06 अप्रैल, 2021 को डांडी, गुजरात में आजादी के “अमृत महोत्सव” के उपलक्ष्य में आयोजित “डांडी यात्रा” के समापन समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

डांडी, गुजरात | अप्रैल 6, 2021

“हमारी आज़ादी के 75 वर्ष पूरे होने को आए हैं। आज़ादी, राष्ट्र के इतिहास में अमृतमय घटना थी। जिस को याद करने के लिए आज हम अमृत महोत्सव मना रहे हैं। इन 75 वर्षों के दौरान देश के नागरिकों ने अपनी प्रतिभा और पुरुषार्थ से राष्ट्र के लिए अमृत का मंथन किया है।

यह अमृत महोत्सव उनकी उपलब्धियों का गौरव करने के लिए है। यह महोत्सव हमारे स्वाधीनता संग्राम के नायकों के त्याग और तपस्या के प्रति कृतज्ञ सम्मान प्रकट करने के लिए है। यह महोत्सव उनके द्वारा स्थापित राष्ट्रवादी आदर्शों के प्रति खुद को समर्पित करने के लिए है। उनके सपनों के भविष्य के नए भारत का निर्माण करने के लिए है।

इस महोत्सव का शुभारंभ,इस वर्ष 12 मार्च को प्रधानमंत्री जी ने किया। राष्ट्रपिता की डांडी यात्रा की इक्यानबेवीं (91st) वर्षगांठ पर, उस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में साबरमती आश्रम से इस पदयात्रा की शुरुआत की गई।

25 दिन की यह पदयात्रा आज सम्पन्न हुई। इस दौरान लगभग 385 किलोमीटर की पदयात्रा करने वाले, 81 स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं का हार्दिक अभिनंदन करता हूं।

इस सुअवसर पर 1930 में महात्मा जी के साथ चलने वाले उन हजारों भारतवासियों के प्रति नतमस्तक हूं, जो देश के विभिन्न हिस्सों से आये और राष्ट्रपिता के नेतृत्व में इस यात्रा में शामिल हुए।

डांडी यात्रा में भाग लेने वाले अधिकांश पदयात्री 40 वर्ष से कम आयु के युवा ही थे। इस प्रकार महात्मा जी की इस पदयात्रा ने बड़े पैमाने पर युवाओं को अहिंसक स्वाधीनता आंदोलन में जोड़ा।

यही नहीं, डांडी यात्रा की प्रेरणा से देश के विभिन्न भागों में स्थानीय स्तर पर नमक सत्याग्रह किए गए, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने भाग लिया।

ओडिशा में रमा देवी, सरला देवी जी के नेतृत्व में स्थानीय महिलाओं ने नमक सत्याग्रह किया, तमिलनाडु में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी के नेतृत्व में वेदारण्यम में नमक सत्याग्रह किया जिसमें रुक्मणि लक्ष्मीपति ने गिरफ्तारी दी।

स्वयं गांधी जी ने डांडी के निकट धरसाना साल्ट वर्क्स पर प्रदर्शन करने का आह्वाहन किया जिसका नेतृत्व कस्तूरबा जी तथा सरोजिनी नायडू जी ने किया। इस अवसर पर मैं उन सभी विभूतियों की पुण्य स्मृति को सादर नमन करता हूं।

बहनों और भाइयों,

नमक सत्याग्रह ने हमारे स्वाधीनता आंदोलन को नई दिशा दी।

यह राष्ट्रपिता के राष्ट्रवादी चिंतन का सबसे महत्वपूर्ण प्रयोग था।

देश भर में साइमन कमीशन के विरुद्ध आक्रोश था। जिसकी प्रतिक्रिया में नेहरू रिपोर्ट पारित की गई जिसमें भारत के लिए डोमिनियन स्टेटस की मांग की गई थी। अंग्रेज सरकार द्वारा डोमिनियन स्टेटस पर भी आश्वासन न दिए जाने पर, दिसंबर 1929 को लाहौर अधिवेशन में "पूर्ण स्वराज" की घोषणा कर दी गई थी।

26 जनवरी 1930 को देश भर में प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाया गया, तिरंगा फहराया गया, शराब बंदी, छुआ छूत को समाप्त करने की शपथ ली गई, स्वदेशी अपनाने और सांप्रदायिक सौहार्द कायम रखने की शपथ ली गई।

इस श्रृंखला की अगली कड़ी था नमक सत्याग्रह।

इस सत्याग्रह को विश्व भर की प्रेस ने प्रचारित किया था। 1931 में अमेरिका की प्रसिद्ध टाइम पत्रिका ने गांधी जी को "Man of the Year" घोषित किया।

