05 सितंबर, 2018 को नई दिल्ली में श्री बिद्युत चक्रवर्ती द्वारा लिखित संवैधानिक भारत: एक आदर्श परियोजना नामक पुस्तक का विमोचन करने के उपरांत सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का भाषण

नई दिल्ली | सितम्बर 5, 2018

"श्री बिद्युत चक्रवर्ती द्वारा लिखित 'कांस्टिच्यूसनलाइजिंग इंडिया: एन आइडीएसनल प्रोजेक्ट' पुस्तक का विमोचन कर मैं प्रसन्न हूँ।

305 पेज की यह पुस्तक इसका विश्लेषण करती है कि 1950 में लागू भारत का संविधान किस प्रकार बनाया गया था। व्यापक रूप से प्रचलित धारणा कि यह एक उधार लिया गया दस्तावेज था, के विपरीत यह रेखांकित करता है कि संविधान उस प्रक्रिया की पराकाष्ठा थी जिसमें विपरीत विचारों को मिलाकर सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से भिन्न आबादी के लिए स्वीकार्य सिद्धांतों को विकसित किया गया था।

उदारवाद, पुनर्जागरण और स्वराज के गांधीवादी विचारों के बीच हुई उग्र बहस की एक झलक प्रदान करते हुए लेखक इस धारणा को चुनौती देते हैं कि यह केवल अन्य स्थानों पर प्रचलित संवैधानिक प्रावधानों और प्रथाओं का विचारहीन रूप से उधार लिया जाना है। किताब बताती है कि संविधान के निर्माण में पूरी तरह से अलग सामाजिक-आर्थिक जड़ों वाले विचारों ने एक दूसरे के साथ कैसे होड़ की और जिसे सभी ने स्वीकार किया।

यह पुस्तक उन प्रक्रियाओं और घटनाओं के बारे में है जिससे ब्रिटिश शासन के परिणामस्वरूप भारत का संवैधानीकरण हुआ। यह एक ऐसी यात्रा के बारे में भी है जिसमें कई राजनीतिक -विचारधारात्मक दृष्टिकोणों को व्यक्त किया गया और उन्हें प्रमुखता प्राप्त होने से पहले उन-पर गर्म बहस हुई।

लेखक ध्यान दिलाते हैं कि संविधान सभा द्वारा तीन साल से भी कम अवधि में संविधान का निर्माण उपनिवेशवाद की समाप्ति के पश्चात स्वतंत्र राजनीति के राष्ट्रवादी और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को कार्यरूप देने में संस्थापकों के प्रयासों को प्रतिबिंबित करता है।

उन्होंने यह भी समुक्ति की कि संस्थापकों के द्वारा संविधानवाद और कानून के शासन के प्रति प्रतिबद्धता का संविधान से बड़ा कोई सबूत नहीं हो सकता जिसका निर्माण उन्होंने विभाजन के कारण उत्पन्न गंभीर कठिनाइयों के बावजूद किया। संविधान सभा की कार्यवाही में दिए गए सुझाव के अनुसार, उदार लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता संविधान के निर्माण में सर्वोपरि बनी रही।

हमारे संस्थापकों ने, निस्संदेह हमें दुनिया के सर्वोत्तम संविधानों में से एक दिया, हालांकि इसमें फ्रांस, यूएसएसआर और आयरलैंड समेत विभिन्न देशों के सिद्धांतों को अपनाया गया था। दूरदर्शिता, दूरदृष्टि और एक लचीला दृष्टिकोण प्रदर्शित करते हुए, उन्होंने विभिन्न दृष्टिकोणों को स्थान दिया और इसे भारतीय परिस्थिति के अनुकूल बना दिया।

लेखक कहते हैं, "संस्थापकों ने, जैसा कि उपयुक्त ही सुझाव दिया गया है, 'संभाव्यता का रास्ता अपनाया गया और अपनी विचारधारा के कारण यथार्थ से कभी मुह नहीं मोड़ा'। इस प्रकार सबसे व्यावहारिक होने के कारण, संविधान निर्माताओं ने उदार संविधानवाद के मौलिक सिद्धांतों की अपनी समझ के आधार पर संरक्षक के रूप में कार्य करने के लिए एक संविधान तैयार किया। अपनी पसंद को व्यक्त करने में, उन्होंने एक सरल और फिर भी मौलिक विकल्प का चयन किया। उन्होंने लोगों पर भरोसा करने का फैसला किया "।

