06 मार्च, 2020 को नई दिल्ली में इंडियन इन्स्टिटूट ऑफ डेमोक्रेटिक लीडर्शिप (आईआईडीएल) के छात्रों को भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | मार्च 6, 2020

मुझे आज इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ डेमोक्रेटिक लीडरशिप (आई.आई.डी.एल.) के विद्यार्थियों के साथ संवाद करते समय हर्ष की अनुभूति हो रही है। मैं उपराष्ट्रपति निवास में आप सभी का हार्दिक स्वागत करता हूँ।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ डेमोक्रेटिक लीडरशिप (आई.आई.डी.एल.) एक ऐसा विशिष्ट संस्थान है, जो युवाओं में सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता पैदा करने, उनमें नेतृत्व मूल्यों और क्षमताओं का विकास और संवर्धन करने तथा विद्यार्थियों को राजनीतिक सार्वजनिक कार्यो, स्वंयसेवी संगठनों और संबंद्ध क्षेत्रों में उत्कृष्ट करियर के लिए आवश्यक कौशल प्रदान करने की आकांक्षा रखता है।

मुझे बताया गया है कि देश के महत्वाकांक्षी युवाओं और भारत की लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्था तथा अभिशासन के बीच अंतर को दूर करने के लिए नेतृत्व, राजनीति और अभिशासन में एक विशिष्ट अन्तर-विषयक पाठ्यक्रम स्नातकोत्तर कार्यक्रम (पीजीपी) तैयार किया गया है।

यह वास्तव में उल्लेखनीय है कि यह कार्यक्रम माननीय प्रधानमंत्री के विजन "नए भारत के लिए नए नेता" को ध्यान में रखते हुए प्रशिक्षित, नैतिक और उत्तरदायी नेता तैयार करने की आवश्यकता के अनुरूप अभिकल्पित किया गया है।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि यह कार्यक्रम तीन वर्षो से संचालित किया जा रहा है और इस वर्ष इस कार्यक्रम में भारत के 12 राज्यों के 25 ऐसे युवा नेता भाग ले रहे हैं, जो सक्रिय नेता बनने और नए भारत के विकास में योगदान देने की आकांक्षा रखते हैं।

मुझे सूचित किया गया है कि इस कार्यक्रम के एक भाग के तौर पर आप 01 मार्च से 07 मार्च, 2020 तक राष्ट्रीय राजधानी के अध्ययन दौरे पर हैं जिसमें आप भारतीय संसद, राष्ट्रपति भवन और विभिन्न मंत्रालयों जैसी विभिन्न संस्थाओं की संरचना, कार्यप्रणाली और अभिशासन को निकटता से जानने के लिए इनका दौरा करेंगे।

विशिष्ट तौर पर लोकतंत्र और सामान्य तौर पर राजनीतिक सार्वजनिक जीवन के ऐसे दो महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, जहां क्षमता निर्माण प्रणालियां अत्यधिक अपर्याप्त हैं।

इस संबंध में, मैं रामभाऊ महाकवी प्रबोधिनी (आर.एम.पी.) और आई. आई. डी. एल. कार्यक्रम की सम्पूर्ण टीम को इस क्षेत्र में क्षमता निर्माण को न केवल एक महत्वपूर्ण आवश्यकता के तौर पर चिन्हित करने अपितु इसे सफल बनाने के लिए बधाई देता हूँ।

मैं यहां उपस्थित सभी विद्वानों को बधाई देता हूँ और सार्वजनिक जीवन में उनके शानदार भविष्य की कामना करता हूँ।

आप सौभाग्यशाली हैं कि आज लोकतांत्रिक प्रक्रिया पहले की तुलना में काफी आकर्षक और सहभागी बन चुकी है। युवा अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति अधिक जागरूक हैं।

वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने की आकांक्षा रखते हैं।

इसके साथ ही, सरकार और राजनीतिक संस्था को ऐसी युवा प्रक्रिया की आवश्यकता है जो उपयुक्त विचारों से सुसज्जित और बदलते हुए दौर के साथ गति बनाए रखने में सक्षम हो।

मुझे विश्वास है कि आप इस राष्ट्र के सुनहरे भविष्य के निर्माण में सफल होंगे।

मेरे प्यारे युवा मित्रों,

भारतीय लोकतंत्र ने गत सात दशकों के दौरान कई आलोचकों को करारा जवाब देते हुए जिस प्रकार अपना विस्तार और सुद्ढ़ीकरण किया है, वह एक आश्चर्य है।

भारतीय लोकतंत्र ने इस परम्परागत सिद्धांत को गलत साबित करते हुए कि लोकतंत्र केवल उच्च आय वाले समाज में ही सफल होता है और गरीब तथा विविधतापूर्ण समाज में इसकी सफलता की संभावना कम होती है, स्वयं को एक सैद्धांतिक आश्चर्य के तौर पर स्थापित किया है।

