07 अगस्त, 2021 को उप राष्ट्रपति निवास, नई दिल्ली में सामाजिक कार्यकर्ता श्री चमन लाल की स्मृति में एक स्मारक डाक टिकट जारी करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | अगस्त 7, 2021

“प्रिय बहनों और भाइयों,
मुझे भारत के एक महान सपूत और महान राष्ट्रवादी श्री चमन लाल जी के सम्मान में एक स्मृति डाक टिकट जारी करते हुए अत्यंत हर्ष की अनुभूति हो रही है। उन्होंने निस्वार्थ भाव से देश और लोगों की सेवा में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया था।

चमन लाल जी एक ऐसे दूरदर्शी और विचारक थे, जो सदैव सादा जीवन और उच्च विचार में विश्वास रखते थे। वास्तव में, उन्होंने एक सच्चे ऋषि की तरह एक आडंबरहीन जीवन व्यतीत किया और वे सभी स्वयंसेवकों के लिए एक महान प्रेरणा स्रोत थे।

वे एक मेधावी छात्र थे और उन्होंने 1942 में पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर से एमएससी (प्राणी विज्ञान) में स्वर्ण पदक हासिल किया। नौकरी के प्रस्ताव ठुकराकर, उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए कार्य करने का फैसला किया। विभाजन के तत्काल बाद, वे विभाजन पीड़ितों के कल्याण के लिए कार्य करने लगे। वे उनके पास अनुरोध लेकर आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की मदद करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे।

चमन लाल जी ने अपने पत्रों के माध्यम से भारत और विदेशों में असंख्य लोगों के साथ एक विशेष संबंध स्थापित किया। उन्होंने सदैव देश के हितों और लोगों के कल्याण को सर्वोपरि रखा और जिस उद्देश्य में उनका विश्वास था, उसके लिए उन्होंने अत्यधिक समर्पण भाव के साथ कार्य किया।

उन्होंने एक वैश्विक नेटवर्क विकसित करने के लिए भी अथक प्रयास किए और विश्व भर में रहने वाले प्रवासी भारतीयों के साथ संपर्क स्थापित किया। इतना ही नहीं, वे विदेश जाने वालों को उन संपर्कों का ब्यौरा भी प्रदान करते थे और यह सुनिश्चित करते थे कि उनका आपस में सम्पर्क स्थापित हो जाए।

मुझे स्पष्ट रूप से स्मरण है कि मैं वर्ष 1999 के आस-पास अटल जी के प्रधान मंत्री रहने के दौरान चमन लाल जी से प्रधान मंत्री आवास पर मिला था। मैं उनसे दिल्ली के झंडेवालान कार्यालय में भी मिला था। अधिक उम्र के बावजूद वे सदैव नए विचारों से परिपूर्ण रहते थे और नई जिम्मेदारियां उठाने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उनका कार्यकर्ताओं के साथ निकट संपर्क रहता था, और वे उनका मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन करते थे।

चमनलाल जी के बारे में अटल जी ने कहा था कि राष्ट्र के लिए जीवन दांव पर लगा देने की शपथ तो सभी लोग लेते हैं लेकिन उस शपथ को वास्तव में जीवन में उतारने का साहस और सामर्थ्य कुछ ही लोगों में होता है।

आपातकाल की काली अवधि के दौरान चमनलाल जी की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं। आपातकाल के खिलाफ underground रह कर संघर्ष चलाया जा रहा था। जिन परिवारों के सदस्य जेलों में डाल दिए गए थे,वे उन परिवारों से लगातार संपर्क करते थे। उन्हें भरोसा देते थे। बड़ी लगन से उन परिवारों की भरसक सहायता करते थे।

इसके अलावा वे विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय समुदाय से संपर्क रखते थे। उन्हें आपातकाल के दौरान किए जा रहे दमन के बारे में जानकारी देते थे, जिससे वे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आपातकाल के विरुद्ध आवाज उठाएं।अपनी सादगी और साधारण वेश भूषा के कारण वे हमेशा गिरफ्तारी से बच जाते।
मित्रों,

