07 जनवरी, 2020 को बेंगलुरु में पूर्णाप्रजना विद्यापीठ में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

बेंगलुरू | जनवरी 7, 2020

“परम पूज्य श्री विश्वप्रसन्नतीर्थ स्वामीजी

श्री विश्वेश तीर्थ स्वामीजी के भक्त और शिष्य

बहनों और भाइयों,

1956 में श्री विश्वेश तीर्थ स्वामीजी द्वारा स्थापित इस पूर्णप्रज्ञा विद्यापीठ में आकर आज मैं भावाभिभूत हो गया हूँ।

मुझे श्री श्री पेजावर विश्वेश तीर्थ स्वामीजी का आशीर्वाद पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। वे श्रीमद्भागवत और भगवद्गीता की शिक्षाओं के सच्चे अनुयायी थे। उन्होंने अपना जीवन वर्तमान जीवन के सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक जीवन को शुद्ध करने के लिए समर्पित किया।

पेजावर स्वामीजी गांधीवादी सिद्धांत "मानवता की सेवा ही ईश्वर की सेवा है" में विश्वास करते थे। उन्होंने अपने महान और निस्वार्थ कर्मों के द्वारा इस महान आदर्श का अनुसरण किया।

90 वर्ष की आयु में, जब तक उन्होंने हरिपद को प्राप्त नहीं किया, श्री स्वामी जी ने अपने यत्रों, प्रवचनों, शिक्षाओं और वार्ताओं के माध्यम से देश भर में असंख्य लोगों के जीवन को प्रभावित किया।

हमारे राष्ट्र में महान संतों, ऋषियों और मुनियों की एक लंबी परंपरा रही है । प्राचीन काल से वे समाज के मार्गदर्शक रहे हैं। उन्होंने संकट के समय सदैव पीड़ित लोगों की सहायता की है और उन्हें सांत्वना दी है। वेदों, उपनिषदों और पुराणों में इस महान और कालातीत ज्ञान का कभी न समाप्त होने वाला ख़जाना मौजूद है।

हमारे प्राचीन ऋषियों ने हमेशा समाज के कल्याण को बाकी चीजों से ऊपर रखा। महान पौराणिक ऋषि दधीचि ने यह सुनिश्चित करने के लिए अपने जीवन का बलिदान किया कि समाज धर्म के मार्ग पर बना रहे।

श्री विश्वेश तीर्थ स्वामीजी इस गौरवशाली परंपरा में एक महान आत्मा की तरह हैं। वे समर्पित भाव से समाज सेवा में लगे लोगों के लिए एक आदर्श थे। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान वे सदैव जरूरतमंदों और गरीबों की मदद के लिए तत्पर रहते थे।

जब आंध्र प्रदेश के हमसलादेवी इलाके में चक्रवाती तूफान आया तो श्री स्वामीजी लोगों की मदद के लिए सबसे पहले पहुंचने वाले लोगों में से थे। उन्होंने उन लोगों के लिए 150 घर बनाए जिन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा था।

पुन:, 1993 में जब महाराष्ट्र के लातूर क्षेत्र में भूकंप आया, तब वह सबसे पहले उनकी मदद करने के लिए पहुंचने वाले लोगों में से थे। इसी तरह उन्होंने तमिलनाडु के कुड्डालोर क्षेत्र में सुनामी से प्रभावित लोगों के पुनर्वास में मदद की।

सूखे के दौरान, श्री स्वामी जी ने कई क्षेत्रों में निशुल्क भोजन केंद्र खोलने का काम किया। थोड़े शब्दों में कहें तो उन्होंने प्रत्येक मनुष्य में दिव्यता देखी और निःस्वार्थ भाव से जरूरतमंदों की सेवा करने का प्रयास किया।

श्री पेजावर स्वामीजी एक प्रगतिशील स्वप्नदर्शी थे। वे आधुनिक भारत के उन आरंभिक आध्यात्मिक नेताओं में से थे, जो दलितों को हिंदू समाज का अभिन्न अंग मानते थे। वे 1970 में बेंगलुरु के मल्लेश्वरम में दलित कॉलोनियों में गए। इससे पहले उन्होंने तमिलनाडु के ऊटी में हरिजनकेरी में इसी प्रकार की यात्रा की थी।

स्वामीजी का नाम भारत में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सेवा का पर्याय है और उन्होंने उन्हें राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा में लाने के लिए कड़ी मेहनत की।

मैं सभी से श्री स्वामीजी के दिखाए मार्ग पर चलने और भारत में जातिमुक्त समाज के निर्माण की दिशा में काम करने का आह्वान करता हूं।

एक अन्य क्षेत्र जहां परम पूज्य श्री श्री विश्वेश तीर्थ स्वामीजी का योगदान प्रमुख रहा, वह था संस्कृत भाषा का क्षेत्र। उन्होंने संस्कृत, दर्शन और धर्म में अकादमिक शोध को प्रोत्साहित किया। वे देश के इस हिस्से में संस्कृत को बढ़ावा देने वाले अग्रदूतों में से एक थे।

संस्कृत पर इस प्रकार से जोर दिया जाना हमारी संस्कृति और साझा मूल्यों को बनाए रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने इस संस्कृत आध्यात्मिक पाठशाला पूर्णप्रज्ञा विद्यापीठ की स्थापना की। यह स्वतंत्र भारत के पहले संस्कृत पारंपरिक गुरुकुल शिक्षा केंद्रों में से एक है।

मुझे उम्मीद है कि यह गुरुकुल गुरु - शिष्य परम्परा के माध्यम से सीखने की महान भारतीय परंपरा को आगे ले जाएगा।

मुझे आशा है कि यहां से शिक्षा ग्रहण करने वाले सभी शिष्य श्री विश्वेश तीर्थ स्वामीजी के संदेश और शिक्षाओं का अनुसरण करेंगे और उनका प्रसार करेंगे।

मैं आप सभी को शुभकामनाएं देता हूं और पुन: महान स्वामीजी की स्मृति में उनको नमन करता हूं।

धन्यवाद।

जय हिन्द!"