स्वतंत्रता के समय भारत एक विविधतापूर्ण समाज होने के साथ-साथ गरीब और निरक्षर भी था, जो लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए अनुकूल नहीं था। परंतु हमारे देश में लोकतंत्र की सफलता की कहानी ने ऐसी सभी अवधारणाओं को गलत साबित किया है।

वर्ष 1952 में आयोजित प्रथम आम चुनाओं में 10.59 करोड़ मतदाताओं, जो पात्र मतदाताओं को 61.14 प्रतिशत था, ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। वर्ष 2019 में आयोजित गत आम चुनावों में 73.64 करोड़ मतदाताओं, जो पात्र मतदाताओं का 67.09 प्रतिशत था, ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया और यह अब तक का सर्वाधिक मतदान था।

मतदान में हो रही सकल वृद्धि तथा उत्साहपूर्ण भागीदारी हमारे लोकतंत्र की स्थिरता को दर्शाती है और यह किसी आश्चर्य से कम नहीं है।

हमें अपने देश में लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण के कारणों पर संक्षेप में चिंतन करने की आवश्यकता है।

शासन का लोकतांत्रिक स्वरूप भारत में नया नहीं है।

2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के दौर में भारत में, जनपदों के रूप में कई स्वशासी गणतंत्र थे।

इन प्राचीन गणतंत्र राज्यों का अंत राजाओं के बीच युद्धों के कारण हुआ परंतु लोकतांत्रिक विचार सतत् तौर पर पल्लवित होते रहे।

ब्रिटिश राज के दौरान औपनिवेशिक काल में भारत में विदेशी शासकों का केन्द्रीयकृत नियंत्रण स्थापित हो गया और स्वशासन समाप्त हो गया।

हमारे संविधान निर्माताओं ने जब व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मूलभूत अधिकारों और सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार के आधार पर एक लोकतांत्रिक गणतंत्र राज्य स्थापित करने का निर्णय लिया तब उन्होंने एक अभूतपूर्व, असाधारण यात्रा प्रारंभ की।

भारत का लोकतंत्र परिपक्व और स्थिर है तथा इसने सदैव बदलती हुई परिस्थितियों को आत्मसात करने तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं और रीतियों को कायम रखने की अद्भुत क्षमता दर्शाई है।

हम सदैव अपने आंतरिक मुद्दों का समाधान करने में सक्षम रहे हैं। अभी हाल ही में कतिपय अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरणों और निकायों द्वारा भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया गया है।

यह पूरी तरह से अनपेक्षित और अस्वीकार्य है और इन अभिकरणों को ऐसे कृत्यों से दूर रहना चाहिए।

विश्व में जब अधिकांश राष्ट्र बहु-भाषाई समाज के साथ संघर्ष कर रहे हैं, भारत ने 22 भाषाओं के सह-अस्तित्व के लिए एक स्थिर संरचना का सफलतापूर्वक निर्माण किया है।

जब भारत की सुदृढ़ और उत्साही लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली का उल्लेख किया जाता है तब भारत विश्व के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करता है।

मेरे प्यारे युवा दोस्तों,

वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष राजनीतिक चुनावी प्रक्रियाओं के अर्थो में लोकतंत्र और अभिशासन की गुणवत्ता महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद, हमारी चुनावी प्रक्रिया में बढ़ती हुई कई विकृतियां स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है जिनसे हमारी उपलब्धियों को कमतर आंका जा रहा है और ये गरीबी उन्मूलन तथा तीव्र आर्थिक विकास के दोहरे राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में अवरोध उत्पन्न करती हैं।

राजनीतिक प्रणाली द्वारा तो स्पष्ट तौर पर दिखाई देने वाली विकृतियों का तात्कालिकता और एकता की भावना के साथ समाधान किए जाने की आवश्यकता है।

राजनीति और चुनावों में अत्यधिक धन बल का उपयोग, जो प्राय: बेहिसाबी और अवैध होता है, पहली विकृति है।

दूसरा है मूलभूत सुविधाओं, अवसरंचना, गुणवत्तापरक शिक्षा और स्वास्थ देखभाल और विकास तथा रोजगार के अवसरों जैसे दीर्घकालिक लक्ष्यों की कीमत पर मतदाताओं को अल्पावधि के लाभ प्रदान कर ललचाने के बढ़ते हुए प्रयास।

युवा और महत्वाकांक्षी जनसेवकों के तौर पर आपको इन चुनौतियों को दूर करने में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।

इस बात को सदैव याद रखना कि गरीबी उन्मूलन केवल वास्तविक अर्थो में आय बढ़ाकर तथा सभी के लिए, विशेष तौर पर गरीब और लाभवंचित वर्गो के लिए, आर्थिक अवसर सृजित करके ही किया जा सकता है।

समाज में दुख-दर्द और पीड़ाओं को समाप्त करने तथा समाज और अर्थव्यवस्था की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए गुणवत्तापरक अवसरंचना, गुणवत्तापरक स्कूली शिक्षा, गुणवत्तापरक स्वास्थ्ार सेवाएं और अन्य ऐसी महत्वपूर्ण सुविधाएं प्रदान करना महत्वपूर्ण है।