चमनलाल जी भारतीय संस्कृति के अनन्य विद्यार्थी और अनुयायी रहे। वे उस भारतीय सांस्कृतिक दर्शन के प्रतिनिधि थे जो विश्व भर को अपना परिवार मानता है, वसुधैव कुटुंबकम्, के मंत्र में आस्था रखता है। इसी प्रयास में आपने सदियों से विदेश में रह रहे, प्रवासी भारतीय बंधुओं को फिर से उनकी मातृ भूमि से जोड़ने का सफल प्रयास किया। उन्हें भारतीयता की भावना से जोड़ा। आज सभी प्रवासी भारतीय हमारे सांस्कृतिक प्रतिनिधि हैं, हमारी ज्ञान परंपरा के वाहक हैं। उनकी सफलता में भारत को प्रतिष्ठा मिलती है। उनकी उपलब्धियों से भारत एक बार फिर " विश्व गुरु " के रूप में स्थापित होता है।

हमारे यहां ऋग्वेद में ज्ञान की सार्वभौमिक संप्रभुता को स्वीकार किया गया है - "आ नो भद्रा: क्रतवो यंतु विश्वतः"... किसी भी सीमा से परे, हर दिशा से ज्ञान का प्रकाश हमको प्राप्त हो। ज्ञान किसी भौगोलिक सीमा में नहीं बंधता वो सारी मानवता की साझी धरोहर है।

पारंपरिक रूप से भारतीय संस्कृति में ज्ञान और विद्या को बौद्धिक संपदा नहीं माना गया है बल्कि यह माना गया है कि विद्या और ज्ञान ही बांटने से बढ़ते हैं बाकी धन - संपत्तियां तो बांटने से घटती हैं। आप अपने गुरु के प्रति ऋण को, उसकी विद्या का दान करके ही चुकाते हैं। और इस प्रकार गुरु और शिष्य की सनातन परंपरा, निरंतर चलती जाती है।

भारत ने विश्व के साथ अपनी प्रतिभा को साझा किया है, अपने मेधावी प्रवासी समुदाय को साझा किया है। मानवता के कल्याण में उनका योगदान अभिनंदनीय है। चमनलाल जी विश्व अध्ययन केंद्र के पीछे की प्रेरणा रहे। यह केंद्र विश्व पटल पर भारत की प्रतिष्ठा को पुन: स्थापित करने के लिए प्रयासरत है।

मित्रों,
राष्ट्र के निर्माण में उसके प्रबुद्ध और संवेदनशील नागरिकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लोकतांत्रिक समाज में तो यह और भी आवश्यक है - ऐसे नागरिक, जो व्यक्तिगत हित और अधिकारों से पहले समाज और राष्ट्र के हितों को देखें , जो अपने अधिकारों से पहले देश के प्रति अपने दायित्वों को समझें। स्वार्थ का त्याग, परमार्थ के प्रति आग्रह- हर समाज, हर सभ्यता, हर धर्म, यही सिखाता है।

सभ्यता का इतिहास हमें बताता है कि मानव संस्कृति के विकास के लिए, सृजनात्मक स्वतंत्रता के साथ साथ, नागरिकों में सेवा, संयम और संस्कार भी आवश्यक हैं। चमनलाल जी के जीवन का यही दर्शन रहा। मेधावी छात्र थे, उन्हें 1942 में पंजाब विश्विद्यालय (लाहौर) में M.Sc में गोल्ड मेडल मिला था। अपने लिए एक सरल, सुलभ जीवन चुन सकते थे। लेकिन उन्होंने सेवा का मार्ग चुना। यही उनके संस्कार थे। महात्मा गांधी ने कहा था " यदि स्वयं को खोजना हो तो खुद को दूसरों की सेवा में समर्पित कर दो"...उन्होंने सेवा में ही अध्यात्म देखा।

