06 सितंबर, 2019 को नई दिल्ली में भारत के माननीय राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद के चुनिंदा भाषणों पर दो पुस्तकों दि रिपब्लिकन एथिक (वाल्यूम 2) तथा लोकतंत्र के स्वर (खंड 2) का लोकार्पण करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायड

नई दिल्ली | सितम्बर 6, 2019

मुझे हमारे माननीय राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद जी, जो हम सभी के मित्र, दार्शनिक तथा मार्गदर्शक हैं, के चयनित भाषणों के संस्करणों का विमोचन करने का सौभाग्य मिला है। मुझे दोहरा सम्मान मिला है क्योंकि मैंने उनके भाषणों को पहले संस्करण का विमोचन का भी सुखद कर्तव्य निभाया है।

सबसे पहले मैं सूचना और प्रसारण मंत्री श्री प्रकाश जावडेकर जी को उनके प्रभावी नेतृत्व के लिए और मंत्रालय की उनकी टीम को हमारे प्रिय राष्ट्रपति के भाषणों के संकलन को प्रकाशित करने के लिए बधाई दता हूँ।

राष्ट्र के प्रमुख, हमारे मजबूत गणतंत्र के प्रथम नागरिक के रूप में वे राष्ट्र के सार, उसकी दृष्टि, आकांक्षाओं, अपेक्षाओं और सबसे बढ़कर उसके लोकाचार का प्रतिनिधित्व करते हैं। मैं उनके युगांतकारी संबांधनों का अनुसरण करता रहा हूँ जिसमें मैं समावेशन का आहवान पाता हूँ, उनके कथनों में एक दुर्लभ यथार्थवाद, हमारे लोगों के साथ गहरा जुड़ाव तथा नए भारत का एक विज़न पाता हूँ।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि इस वर्ष भी हमारे राष्ट्र की दिलचस्प विविधता इन भाषणों के माध्यम से परिलक्षित हुई है। एक बार पुन: हमारे राष्ट्रपति के विवेकपूर्ण शब्दों के माध्यम से हमारे देश के प्रमुख लोकाचार-वसैधैव कुटुम्बकम, पूरा विश्व एक परिवार है, का लोकाचार गुंजायमान हुआ है।

हमने एक देश के रूप में सभी लोगों के लिए बेहतर जीवन स्तर को प्राप्त करने के लिए लोकतंत्र का मार्ग चुना है। श्री कोविद जी का लोकतांत्रिक मूल्यों में अटल विश्वास है। और जब वे हमारे लोकतंत्र के विजन की गहराइयों में उतरते हैं तो वे इसके अनेक पक्षों को परत-दर-परत हमारे सामने लाते हैं। 70वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए उन्होंने अपने विश्वास की पुन: पुष्टि की है जिसे मैं उद्धत करता हूँ:-

"हमारे गणतंत्र का विजन लोकतांत्रिक साधनों द्वारा लोकतांत्रिक लक्ष्यों को प्राप्त करना, बहुलवादी साधनों द्वारा बहुलवादी लक्ष्यों को प्राप्त करना, प्रबुद्ध साधनों द्वारा प्रबुद्ध लक्ष्यों को प्राप्त करना, समावेशी साधनों द्वारा समावेशी लक्ष्यों को प्राप्त करना, करूणामय साधनों द्वारा करूणामय लक्ष्यों को प्राप्त करना और संवैधानिक साधनों द्वारा संवैधानिक लक्ष्यों को प्राप्त करना है।"

विचारों की यह स्पष्टता-विश्लेषण करने तथा संश्लेषण करने की यह क्षमता माननीय राष्ट्रपति के सभी भाषणों में प्रकट है, चाहे वे महत्वपूर्ण अवसरों पर राष्ट्र को संबोधित कर रहे हों; चाहे अपने विदेशी यात्राओं के दौरान अपने उत्साही श्रोताओं को संबोधित कर रहे हों या इस देश के युवाओं में शिक्षा को बढ़ावा दे रहें हो और उनमें मूल्यों को आत्मसात करा रहे हों।

जब वे हमारे अन्नदाताओं-किसानों, हमारे वैज्ञानिकों तथा व्यावसायिकों और सबसे बढ़कर बहादुर जवानों के यागदान के बारे में याद दिलाते हैं तो भी यही भावना रहती है।