लोगों को सुविज्ञ राजनीतिक विकल्प प्रदान करने में सक्षम बनाने के लिए अंतत: पारदर्शी बजट निर्धारण, लोगों को यह दर्शाने के लिए कि कर द्वारा संगृहित धनराशि के बदले किस प्रकार मूर्त सेवाएं प्रदान की जा रही है, स्थानीय सशक्तिकरण और बेहतर सेवा परिदान महत्वपूर्ण है।

चुनाव और चुनावी प्रक्रियाएं संसदीय लोकतंत्र की पवित्रता बनाए रखने का आधारभूत स्रोत हैं।

इन प्रक्रियाओं की शुचिता और अपवित्रता हमारी राजनीति की गुणवत्ता और पवित्रता का निर्धारण करती है।

हमें अपने लोकतंत्र की अखंडता को धनबल के दबाव से मुक्त रखना चाहिए। इस अत्यधिक और अवैध खर्च से पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्व कम होने के साथ ही हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली की वैधता धूमिल होती है।

इससे लोकतंत्र में विश्वास भी कम होता है और निराशाबाद को बढ़ावा मिलता है।

केवल व्यय की अधिकतम सीमा निर्धारण और उपदेश देना ही पर्याप्त नहीं है। दलों और राजनेताओं पर दोषारोपण से भी कोई लाभ नहीं होगा। एक दूसरे पर दोषारोपण करने की बजाय समस्या का समाधान करने के लिए उपचारात्मक उपाय करने में ही बुद्धिमत्ता और भलाई है।

एक साथ चुनाव कराए जाने का सुझाव भी विचारणीय है।

मेरा दृढ़ विश्वास है कि राजनीतिक दलों द्वारा भी निधियन के स्रोत, कैडर के राजनीतिक प्रशिक्षण और उनकी गतिशीलता तथा अन्य राजनीतिक कार्यकलापों पर व्यय, चुनावों और उम्मीदवारों के लिए धन उपलब्धता इत्यादि के संबंध में सख्त आचार संहिता की अनुपालना किए जाने की आवश्यकता है।

मेरे प्यारे युवा दोस्तों,

आप स्वयं को नेतृत्व की ज्योत को आगे बढ़ाने के लिए तैयार कर रहे हैं तो आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आपके अंदर 4 बातें अर्थात् चरित्र, आचरण, दक्षता और क्षमता होना आवश्यक है।

सदैव अद्यतन जानकारियां रखें। व्यापक और समुचित अध्ययन करें। जीवन पर्यन्त विद्यार्थी बने रहें और यथा संभव अधिकतम ज्ञान अर्जित करें। अपने संविधान का अच्छी तरह से अध्ययन करें, अपने इतिहास की जानकारी रखें और अपनी विरासत पर गर्व करें।

अपने संप्रेषण कौशलों का विकास करें और ज्ञानक्षितिज को सतत् तौर पर व्यापक बनाए।

ऐसे महापुरूषों और महिलाओं, जिन्होंने इस राष्ट्र के निर्माण के लिए कार्य किया है और उनके कार्यो का अध्ययन करें। अपने आदर्श पुरूषों का बुद्धिमतापूर्ण चयन करें।

उदार हृदय बने तथा नए विचारों, विभिन्न संस्कृतियों, नई प्रौद्योगिकियों को स्वीकार करते हुए नैतिक मूल्यों, जो भारतीय सभ्यता का मूल आधार हैं, पर सदैव दृढ़ता से कायम रहें। सदैव हमारी विशिष्ट संस्कृति का संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार करें।

न केवल राष्ट्र अपितु विश्व के भी आदर्श नागरिक बनें।

आप यह समझ लें कि जिस कार्य को आप प्रारंभ करने जा रहे हैं, वह राष्ट्र और इसके प्रत्येक नागरिक के बेहतर भविष्य निर्माण का एक मिशन है।

परंतु आपका अधिदेश यहीं समाप्त नही होता। सदैव सम्पूर्ण विश्व की शांति और स्थिरता के लिए प्रयासरत रहें, भारत के सदियों पुराने आदर्शो 'वसुधैव कुटुम्बकम' और 'सर्वे जनासुखिनो भवंतु' पर सच्चे अर्थो में कायम रहें।

अपनी बात समाप्त करने से पूर्व मैं आपको गांधी जी का जंतर बताता हूँ, जो आपके सम्पूर्ण सार्वजानिक जीवन में मार्गदर्शी प्रकाश का कार्य करेगा।

"मैं तुम्हें एक जंतर देता हूँ। जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहं तुम पर हावी होने लगे, तो यह कसौटी आजमाओ। जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम तुम उठाने का विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे वह अपने जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा ? यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है ? तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहं समाप्त हो रहा है।"

पुन: मैं आपको भविष्य के प्रयासों के लिए शुभकामना देता हूँ।

धन्यवाद!

जय हिंद!