05 सितंबर, 2019 को नई दिल्ली में शिक्षक दिवस के अवसर पर, दिल्ली तमिल शिक्षा संघ स्कूलों के शिक्षकों को भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का संबोधन

नई दिल्ली | सितम्बर 5, 2019

"आज शिक्षक दिवस के अवसर पर आप सभी के बीच आकर मुझे प्रसन्नता हो रही है शिक्षक दिवस वह दिन है जब राष्ट्र राष्ट्रीय विकास में शिक्षकों के असाधारण योगदान का उत्सव मनाता है। यही वह दिन है जब हम भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति, एक महान शिक्षक, एक महान बुद्धिजीवी और हिन्दू दर्शन के प्रखर प्रवर्तक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को सम्मानपूर्वक याद करते हैं।

हमारे देश में शिक्षकों को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। हम उन्हें 'गुरु' कहते हैं, जो एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ 'प्रकाश का स्रोत' है। वास्तव में, हमारी संस्कृति में एक शिक्षक को जो सम्मान मिलता है उसे निम्नलिखित पंक्तियों में अच्छी तरह से दर्शाया गया है:

"गुरुर्ब्रम्हा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:, गुरु: साक्षात् परब्रम्हा तस्मै श्री गुरुवे नमः- 'गुरु सृजनकर्ता ब्रह्मा के समान हैं, जो हमें सीखने में पहल करना सिखाते हैं, विष्णु संरक्षक हैं जो हमारी प्रतिभाओं का पोषण करते हैं और महेश्वर विनाशक हैं जो संदेह और नकारात्मक विचारों को दूर करते हैं।' गुरु सर्वोच्च भगवान होते हैं और मैं ऐसे गुरु को नमन करता हूँ।"

हम गुरुकुल प्रणाली के उत्तराधिकारी हैं। एक ऐसी प्रणाली जहां शिक्षक और विद्यार्थी एक देख-रेख वाले वातावरण में एक साथ रहते थे और शिक्षा ग्रहण करते थे। यह एक ऐसी शिक्षा प्रणाली थी जो शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच एक निरंतर संवाद पर आधारित थी। यह एक ऐसी प्रणाली थी जिसने खोज की एक प्रक्रिया के रूप में 'विद्या' की धारणा को बढ़ावा दिया।

आप सभी को छात्रों के साथ अपनी बातचीत के माध्यम से हर रोज और हर मिनट अपनी कक्षा में हमारे राष्ट्र की नियति को आकार देने का अनूठा अवसर पाने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

भारत ने स्वतंत्रता के बाद काफी लंबा सफर तय किया है। आज, 95 प्रतिशत बच्चे विद्यालयों में हैं और हमारे पास 1947 की तुलना में अधिक विश्वविद्यालय एवं उत्कृष्टता के संस्थान हैं।

देश भर के 15 लाख प्राथमिक विद्यालयों में लगभग 70 लाख शिक्षक 20 करोड़ बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। साक्षरता दर में 1947 में 18 प्रतिशत से लगातार सुधार हुआ है और वर्तमान में यह लगभग 80 प्रतिशत है।

आज स्कूली शिक्षा के सामने सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक शिक्षा और अधिगम की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता है।

हमें और अधिक शिक्षकों की आवश्यकता है जो हमारे बच्चों में लोकतंत्र, समानता, स्वतंत्रता, न्याय, धर्मनिरपेक्षता, दूसरों की भलाई के लिए चिंता, मानव गरिमा और मानवाधिकारों के लिए सम्मान के प्रति प्रतिबद्धता का निर्माण कर सकें। बच्चों को हमारी समृद्ध विरासत और गौरवशाली इतिहास से अवगत कराया जाना चाहिए।

मैं देश में पूर्व-प्राथमिक केंद्रों, प्राथमिक विद्यालयों, उच्च विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में सभी स्तरों पर सभी शिक्षकों से आह्वान करता हूं कि वे स्वयं को पुन:समर्पित करें और प्रतिज्ञा लें कि वे कक्षाओं को आनंदपूर्ण अधिगम केंद्रों में बदलेंगे और पूरी शिक्षा प्रणाली को आज की मौजूद शिक्षा प्रणाली की तुलना में बहुत ऊंचे स्तर पर ले जायेंगे।

हम अतीत की प्रतिष्ठा पर निर्भर नहीं रह सकते। न ही हम उत्कृष्टता के कुछेक उदाहरणों से संतुष्ट हो सकते हैं। हमें एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है जो सभी बच्चों, युवाओं और वयस्कों की अधिगम जरूरतों को प्रभावी ढंग पूरा करती हो और वह लगातार नवोन्मेषी रहे।

हमें ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है जिनमें अपेक्षित क्षमता, आत्मविश्वास और प्रतिबद्धता हो ताकि वे देश के शैक्षिक परिदृश्य में बदलाव ला सकें।

जैसा कि कहा गया है:

"औसत शिक्षक बतलाता है;

अच्छा शिक्षक समझाता है;

श्रेष्ठ शिक्षक प्रमाणित करके दिखाता है;

महान शिक्षक प्रेरित करता है।"

हमें आज अधिक से अधिक महान शिक्षकों की आवश्यकता है। हमें ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है जो शिक्षार्थी और सृजनकर्ता हों।

हमें अपनी कक्षाओं में प्रेरणादायक, रचनांतरणपरक नेताओं की आवश्यकता है।

भव्य भवन बनाने मात्र से अच्छा विद्यालय नहीं बन जाता अपितु शिक्षकों का समर्पण एवं प्रतिबद्धता ही विद्यालय को महान बनाती है।

डॉ. राधाकृष्णन ने कहा था; "सच्चे शिक्षक वे हैं जो हमें स्वयं के लिए सोचने में सहायता करते हैं।"

इसी तरह, श्री अरबिंदो ने कहा है "शिक्षक कोई प्रशिक्षक या काम लेने वाला नहीं होता, वह सहायता और मार्गदर्शन करने वाला होता है।"

ये सभी सिद्धांत हमारी प्राचीन भारतीय विरासत से उद्भव हुए हैं जो शिक्षा को सभी संकायों के एकीकृत विकास के रूप में देखती है। जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने कहा, "हम ऐसी शिक्षा चाहते हैं जिससे चरित्र का निर्माण हो, मन की शक्ति बढ़े, बुद्धि का विस्तार हो और जिससे व्यक्ति आत्म-निर्भर बन सके"।

नई शिक्षा नीति में बहुत सारे अच्छे विचार हैं। यह टिप्पणियों, सुझावों और 'नवोन्मेषी' सुझावों के लिए देश के समक्ष है। कृपया मसौदे पर एक नज़र डालें और एक ऐसी नीति के निर्माण में योगदान दें, जो हमारे देश को 21 वीं सदी में आगे ले जाएगी।

आप, शिक्षक, राष्ट्रीय विकास के प्रमुख वास्तुकार हैं। आप अपने ज्ञान, दृष्टिकोण, व्यवहार और अधिगम की सही परिस्थितियां सृजित करने की क्षमता के माध्यम से एक सशक्त राष्ट्र की नींव रखते हैं। आप अपने खुशहाल, परिपूर्ण जीवन की नींव रखते हैं। मैं नए, पुनरुत्थानशील भारत का निर्माण करने के आपके प्रयासों में आपको शुभकामनाएं देता हूं।

धन्यवाद।"