05 मार्च, 2021 को नवसारी, गुजरात में निराली मल्टी-स्पेशीऐलिटी अस्पताल के शिलान्यास समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नवसारी, गुजरात | मार्च 5, 2021

“मुझे आज आप सभी के बीच उपस्थित होकर अत्यंत हर्ष की अनुभूति हो रही है। मैं अत्यन्त प्रसन्न हूं कि मुझे निराली मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल की आधारशिला रखने के लिए आमंत्रित किया गया है जो एलएंडटी समूह के चेयरमैन, परोपकारी और पद्म विभूषण से सम्मानित श्री ए.एम. नाइक की एक नेक पहल है। इस अस्पताल का मूल उद्देश्य क्षेत्र के आम लोगों को किफायती तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं प्रदान करना है जो वास्तव में सराहनीय है।
यह मल्टी-स्पेशिएलिटी अस्पताल और इससे जुड़ा कैंसर अस्पताल जो कि ए.एम. नाइक हेल्थकेयर कैंपस का हिस्सा है, इस क्षेत्र के लोगों की स्वास्थ्य देखभाल जरूरतों को पूरा करने में एक पथ प्रदर्शक पहल हैं। जैसा कि मैंने प्रायः इस बात पर जोर दिया है कि प्रत्येक क्षेत्र में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र का मिलकर काम करना हमारे राष्ट्रीय विकासात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है। मैं इन सभी प्रयासों और प्रयत्नों के लिए श्री नाइक जी की हार्दिक सराहना करता हूं।

मित्रों,
सूरत और नवसारी में आना मुझे गांधीजी द्वारा यहां 1930 में 90 साल से भी पहले ऐतिहासिक दांडी नमक मार्च किए जाने की याद दिलाता है। आंदोलन की सादगी, आदर्शों की शुचिता और अहिंसक साधनों का कड़ाई से पालन करने से दुनिया भर में इस आंदोलन को प्रसिद्धि और मान्यता मिली। इसने हमारे स्वाधीनता आंदोलन को एक बहुत बड़ी ताकत दी और हमें आत्म शक्ति और आत्म निर्भरता की ताकत की याद दिलाई।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान सरदार पटेल के नेतृत्व में अन्यायपूर्ण कराधान के खिलाफ बारदोली सत्याग्रह की एक और शानदार घटना भी इस क्षेत्र में हुई थी।

दांडी मार्च और बारदोली सत्याग्रह आज भी पूरी दुनिया और भारत में आंदोलनों के लिए वांछित लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु शांतिपूर्ण साधनों को अपनाने के लिए अनुकरणीय बने हुए हैं। जैसा कि मैं अक्सर कहता हूं, प्रगति के लिए शांति बेहद जरूरी है।

प्रिय बहनों और भाइयों,
गांधीजी ने एक बार कहा था: " यह स्वास्थ्य ही है जो वास्तविक धन है, न कि सोना और चांदी "। उनके शब्द सार्वभौमिक सत्य हैं। स्वास्थ्य के बिना धन का कोई अर्थ नहीं है। हमें यह याद रखना चाहिए कि केवल धन से हमारे उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो सकती है- हमारे द्वारा की गई सेवा और अर्जित की गई प्रतिष्ठा से दुनिया और हमारे परिवार को मदद मिल पाएगी, भले ही हम रहें या न रहें। इसलिए मेरा कहना है कि
‘दूसरों के लिए जीयो और दीर्घायु बनो!’

कोविड महामारी ने मानवता को यह अमूल्य पाठ पढ़ाया है कि स्वास्थ्य का सर्वोपरि महत्व है। जिस तरह यह एक व्यक्ति के बारे में सच है, वैसे ही यह समाज के बारे में भी सच है।

हमारे कोविड योद्धाओं- चिकित्सकों, नर्सों, पराचिकित्सा कर्मचारियों, स्वास्थ्य कर्मचारियों और गांवों में आशा कार्यकर्ताओं - वास्तव में, पूरी चिकित्सा बिरादरी-ने असाधारण इच्छाशक्ति दिखाई है और इस वैश्विक महामारी से लड़ने में हमारी मदद करने के लिए अपने जीवन को अत्यंत जोखिम में डालकर नि:स्वार्थ बलिदान दिए हैं। मैं अपने से अधिक दूसरों की जरूरतों को प्राथमिकता देने और 'साझा करने तथा देखभाल करने' के हमारे दर्शन को साकार करने के लिए उन्हें सलाम करता हूं।