25 दिनों तक की लगभग 385 किलोमीटर की यात्रा के दौरान गांधी जी 22 स्थानों पर रुके और वहां के स्थानीय समुदायों को संबोधित किया।

उनके संबोधनों में समाज में छुआ छूत का विरोध, सांप्रदायिक सौहार्द, स्वदेशी जैसे विषय उठाए जाते।

79 सत्याग्रहियों से शुरू हुआ दल, डांडी पहुंचते पहुंचते कई किलोमीटर लंबा अभियान बन गया। उनके लिए नमक सत्याग्रह आम नागरिक को स्वाधीनता आंदोलन से जोड़ने का माध्यम था।

2 मार्च 1930 को लॉर्ड इरविन को लिखा उनका पत्र एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है जिसमें वे भारत में अंग्रेजी शासन को अभिशाप बताते हैं, उसकी आर्थिक और कर नीति की कड़ी आलोचना करते हैं।

लेकिन अपने विरोधी के प्रति भी शिष्टतापूर्ण आत्मीय भाषा का प्रयोग, गांधी जी पत्रों की विशिष्टता है। अपने पत्रों में वो लॉर्ड इरविन को "Dear Friend" लिख कर संबोधित करते है।

उनकी अहिंसा सिर्फ शारीरिक हिंसा तक ही सीमित नहीं थी बल्कि वचन और विचारों में भी अहिंसा होना आवश्यक था।

लोकतान्त्रिक विमर्श में भाषा और शब्दों का शिष्टाचार जरूरी होता है। तभी लोकतंत्र स्वस्थ और समर्थ बनता है।

गांधी जी के विचार में राजनैतिक गुलामी सिर्फ आर्थिक शोषण ही नहीं बल्कि पूरे समाज की सांस्कृतिक बर्बादी भी करती है।

गांधी जी गुलामी के कारण हुए राष्ट्र के सांस्कृतिक, नैतिक और चारित्रिक पतन से अधिक चिंतित थे। और उनके सत्याग्रह का उद्देश्य, सिर्फ राजनैतिक आज़ादी नहीं था बल्कि राष्ट्र का नैतिक और चारित्रिक उत्थान था।

2 जनवरी 1937 को हरिजन में लिखे अपने लेख में गांधी जी अपने स्वराज की रूप रेखा बताते हैं। वे स्वराज का एक वर्ग खींचते हैं जिसके एक छोर पर राजनैतिक आज़ादी है तो दूसरी छोर पर आर्थिक आज़ादी। तीसरे छोर पर सामाजिक नैतिकता है और चौथे पर धर्म। धर्म का स्थान सबसे महत्वपूर्ण है। उनके लिए धर्म कोई भी हो सकता है हिंदू, इस्लाम या क्रिश्चियन। उनके अनुसार इनमें से यदि कोई भी कोण बिगड़ता है तो वर्ग अपना आकार खो देगा।

गांधी जी का स्वराज, गरीब का स्वराज है। मार्च 1931 में यंग इंडिया में लिखे अपने लेख में वो मानते हैं कि जब तक गरीब की वो सारी जरूरतें, सुविधाएं नहीं पूरी होती जो किसी धनी को प्राप्त हैं, तब तक स्वराज, पूर्ण स्वराज नहीं हैं। इसीलिए उन्होंने नमक जैसी सामान्य लेकिन रोजमर्रा के लिए जरूरी चीज़ को अपने सत्याग्रह का उद्देश्य बनाया।

बहनों और भाइयों,

महाभारत में उक्ति है " महाजनो येन गत: स पंथा "...अर्थात जो पथ महापुरुषों द्वारा दिखाया गया हो उसी पर चलना चाहिए। राष्ट्रपिता की डांडी यात्रा राष्ट्र के जीवन में ऐसा ही अनुकरणीय पथ है जो सच्चाई, अच्छाई और भलाई के प्रकाश से प्रकाशित है।

विगत 75 वर्षों में राष्ट्र महात्मा जी द्वारा दिखाए गए " सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास " मार्ग पर ही चला है। इस मंत्र में डांडी यात्रा के आदर्शों का अनुसरण किया गया है।

1947 का भारत आर्थिक रूप से विपन्न था, धार्मिक विभाजन ने समाज की एकता को तोड़ दिया था, संप्रभुता पर आक्रमण हुआ था, राजनैतिक रूप से देश रियासतों में बंटा हुआ था।

विगत 75 वर्षों में हमने देश की एकता और अखंडता को सुदृढ़ किया है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था ने समाज के सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित की है।

आर्थिक रूप से हमारे किसानों ने हमें कृषि क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाया है।