इस दावे को ध्यान में रखते हुए कि संविधान लगभग दो शताब्दियों में हुई सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मंथन की लंबी प्रक्रियाओं की पराकाष्ठा थी, यह पुस्तक यह सुझाव देकर एक अवधारणात्मक बिंदु प्रदान करती है कि ऐसा प्रतीत होता है कि तीन प्रमुख वैचारिक ताकतें-उपनिवेशवाद, राष्ट्रवाद और लोकतंत्र भारत में संविधानवाद को गढ़ने में महत्वपूर्ण रहीं हैं।

इसके लागू होने के 68 साल बाद भी, संविधान, शासन और न्यायशास्त्र के सभी मामलों में मार्गदर्शक है। हमें संविधान-निर्माताओं को एक ऐसा संविधान देने के लिए सलाम करना चाहिए जिसने हमारे संसदीय लोकतंत्र को मजबूत किया है और समय की कसौटी पर खरा उतरा है, भले ही यह कई संशोधनों के माध्यम से विकसित हुआ हो।

सरदार पटेल, जिन्होंने संविधान तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए एक मजबूत केंद्र और मजबूत, एकसमान प्रशासन चाहते थे। उन्होंने संविधान सभा में अल्पसंख्यकों, आदिवासियों के अधिकारों और निर्देशक सिद्धांतों के संबंध में प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था।

भारतीय संविधान के निर्माता डॉ बी. आर. अंबेडकर ने संविधान सभा के अपने संबोधन में बताया कि किस प्रकार संविधान के निर्माताओं ने इतने दुर्जेय कार्य को तीन साल से भी कम समय में पूरा किया। उन्होंने यह भी कहा कि डॉ अम्बेडकर ने बताया था कि अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के संविधान हमारे संविधान से बहुत छोटे थे।

उन्होंने कहा था, हमारे संविधान में 395 अनुच्छेद हैं जबकि अमेरिकी संविधान में केवल सात, कनाडा के संविधान में 147, ऑस्ट्रेलिया के संविधान में 128 और दक्षिण अफ़्रीका के संविधान में 153 अनुच्छेद थे। उन्होंने यह भी उल्लेख किया था कि अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के संविधानों के निर्माताओं को संशोधन की समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ा था, जबकि संविधान सभा के समक्ष 2,473 संशोधन आए थे।

अपने भावपूर्ण और विद्वतापूर्ण भाषण में डॉ अम्बेडकर ने विभिन्न पहलुओं पर विचार व्यक्त किया और समुक्ति की कि लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए हमें अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के संवैधानिक तरीकों पर दृढ़ रहना होगा। उन्होंने कहा था कि वहाँ असंवैधानिक तरीकों का कोई औचित्य नहीं है, जहां संवैधानिक विधियां उपलब्ध हैं।

हमारे संविधान, जो एक जीवंत दस्तावेज है, की पवित्रता को सभी लोगों, विशेष रूप से जो संवैधानिक पदों पर बैठे हैं, द्वारा बनाए रखा जाना चाहिए। अन्यथा, हम लोगों को और देश को क्षति पहुचाएंगे और संस्थापकों के विश्वास और आस्था के प्रति विश्वासघात करेंगे।

अपना भाषण समाप्त करने से पहले, मैं डॉ अम्बेडकर के विलक्षण शब्दों को याद करना चाहूँगा, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने तब थे, जब उन्होने यह कहा था: "कोई संविधान चाहे जितना भी अच्छा हो, अगर इसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं हैं, तो यह बुरा साबित होगा। कोई संविधान चाहे जितना भी बुरा हो, अगर इसे लागू करने वाले लोग अच्छे हैं, तो यह अच्छा साबित होगा "।

जय हिन्द!"