्षणिक और चिकित्सा संस्थानों, गैर सरकारी संगठनों और निजी क्षेत्र को अक्षरश: लागू करना होगा ताकि आम तौर पर ग्रामीणों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के जीवन का पूर्ण रूप से कायापलट हो सके।

देश केवल तभी तेजी से प्रगति कर सकता है और शहरी और ग्रामीण दोनों लोगों के जीवन में परिवर्तन ला सकता है जब हम सामूहिक रूप से गरीबी, निरक्षरता, जाति और लिंग भेदभाव को खत्म करने और काले धन और आतंकवाद जैसी दो समस्याओं को समाप्त करने का प्रयास करें।

यह नोट किया जाना चाहिए कि शहरी जीवन शैली में समायोजित होने के शुरुआती चरणों की कठिनाइयों के बावजूद ग्रामीण लोग बेहतर जीवन की तलाश में शहरी क्षेत्रों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। गैर-लाभकारी कृषि और शहरी क्षेत्रों में बेहतर शैक्षणिक सुविधाओं की उपलब्धता ग्रामीण युवाओं को उनके गांवों से बाहर निकलने के लिए मजबूर कर रही है।

पलायन की प्रक्रिया का नकारात्मक पक्ष यह है कि यह परिवारों को अलग-अलग कर देता है- परिवार के युवा और सक्षम सदस्य बाहर निकल जाते हैं जबकि बुजुर्ग लोग या बड़े-बूढ़े लोग गांवों में रह जाते हैं और प्राय: स्वयं पर ही आश्रित होते हैं। इसके अलावा, कई मामलों में, बच्चों को दादा-दादी द्वारा पालन-पोषण के लिए छोड़ दिया जाता है। यह भी सच है कि सभी प्रवासियों को जीवन की उचित गुणवत्ता का आनंद नहीं मिलता है क्योंकि उन्हें गुजारे लायक नौकरियां मिल पाती हैं।

तेजी से शहरीकरण का एक और नकारात्मक प्रभाव प्रदूषण, आवास की कमी, यातायात की भीड़ और मलिन बस्तियों से ग्रस्त शहरों और कस्बों की संख्या में दिन-प्रतिदिन खतरनाक और अनियमित वृद्धि होना है। अनियमित विकास के कारण नागरिक सुविधाओं में भी समस्याएं हो रही हैं।

चूंकि भारत की जनसंख्या का लगभग 65 प्रतिशत गांवों में रह रहा है, इसलिए सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों जैसी बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध कराने से लेकर डिजिटल कनेक्टिविटी और औद्योगिक विकास सुनिश्चित करने तक व्यापक ग्रामीण विकास पर और अधिक जोर देने और ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है। संक्षेप में, शहरों में उपलब्ध सभी सुविधाएं ग्रामीण इलाकों में उपलब्ध कराई जानी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता में भारी अंतरों को देखते हुए, संबंधित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त कुटीर इकाई को बढ़ावा देने की क्षमता का पूरी तरह से दोहन किया जाना चाहिए।

वास्तव में, पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम ने गांवों को भली-भांति विकसित शहरों के समतुल्य लाने के साधन के रूप में पीयूआरए (ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएं प्रदान करना) की अवधारणा के बारे में बात की थी।

यह वास्तव में चिंता का गंभीर विषय है कि जो लोग, दशकों से कृषि पर निर्भर थे, अब वह भी यह व्यवसाय जारी नहीं रखना चाहते हैं। समय की मांग है कि आजीविका कमाने और शहरों में उनका पलायन रोकने के लिए उन्हें पोल्ट्री और डेयरी जैसी संबद्ध गतिविधियों में व्यवसाय-विविधता प्रदान की जाए। इस दिशा में सभी हितधारकों को समन्वित प्रयास करने होंगे ताकि यह सभी के लिए लाभ की स्थिति हो।

फसलों का विविधीकरण, खाद्य प्रसंस्करण के माध्यम से मूल्यवर्धन, बेहतर आधारभूत संरचना और बेहतर विपणन प्रणाली को सक्षम बनाया जाना समय की आवश्यकता है।