स्वास्थ्य पर जोर देने का तात्पर्य यह नहीं है कि स्वास्थ्य और धन पारस्परिक रूप से अलग-अलग हैं। एक अच्छी स्वास्थ्य देखभाल सेवा प्रणाली, वास्तव में किसी क्षेत्र में शिक्षा और उद्योगों के साथ आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने वाली हो सकती है। एक प्रभावी, किफ़ायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल सेवा प्रणाली गरीबों पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ को कम कर सकती है, श्रमिक उत्पादकता में सुधार कर सकती है, स्कूलों में अनुपस्थिति को कम कर सकती है और अंततः विकास के साथ एक मजबूत सकारात्मक संबंध स्थापित कर सकती है। अत:, अच्छा स्वास्थ्य व्यक्ति, समुदाय और बड़े स्तर पर समाज के लिए एक संपत्ति है।

बहनों और भाइयों,
भारत ने आजादी के बाद आधुनिक चिकित्सा, बेहतर सुविधाओं की उपलब्धता और सरकार द्वारा स्वास्थ्य देखभाल सेवा पर ध्यान दिये जाने के कारण स्वास्थ्य संकेतकों में जबरदस्त प्रगति हासिल की है। लेकिन भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, हमेशा कुछ न कुछ और अधिक किए जाने की संभावना बनी रहती है।

हमारे सामने अभी भी स्वास्थ्य संबंधी बडी चुनौतियां हैं जिन पर ध्यान दिए जाने और समन्वित कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है। इनमें कम सार्वजनिक व्यय, कम डॉक्टर-रोगी अनुपात, बढ़ता आय से अधिक खर्च, चिकित्सा महाविद्यालयों की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा और कम लोगों द्वारा स्वास्थ्य बीमा को अपनाना आदि शामिल हैं। न केवल सरकार बल्कि निजी क्षेत्र, नागरिक समाज और अन्य संगठन इस पर प्राथमिकता से विचार करें, कार्य करें और इनमें सुधार करें।

जैसा कि हम सभी जानते हैं, 'आयुष्मान भारत' के हमारे विजन की सबसे बड़ी बाधाओं में एक बाधा स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच भारी असमानता है। हमें एक मिशन मोड में इस अंतर को पाटने की जरूरत है।

एक तरफ जहां निजी क्षेत्र चिकित्सा सुविधा प्रदान करने में सरकार का एक सक्षम भागीदार रहा है, वहीं अभी भी काफी हद तक इसका दायरा शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है। मैं निजी क्षेत्र से आग्रह करता हूं कि वह अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अपने दायरे का विस्तार करे और लोगों को किफायती स्वास्थ्य देखभाल सेवा प्रदान करे।
सरकारों को भी सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल का लाभ उठाते हुए, निजी क्षेत्रों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों, विशेष रूप से दूरदराज के क्षेत्रों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने के लिए अधिक सक्रिय रूप से भागीदार बनना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभावी प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली सुनिश्चित करना स्वास्थ्य संबंधी स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए अति महत्वपूर्ण है।

बहनों और भाइयों,
स्वास्थ्य देखभाल सेवा पर होने वाला व्यय एक और पहलू है जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यह चिंता का विषय है कि स्वास्थ्य संबंधी खर्चों, दवाइयों और उपचार की लागत से कई लोग गरीबी के दुष्चक्र में फंस जाते हैं। स्वास्थ्य बीमा का विस्तार करना और जन औषधि केंद्रों तक पहुंच में सुधार की आवश्यकता है।

इस संबंध में, सरकार की प्रत्येक खण्ड स्तर पर एक जन औषधि केंद्र स्थापित करने की प्रतिबद्धता वास्तव में एक स्वागत योग्य कदम है। इसी भावना के साथ प्रधानमंत्री ने एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सुरक्षा योजना 'आयुष्मान भारत' शुरू की जो 10 करोड़ से अधिक गरीब और कमजोर परिवारों को द्वितीयक और तृतीयक स्तर पर देखभाल हेतु अस्पताल में भर्ती कराने के लिए प्रत्येक परिवार को प्रति वर्ष 5 लाख रुपये का कवर प्रदान करती है।