वे श्रेष्ठता के विचार का आह्वान करते हैं और हमारी नौकरशाही में आने वाले युवाओं को संवैधानक लोकाचारों की रक्षा के लिए चट्टान की तरह खड़ा रहने की शिक्षा देते हैं।

यह हमारे राष्ट्रपति के ज्ञान के खजाने का अथाह संग्रह हैं। इस संग्रह में आप राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर कुछ सर्वश्रेष्ठ विचार, राष्ट्रीय जीवन की विविधता के प्रति उनकी आसक्ति, उनकी दूरदर्शितापूर्ण विश्वदृष्टि, सभी के लिए बेहतर शिक्षा तथा बेहतर अवसर के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पाएंगे। वे प्रत्येक स्तर पर उत्कृष्टता एवं सुशासन की खोज पर बल देते हैं तथा हमारी सेनाओं के सर्वोच्च सेनानायक होने के नाते हमारे बहादुर रक्षा बलों के लिए उनकी चिंता और सराहना को दर्शाते हैं। कोविंद जी के भाषणों के गांधी जी- जो भारत के विचार का मूर्त्तरूप हैं, की यादगार के रूप में एक खंड है।

माननीय राष्ट्रपति के कई भाषणों में शिक्षा एक मुख्य विषय है। उनके लिए शिक्षा का अर्थ केवल तथ्यों और आंकड़ों का संग्रह करना नहीं है। उनके लिए शिक्षा सशक्तिकरण का एक साधन है। वह चाहते हैं कि विश्वविद्यालय नए भारत की दिशा में प्रगति का शक्तिकेंद्र बनें। उन्हें हमारी वैज्ञानिक संस्थाओं से विशेष आशाएं हैं। आईआईटी, हैदराबाद में दीक्षांत समारोह में अपना संबोधन देते हुए उन्होंने कहा था और मैं उद्धृत करता हूँ:-

"शिक्षा के बेहतरीन वैज्ञानिक विश्वविद्यालय तथा संस्थान केवल शिक्षा की दुकानें या डिग्री के कारखाने नहीं है, वे नवाचार के स्रोत तथा तकनीक एवं तकनीक संचालित स्टार्टअप का सृजन कर रहे हैं।"

स्टार्टअप्स की प्रगति तथा अंतत: 'न्यू इंडिया' की प्रगति के लिए परितंत्र तथा तंत्र के निर्माण हेतु समग्र रूप से संसाधनों के इष्टतम उपयोग हेतु यह श्री कोविंद जी का विज़न है।

तथापि, वे भौतिक लाभों के अलावा शिक्षा के नैतिक सूचक से भी अपना ध्यान कभी नहीं हटाते। सेंट थॉमस कॉलेज, त्रिसुर के शताब्दी समारोह के अवसर पर अपने संबोधन में उन्होंने कहा था और मैं उद्धृत करता हूँ:-

मैं हमेशा विश्वास करता हूं कि ईश्वर की सबसे बड़ी सेवा दूसरे व्यक्ति की सहायता करना, दूसरे व्यक्ति को स्वस्थ करना और किसी दूसरे व्यक्ति को ज्ञान प्रदान करना है।"

एक अनुभवी और प्रतिष्ठित वकील होने के नाते, माननीय राष्ट्रपति इस पेशे की शक्ति और चुनौतियों से अवगत हैं। संवैधानिक तरीकों के द्वारा सामाजिक परिवर्तन पर दृढ़ विश्वास करने वाले श्री कोविंद हमेशा निर्धनतम व्यक्ति को न्याय दिलाने-सबसे अभागे व्यक्ति की आँखों से आंसू पोंछने में कानूनी पेशे की क्षमता पर बल देते रहे हैं। कर्नाटक ला सोसाइटी की प्लैटिनम जुबली के अवसर पर एक समारोह को संबोधित करते हुए माननीय राष्ट्रपति जी ने कहा और मैं उद्धृत करता हूँ:-

"कानून एक कैरियर नहीं है बल्कि एक सेवा है। रोजी-रोटी कमाने से बढ़कर यह न्याय दिलाने में सहायता देने वाली, निर्धनतम तथा हममे से सबसे दुर्भाग्यशाली लोगों की सहायता करने वाली और नियमों, मानदंडों तथा निष्पक्षता के पालन द्वारा परिभाषित समाज और राष्ट्र का निर्माण करने वाली एक प्रणाली है।"