गरीबी उन्मूलन, औसत आयु, शिशु मृत्यु दर, मातृत्व सुरक्षा, साक्षरता आदि सामाजिक मानकों पर हमारी उपलब्धियां हमारे लिए गौरव का विषय हैं।

हम गावों में सड़क, संचार और संपर्क क्रांति लाने में सफल रहे हैं।

हर गांव को बिजली उपलब्ध हो रही है अब हमारा प्रयास है हर घर को पेय जल उपलब्ध हो।

सिर्फ साक्षरता ही नहीं बढ़ी है बल्कि इन्नोवेशन और उद्यमशीलता को बढ़ावा दिया जा रहा है।

गांधी जी का संघर्ष, औपनिवेशिक शासन के शोषण से मनुष्य की अपनी निजी स्वतंत्र संप्रभुता को बचाने के लिए था। उनके लिए आत्म निर्भरता इस निजी संप्रभुता, व्यक्तिगत आज़ादी का आधार थी। आज़ादी के लिए आत्म निर्भर होना आवश्यक शर्त है।

आज देश जीवन के हर क्षेत्र में आत्म निर्भरता प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है। उद्यमियों और इन्नोवेशन को अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। महामारी के दौरान भी देश को आत्म निर्भर बनाने के लिए नए प्रयास किए जा रहे हैं।

आज देश में लगभग 12500 नए स्टार्ट अप उद्यमी हैं। करों में छूट के अलावा कुछ चुने हुए उद्योगों को राजकोष से सहायता प्रदान की जा रही है। इन सभी कदमों से देश में विदेशी निवेश भी बढ़ा है।

यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि आज हम एक सशक्त संप्रभूतापूर्ण, स्वतंत्र राष्ट्र हैं। हमें विदेशी पूंजी निवेश, विदेशी तकनीक से आशंकित नहीं होना चाहिए बल्कि आत्म विश्वास के साथ उसे अपनाना चाहिए। यह हमारा अपना स्वतंत्र नीतिगत निर्णय है। आज विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां भारत की आर्थिक प्रगति को ले कर आशान्वित हैं। विदेशी कंपनियां भारत में निवेश के लिए उत्सुक हैं।

कोरोना काल में यद्यपि हमने कुछ सीमा तक लोगों ने निजी आज़ादी खोई फिर भी इस चुनौती ने हमें आत्म निर्भरता का नया पाठ भी पढ़ाया।

टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर से ले कर पीपीई किट, वेंटीलेटर और दवाओं का निर्माण देश में ही बड़े पैमाने पर किया गया। रिकॉर्ड समय में हमारे वैज्ञानिकों ने नई वैक्सीन विकसित भी की और बड़े पैमाने पर वैक्सीन का उत्पादन किया जा रहा है।

देश भर में 7 करोड़ से भी अधिक वैक्सीन की खुराक दी जा चुकी हैं। विगत एक साल में चिकित्सा के क्षेत्र में हमारी आत्म निर्भरता बढ़ने के कारण ही यह संभव हो सका है।

वसुधैव कुटुंबकम् के अपने सनातन आदर्श के अनुरूप, हमारी आत्म निर्भरता का अर्थ विश्व व्यवस्था से कटना नहीं है बल्कि विश्व का कल्याण है। आज वैक्सीन मैत्री के तहत भारत 53 से भी अधिक देशों, विशेषकर पड़ोसी देशों और विकासशील देशों को वैक्सीन उपलब्ध करा रहा है। WHO ने भारत की वैक्सीन उत्पादन क्षमता को विश्व के लिए जरूरी बताया है।

यह संतोष का विषय है कि चुनौती के इस समय में भी, देश गांधी जी के नैतिक दर्शन का अनुसरण कर रहा है। जिससे विश्व में हमारी प्रतिष्ठा बढ़ी है।

अमृत महोत्सव, स्वाधीनता आंदोलन के आदर्शों की पृष्ठभूमि में हमारी उपलब्धियों का आंकलन करने का भी अवसर होगा। अमृत महोत्सव के पांच स्तंभ हैं : आज़ादी का आंदोलन, Idea at 75, Achievements at 75, Action at 75 तथा Resolve at 75

मुझे विश्वास है कि विगत दशकों में देश की उपलब्धियां, हमारे राष्ट्रीय नायकों की अपेक्षाओं के अनुरूप रही हैं। हमारी आज़ादी उनके संघर्ष की पुण्य विरासत है जिसे हमें संरक्षित रखना है और बढ़ाना है। विश्वास करता हूं कि इस अवसर पर हम " India @2047" के तहत हम आज़ादी के 100 वर्ष होने पर, एक नए भारत की रूपरेखा भी तैयार करेंगे और आगामी 25 वर्षों में उसे पूरा भी करेंगे।