हमें किसानों की चिंताओं को दूर करने के लिए बहुआयामी रणनीति को अपनाने की जरूरत है। सरकार अपनी पूरी कोशिश कर रही है। एमएसपी में हाल में की गई वृद्धि एक स्वागत योग्य कदम है। लेकिन कृषि को लाभप्रद बनाए रखने के लिए और अधिक कार्य किये जाने की जरूरत है। किसानों के ऋण माफ करना कोई स्थायी समाधान नहीं है। हमने हमेशा उपभोक्ताओं की चिंताओं को दूर करने की कोशिश की, लेकिन हमें संतुलित और समग्र दृष्टिकोण अपनाने और उत्पादकों का संरक्षण करने की आवश्यकता है।

हाल के समय में, कृषि संकट ने देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया है। आत्महत्या और ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन को रोकने के लिए किसानों की कम आय, कम क्रय शक्ति और आय के द्वितीयक स्रोत की अनुपस्थिति जैस कुछ प्रमुख मुद्दों का समाधान करने की आवश्यकता है। इस प्रकार, दोनों क्षेत्रों के बीच असंतुलन को कम करने के लिए शहरी विकास और ग्रामीण प्रगति को साथ-साथ चलना होगा।

नि:संदेह, समेकित शहरी ग्रामीण विकास दुनिया भर में बड़ी चुनौती है। इस क्षेत्र में भारत कोई अपवाद नहीं है।

जबकि शहरी-ग्रामीण अंतर को क्षेत्रों की एक श्रृंखला में देखा जा सकता है, शहरी क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों के केन्द्रित होने से शहरी क्षेत्रों में स्वाभाविक रूप से आय का स्तर उच्च हो जाता है जबकि ग्रामीण इलाकों में गरीबी चरम पर रहती है। हाल में सामाजिक-आर्थिक और जाति-आधारित जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत के ग्रामीण परिवारों में से लगभग 30 प्रतिशत भूमिहीन हैं और आय के लिए मजदूरी पर निर्भर हैं।

इंटरनेट के सर्वव्यापी होने के साथ, मैंने पहले उल्लेख किया था कि ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, 2017 में ग्रामीण क्षेत्रों में 20.26 प्रतिशत के मुकाबले शहरी भारत में इंटरनेट की पहुंच 64.84 प्रतिशत थी। इंटरनेट तक कम पहुंच से ग्रामीण क्षेत्र इंटरनेट के लाभों का उपयोग करने से वंचित रह जाते हैं।

शहरी-ग्रामीण अंतर वांछनीय नहीं है और इसे नीति निर्माताओं, नौकरशाहों, बुद्धिजीवियों, सिविल सोसाइटी संगठनों और निजी संगठनों को सावधानीपूर्वक, समन्वित और समेकित प्रयासों से समाप्त करना होगा। हम भारत के लोगों ने कई चुनौतियों पर सफलतापूर्वक विजय प्राप्त की है! इसका राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक कौशल के साथ सफलतापूर्वक समाधान किया जा सकता है।

प्रिय बहनो और भाइयो,

मैं चाहता हूं कि आप उन नवाचारों पर ध्यान केंद्रित करें जो कमजोर और आर्थिक पिरामिड के सबसे नीचे रह रहे लोगों की जरूरतों को पूरा करेंगे। यहां, मैं गांधी जी के जंतर के रूप में वर्णित बात को स्मरण करना चाहूंगा: "जब भी आप संदेह में हों, या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौटी आजमाओ उस सबसे गरीब और दुर्बल पुरुष/महिला का चेहरा याद करो जिसे आपने देखा हो, और अपने आप से पूछो, जो कदम मैं उठाने जा रहा हूँ, वह उस पुरुष/महिला के लिए कितना उपयोगी होगा क्या उससे उसे कुछ लाभ पंहुचेगा? क्या उससे वह अपने जीवन और भाग्य पर कुछ नियंत्रण रख सकेगा? दूसरे शब्दों में, क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य (स्वतंत्रता) मिल सकेगा जिनके पेट भूखे और आत्मा अतृप्त है?"