राष्ट्रपति नौकरशाहों से उच्च स्तर की प्रतिबद्धता और परानुभूति की अपेक्षा करते हैं क्योंकि वे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लाभों को जनता तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण उपकरण है। पिछले दो वर्षों में उन्होंने सामाजिक न्याय प्रदान करने और संवैधानिक नैतिता तथा कानून के शासन के संरक्षक के रूप में कार्य करने वाले सामाजिक परिवर्तन के एजेंट बनने के लिए विभिन्न सेवाओं से संबंधित सैकड़ों युवा सिविल सेवकों को प्रेरित किया है। भारतीय पुलिस सेवा के युवा अधिकारियों को संबोधित करते हुए, उनकी समुक्ति कितनी उपयुक्त और व्यावहारिक है:

"कई तरीकों से पुलिस स्वयं राज्य की स्थिति का प्रतिनिधित्व करती है और प्रतीक बनती है। एक सामान्य नागरिक तथा देश में आए एक यात्री के लिए राज्य और शासन की छवि उनकी सिग्नल पर खड़े ट्रैफिक कांस्टेबल, पड़ोस में पेट्रोलिंग करते बीट ऑफिसर तथा पुलिस स्टेशन में स्वागत अधिकारी से बातचीत से बनती है।"

चिंता और परानुभूति के ये संदेश, जो हमारे राष्ट्रीय लोकाचार के प्रतीक है, माननीय राष्ट्रपति के विदेश में दिए उद्बोधन में भी परिलक्षित होते हैं जिनमें भारतीय लोकाचार एवं सभी को मित्रता तथा सौहार्द की भारत की पेशकश का निरूपण होता है। साइप्रस में हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, और मैं उद्धृत करता हूँ:-

"जब हम भारत के बारे में सोचते हैं और जब हम भारत के लिए कार्य करते हैं तो हम विश्व के लिए सोचते और कार्य करते हैं। हमारा स्पष्ट विचार है कि वैश्विक गांव एक जैविक, समन्वित निकाय है, जहां प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक राष्ट्र एक दूसरे से जुड़ी श्रृंखला का भाग है और वे एक-दूसरे की समृद्धि में योगदान करते हैं।"

परंतु एक बात उनके मन में स्पष्ट है। सद्भावना को कभी भी हमारे संप्रभु राष्ट्र की कमजोरी नहीं माना जाना चाहिए। हमारे गौरवशाली सैन्य बलों के सर्वोच्च सेनापति के रूप में राष्ट्रपति के विचार इस विषय में नितांत स्पष्ट हैं। 118 हेलीकॉप्टर यूनिट को स्टैंडर्ड्स तथा एयर डिफेंस कॉलेज को कलर्स प्रदान करने के अवसर पर उन्होंने कहा, और मैं उद्धृत करता हूँ:-

"यद्यपि हम शांति के प्रति दृढ़ हैं, परंतु अपने राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा करने के लिए हमारी पूरी शक्ति का उपयोग करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। जब कभी अवसर आया है तो सैनिक वर्दी वाले हमारे पुरूषों एवं महिलाओं ने राष्ट्र की सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का दृढ़तापूर्वक तथा प्रभावी तरीके से मुकाबला किया है।"

इस वर्ष ऋणी राष्ट्र गांधी जी की 150वीं जयंती मना रहा है और माननीय राष्ट्रपति राष्ट्रीय स्मरणोत्सव समिति के अध्यक्ष हैं। देश एवं विदेश में श्री रामनाथ कोविंद ने महात्मा के संदेश का सुदंर शब्दों मे प्रसार किया है। उन्होंने भारत और विश्व को गांधी जी की कालातीत सलाह के ज्ञान का स्मरण कराया है और मैं उद्धृत करता हूँ:-

"महात्मा ने किसी नीति या वस्तुत: किसी कार्य की जांच करने के लिए एक जंतर दिया है कि क्या प्रस्तावित कार्य उस निर्धनतम व्यक्ति जिसे हमने देखा है, के जीवन, गरिमा तथा भाग्य में बढ़ोत्तरी करेगा। यह जंतर सभी कालों, सभी स्थानों तथा सभी परिस्थितियों के लिए है।"