आधुनिक भारत के क्रांतिकारी आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद ने तो यहां तक कह दिया कि " हमें उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जो हमें सेवा का अवसर देता है। उसमें ईश्वर की दिव्यता देखो। यह अपने आप में ईश्वर की कृपा है कि आपको मानव सेवा का अवसर मिला।" परमार्थ सेवा हमारे सांस्कृतिक संस्कारों में है, ऐसे में अपने अधिकारों के प्रति, सीमा से अधिक आग्रही होना, सामाजिक संतुलन को बिगाड़ सकता है। निजी अधिकारों, सामाजिक दायित्वों और अपने सांस्कृतिक संस्कारों के बीच संतुलन बनाना ही, हर आदर्श नागरिक का समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य है। चमनलाल जी जैसा व्यक्तित्व, उनका जीवन दर्शन, उनका कार्य सभी हमारे लिए सदैव अनुकरणीय हैं। विश्व भर में, चमनलाल जी जैसे प्रेरक व्यक्तित्व की जन्म शती आयोजित करने के लिए , मैं अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र, नागपुर; संस्थान के महासचिव डा. अमरजीव, प्रो. राजकुमार भाटिया जी तथा प्रो वेद नंदा जी तथा इस आयोजन के सभी संरक्षकों का अभिनंदन करता हूं। भारत सरकार के संचार मंत्रालय ने इस अवसर पर, चमनलाल जी जैसे प्रेरक व्यक्तित्व के सम्मान में डाक टिकट जारी करने का निर्णय लिया है, जो सर्वथा स्वागत योग्य है।

चमनलाल जी की स्मृति में इस डाक टिकट को जारी करते हुए, मैं उनको सादर श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

जब हम महान राष्ट्रवादी चमन लाल जी के योगदान को याद करते हैं, तो यह हमारी पुरुष और महिला हॉकी टीमों को बधाई देने का भी उपयुक्त समय है, जिन्होंने पूरे देश को गौरवान्वित करते हुए स्वयं के लिए भी ओलंपिक गौरव प्राप्त किया है। टोक्यो में सेमीफाइनल मुकाबले में हार के बावजूद, महिला हॉकी टीम ने पूरी प्रतियो‍गिता में उल्लेखनीय धैर्य और चरित्र की ताकत दर्शाई है।

जैसा कि विश्लेषकों ने उल्लेख किया है, महिला टीम को गत चार वर्षों से ही वह ध्यान और समर्थन प्राप्त होने लगा है जिसकी वह पूर्णतया योग्य है। यह ध्यान रखना चाहिए कि महिलाओं ने 2016 रियो ओलंपिक तक अर्थात् महिलाओं ने 36 लम्बे वर्षों तक ओलंपिक में क्वालीफाई नहीं किया था। इसलिए, यह उचित है कि हम टोक्यो 2020 में उनके शानदार प्रदर्शन, जो किसी जीत से कम नहीं है, का जश्न मनाएं ।

उन्होंने इस तथ्य के आलोक में दुर्गम बाधाओं को पार किया है कि उनमें से कई महिलाएं समाज के अल्प सुविधा प्राप्त और वंचित वर्गों से हैं।

मुझे प्रसन्नता है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार हॉकी जैसे भारतीय खेलों, जो हमारी पारंपरिक विशेषता रही है, को बढ़ावा देने में गहरी दिलचस्पी दर्शा रही है । विभिन्न भारतीय खेलों में अपने अतीत के गौरव को पुन: प्राप्त करने की आवश्यकता है।

समय आ गया है कि सभी राज्य सरकारें भी कॉरपोरेट संस्थाओं का सह-चयन करके और जमीनी स्तर पर प्रशिक्षण और कोचिंग प्रणाली के अलावा कृत्रिम टर्फ जैसे प्रमुख घटकों सहित खेल के बुनियादी ढांचे को मजबूत करते हुए हॉकी और कबड्डी को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दें। ।”