हमारा लक्ष्य अंततः समावेशी विकास को प्राप्त करना और आर्थिक पिरामिड के सबसे नीचे के लोगों की जरूरतों को पूरा करने में मदद करना है। यह वास्तव में गांधीजी, डॉ अम्बेडकर और दीनदयाल उपाध्याय का दृष्टिकोण था, ये सभी एक समावेशी समाज के विकास और हर प्रकार की असमानता को हटाने की इच्छा रखते थे।

शहरी-ग्रामीण अंतर को पाटने के कुछ महत्वपूर्ण उपायों में गांवों को विद्युत ग्रिड से जोड़ना, बिजली और पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करना शामिल हैं। पर्याप्त विद्युत नहीं मिलना ग्रामीण भारत का अभिशाप रहा है और इसका युद्ध-स्तर पर समाधान करना होगा। ग्रामीण विद्युतीकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सरकार उस दिशा में आगे बढ़ रही है।

स्वच्छ भारत, प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना, डिजिटल इंडिया, भारत नेट प्रोजेक्ट, प्रधान मंत्री आवास योजना और दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना जैसी विभिन्न सरकारी योजनाएं सही दिशा में उठाये गए कदम हैं और उन्हें अधिक मजबूती के साथ लागू किया जाना चाहिए।

पूर्व राष्ट्रपति, डॉ अब्दुल कलाम ने कहा था: "स्मार्ट आवास गांवों और किसी शहर का एक एकीकृत क्षेत्र है जो तालमेल से काम कर रहे हों और जहां ग्रामीण और शहरी अंतर एक बारीक रेखा तक कम हो गया है।" मुझे लगता है कि स्मार्ट सिटी केवल तभी स्थायी रह सकते हैं जब वे स्मार्ट गांवों के साथ सह-अस्तित्व में हों। स्मार्ट गांवों में व्यवसायों को स्थानांतरित करने से ग्रामीण भारत में अधिक रोजगार मिलेगा, शहरी क्षेत्रों में भीड़ कम होगी, ग्रामीण आय बढ़ेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

ग्रामीण क्षेत्रों में व्यवसायों और उद्यमों के फलने-फूलने के लिए, अच्छी तरह से जुड़े हुए, किफायती परिवहन व्यवस्था, बिजली की निर्बाध आपूर्ति, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। गांवों को आर्थिक केंद्रों में बदलने के लिए ग्रामीण युवाओं को कौशल प्रदान करना, कम लागत पर ऋण और बाजार से संपर्क प्रदान करना भी अत्यावश्यक है। जिन उद्योगों या व्यवसायों को स्थानजनित लाभों की आवश्यकता नहीं है, उन्हें प्रोत्साहन प्रदान करके ग्रामीण क्षेत्रों में जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

कृषि के अतिरिक्त श्रमिकों को अन्य लाभकारी क्षेत्रों में स्थानांतरित किया जाना समय की मांग है। ग्रामीण उद्यमिता क्रांति ग्रामीण अर्थव्यवस्था और ग्रामीण लोगों के जीवन स्तर को बदल डालेगी।

संविधान के प्रति हमारी वचनबद्धता यह सुनिश्चित करना है कि हम देश की तीव्र और निर्बाध प्रगति के लिए और लोगों का सद्भावपूर्ण सह-अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए हर प्रकार के विभाजन को समाप्त करें।

मैं देखना चाहता हूं कि गांधी जी का "गांवों की ओर लौटो" का आह्वान शीघ्र ही एक वास्तविकता बन जाए और ग्रामीण भारत और गांवों के समूह स्वयं को फलते-फूलते हुए आर्थिक और व्यावसायिक केंद्रों में परिवर्तित कर दें। हमें स्वराज को सुराज्य में बदलने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। यह एक नए भारत में परिवर्तन का उद्देश्य है। आधार, जैम (जनधन-आधार-मोबाइल) और डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) प्रगति का पथ है।

जय हिन्द!"