और अंत में, अपने भाषण को समाप्त करते हुए, आज का सर्वोत्तम संदेश संभवत: जून, 2019 में संसद के संयुक्त सत्र में हमारे माननीय राष्ट्रपति के संबोधन में व्यक्त उनके इन नेक आशाओं में व्यक्त होता है, जिसे मैं उद्धृत करता हूँ:-

"एक नया भारत: जहां प्रत्येक व्यक्ति को प्रगति करने का समान अवसर उपलब्ध हो; जहां प्रत्येक व्यक्ति का जीवन बेहतर बने और उनके आत्म-सम्मान में वृद्धि हो; जहां बन्धुत्व एवं समरसता लोगों को एक-दूसरे से जोड़ती हो; जहां हमारे आदर्शों एवं मूल्यों से निर्मित नींव मजबूत बने; और जहां विकास के लाभ प्रत्येक क्षेत्र में तथा कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।"

यह उस स्वप्न की अभिव्यक्ति है जिसका आज प्रत्येक भारतीय स्वप्न देख रहा है। यही वह आदर्श है जिसका हम अनुसरण करने का प्रयास कर रहे हैं। यही वह विजन है जिसे हमारे प्रधानमंत्री ने अपने अनगिनत सार्वजनिक भाषणों में व्यक्त किया है जिनमें से हाल ही में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस पर दिया गया संबोधन एक है।

राष्ट्रपति और मेरे विचार एक समान हैं। हम सार्वजनिक जीवन में मूल्य और नैतिकता को बनाए रखने के बारे में समान और पुरज़ोर रूप से महसूस करते हैं।

हम छुआछूत, लैंगिक भेदभाव तथा सामाजिक-आर्थिक असमानताओं जैसी सामाजिक बुराइयों के प्रचलन से चिंतित हैं।

राष्ट्र के लिए हमारी प्राथमिकताएं कई बिंदुओं पर एक समान है।

मैं दृढ़ता से महसूस करता हूं कि भारत अपने इतिहास के एक महत्वपूर्ण दौर में है जहां यह समावेशी विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है।

कई बड़ी चुनौतियां है। कई विकट बाधाएं हैं।

परंतु हमारे देश में असाधारण प्रतिभा का भंडार है। हमारे पास विचार और अभिनव क्षमताएं हैं। हमें एक ऐसा परितंत्र बनाना चाहिए जो इस उत्कृष्ट आधार पर निर्मित हो।

एक स्वच्छ भारत, एक शिक्षित कुशल भारत, एक उन्नत भारत, एक स्वस्थ भारत और समरसतापूर्ण, मजबूत, सशक्त भारत हम सभी का साझा स्वप्न है।

भारत के राष्ट्रपति इन आशाओं और आकांक्षाओं की भावपूर्ण अभिव्यक्ति करते हैं। ये पुस्तकें भारत की शक्ति में विश्वास का प्रमाण है। यह हमारे गणतांत्रिक लोकाचार के सार को समझने के लिए विचारों की नवीन धारा है।

मैं इस सद्प्रयास के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय तथा प्रकाशन विभाग को बधाई देता हूँ। यह देखकर प्रसन्नता होती है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय में मेरे कार्यकाल के दौरान की गई पहलों को निष्ठा एवं यथोचित परिश्रम के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसे उत्कृष्ट रूप से छपी पुस्तकों के लिए मैं श्री अमित खरे, सचिव, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, श्रीमती साधना राउत, प्रधान महानिदेशक, प्रकाशन प्रभाग तथा प्रकाशन प्रभाग की पूरी टीम को बधाई देता हूँ। अच्छा कार्य जारी रहे। मैं श्री थावर चंद गहलोत जी, राजनयिकों, भारत सरकार के सचिवों तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों तथा अत्यंत सुग्राही श्रोताओं का आभारी हूँ।

मैं आशा करता हूँ कि हम सभी इन सभी पुस्तकों को पढ़ेंगे और राष्ट्रपति के विचारों से लाभान्वित होंगे क्योंकि हम सामूहिक रूप से उस गणतांत्रिक लोकाचार का निर्माण करते हैं जिस पर हम सभी गर्व कर सकें।

धन्यवाद।