चिन्ता का एक अन्य क्षेत्र देश में योग्य चिकित्सकों और प्रशिक्षित पराचिकित्सा स्टाफ की कमी है। यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में 6 लाख चिकित्सकों और 2 मिलियन नर्सों की कमी है। इसे सुधारने के लिए और अधिक सार्वजनिक और निजी चिकित्सा महाविद्यालय स्थापित किए जाने की आवश्यकता है। हमें विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में इस अंतर को पाटने के लिए चिकित्सकों और नर्सों को तेजी के साथ प्रशिक्षित और तैनात करने की आवश्यकता है।

प्रिय मित्रों,
भारत एक महामारी के संक्रमण से गुजर रहा है। देश में 60 प्रतिशत से अधिक मौतों का कारण बनने वाले कैंसर, मधुमेह, हृदय विकारों जैसे गैर-संचारी और जीवनशैली संबंधी बीमारियों में वृद्धि हो रही है। हमें इन जीवन शैली संबंधी रोगों के बारे में लोगों को और अधिक जागरूक करने की आवश्यकता है। मैं सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के स्वास्थ्य विशेषज्ञों से आह्वान करता हूं कि गतिहीन जीवन शैली और अस्वास्थ्यकर आहार के कारण होने वाले स्वास्थ्य खतरों के बारे में अभियान शुरू करने का बीड़ा उठाएं।

इसी तरह, स्वास्थ्य का एक और अभिन्न पहलू जिस पर बहुत अधिक जागरूकता की आवश्यकता है, वह है मानसिक स्वास्थ्य। डबल्यूएचओ ने 2019 में अनुमान लगाया था कि 7.5% भारतीय मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों से प्रभावित हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर महामारी के प्रभाव का न केवल भारत में बल्कि दुनिया में अन्यत्र कहीं भी अभी तक पूरी तरह से अनुमान नहीं लगाया गया है। हमें मानसिक स्वास्थ्य को यथोचित महत्व देने, इससे जुड़े कलंक को दूर करने के लिए जागरूकता बढ़ाने और इसके समाधान के लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। किसी भी चीज से ज्यादा हमें मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

अंत में, मैं आपका ध्यान स्वास्थ्य और कल्याण के लिए शैशवावस्था में देखभाल के महत्व की ओर दिलाना चाहता हूँ। किसी बच्चे को मिलने वाला शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक पोषण उसके विकास में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हाल के वर्षों में हुई प्रगति के बावजूद, हमें अभी भी मातृ और बाल स्वास्थ्य में विशेष रूप से पोषण के पहलू की दृष्टि से सुधार करने की आवश्यकता है।

बहनों और भाइयों,
हमें स्वास्थ्य देखभाल के सम्बन्ध में समग्र और व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। जैसा कि डब्ल्यूएचओ का सुझाव है, "स्वास्थ्य से तात्पर्य बीमारियों का नहीं होना मात्र नहीं है; बल्कि यह लोगों की अपने पूरे जीवन के दौरान अपनी पूरी क्षमता तक विकास करने की योग्यता भी है।"

स्वास्थ्य देखभाल का तात्पर्य शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से ‘खुश’ रहने का प्रयास होना चाहिए। हमें इस 'खुशी' की तलाश और इसे फैलाने में अग्रसक्रिय होना होगा। डॉक्टरों और अस्पतालों को स्वयं को भी चिकित्सा देखभाल के लिए एक अधिक मानव-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने के लिये तैयार करना होगा। स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को गरीबों को किफ़ायती कीमत पर अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधा प्रदान करनी चाहिए।

अपनी बात समाप्त करने से पहले, मैं एक बार फिर श्री अनिल नाइक जी की तहे-दिल से प्रशंसा करता हूँ। उनको और उनकी टीम को उनके भविष्य के प्रयासों के लिए मेरी शुभकामनाएं।

इस प्रकार एक साथ मिलकर हमें मानवता के दुख को कम करने और खुशी फैलाने का प्रयास करना चाहिए। जैसा कि हमारे पूर्वज कहा करते थे, "लोका: समस्ता: सुखिनो भवन्तु"।

जय हिन्द!”