05 दिसंबर, 2018 को आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में स्वर्ण भारत ट्रस्ट में आयोजित कार्डियो पल्मोनरी रिससिटेशन (CPR) कैंप में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का संबोधन

विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश | दिसम्बर 5, 2018

हृदय रोग हमारे देश में मूक महामारी और प्रमुख रूप से प्राणघातक बन चुका है। यह अनुमान लगाया गया है कि विश्व के हृदय रोग के मामलों में 60% भारत में पाये जाते हैं। अध्ययन यह भी दर्शाते हैं कि दक्षिण एशियाई लोगों में हृदय रोगों का जोखिम अधिक होता है तथा अन्य जातीय समूहों की तुलना में यहां दिल का दौरा अपेक्षाकृत छोटी आयु में पड़ने लगता है।

माना जा रहा है कि आधुनिक जीवन-शैली, शारीरिक क्रियाकलाप की कमी, अनुवांशिक पूर्ववृत्ति, उपापचयी सिंड्रोम तथा अस्वास्थ्यकर खान-पान संबंधी आदतों जैसे कारण भारतीयों में हृदय रोग का जोखिम बढ़ा रहे हैं।

हमारे देश में बेहतर होती आर्थिक स्थिति के साथ हम मधुमेह, उच्च रक्तचाप और कोरोनरी धमनी हृदय रोग जिसके परिणामस्वरूप हृदय गति अकस्मात रुक सकती है, जैसी जीवनशैली संबंधी बीमारियों के अत्यधिक प्रकोप का सामना कर रहे हैं। कृपया ध्यान दें कि दिल का दौरा और हृदय गति रुकना समान बात नहीं है। दिल का दौरा तब पड़ता है जब हृदय तक जाने वाला रक्त प्रवाह अवरूद्ध हो जाता है, जबकि हृदय की गति तब रुकती है जब कोई दुष्क्रिया होती है और हृदय गति अचानक रुक जाती है।

अकस्मात हृदय गति रुकने की स्थिति में यदि रोगी को तत्काल कार्डियोपलमोनरी रिससिटेशन (सीपीआर) प्रदान कर दिया जाए तो उसे ठीक किया जा सकता है। यदि इन लोगों को सीपीआर मिल जाए तो उनके बचाव की संभावनाएं दोगुना अथवा यहाँ तक की तीन गुना तक भी बढ़ सकती है। ऐसे पीड़ित लोगों को पुनर्जीवन देने में प्रत्येक क्षण मायने रखता है।

मुझे बताया गया है कि भारत में अचानक हृदय गति रुकने से होने वाली मृत्यु दर विकसित देशों की तुलना में बहुत अधिक है। संयुक्त राज्य अमेरिका जहां यह दर प्रति लाख जनसंख्या पर 60 से 151 है, वहीं भारत में यह प्रति एक लाख की जनसंख्या पर 4280 है।

अनुमान है कि घर पर हृदय गति रुकने वाले रोगियों में से 70% की मृत्यु हो जाती है और अनुमान है कि अस्पताल के बाहर हृदय गति रुकने वाले रोगियों में से 90% की मृत्यु हो जाती है।

हमारे देश में अचानक हृदय गति रुकने के बाद होने वाली उच्च मृत्यु दर की समस्या से बचने के लिए, हमें भारतीय जनता को सीपीआर में प्रशिक्षण देना होगा। प्रत्येक भारतीय नागरिक जीवन को बचा सकता है।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि इंडियन सोसाइटी ऑफ एनएसथीसियोलॉजिस्ट्स की पहल के संबंध में इंडियन रिससिटेशन काउंसिल (आईआरसी) ने अस्पताल की व्यवस्था के बाहर कंप्रेशन-ओनली-लाइफ सपोर्ट (सीओएलएस) नामक सीपीआर प्राथमिक रूप से देने के संबंध में सरल दिशा-निर्देशों का विकास किया है। मुझे बताया गया है कि हमारे देश में सीमित अवसंरचना, सांस्कृतिक सीमाएं और प्रशिक्षित कर्मिकों की उपलब्धता तथा स्वास्थ्य-सेवा कर्मियों की कमी को ध्यान में रखते हुए इन दिशा-निर्देशों का विकास किया गया है।

मैं भारत-केंद्रित दिशा-निर्देशों का विकास करने में इंडियन रिससिटेशन काउंसिल के द्वारा किए गए प्रयासों की सराहना करता हूँ क्योंकि हम पिछले 40 वर्षों से एएचए (अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन) के दिशा-निर्देशों पर निर्भर रहते रहे हैं।

मुझे बताया गया है कि एएचए के दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रशिक्षण बहुत ही महंगा होता है और आम आदमी की पहुंच के बाहर है। मुझे खशी है कि भारतीय इंडियन रिससिटेशन काउंसिल देशभर में निशुल्क प्रशिक्षण उपलब्ध करवा रही है और मैं इसके लिए उनकी सराहना करता हूँ।

मुझे यह जाकर भी खुशी है कि इंडियन सोसाइटी ऑफ एनएसथीसियोलॉजिस्ट्स, जिसके 27000 सदस्य हैं, देशभर में सीपीआर प्रशिक्षण गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। मुझे बताया गया है कि 23 अक्तूबर 2018 (वर्ल्ड रीस्टार्ट अ हार्ट डे-डब्ल्यू आरएएच) को इंडियन रिससिटेशन काउंसिल के दिशा-निर्देशों के अंतर्गत विभिन्न संस्थाओं द्वारा सीओएलएस में 1,75,000 लोगों को प्रशिक्षण दिया गया।

कन्याकुमारी से कश्मीर तक, गुजरात से असम तक, छोटे गांवों से लेकर बड़े शहरों में उच्च विद्यालयों से लेकर महाविद्यालयों में, विश्वविद्यालयों तथा नर्सिंग महाविद्यालयों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर चिकित्सा महाविद्यालयों में लोगों को प्रशिक्षण दिया गया। यह प्रशिक्षण बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, विद्यालयों, सामुदायिक केंद्रों और पुलिस स्टेशनों सहित विभिन्न स्थानों पर संचालित किया गया। मुझे खशी है कि रोटरी क्लब, लायंस क्लब और बहुत से गैर-सरकारी संगठनों ने इस पहल में भाग लिया।

एक ही दिन में इस कार्यक्रम में लोगों की इतनी बड़ी उपस्थिति आईआरसी द्वारा रिससिटेशन प्रशिक्षण के महत्व और आम आदमी के लिए इसकी उपयुक्तता के संबंध में सृजित जागरूकता को दर्शाती है।

मुझे बताया गया है कि भारत अपने निजी दिशानिर्देश बनाने वाला सातवां राष्ट्र है। इंटरनेशनल लिऐज़ान कमिटी ऑन रिससिटेशन (आईएलसीओआर), जो विभिन्न राष्ट्रों की रिससिटेशन परिषदों के लिए संयुक्त राष्ट्र के समान है, ने आईआरसी की इस पहल को मान्यता दी है और भारत को प्रमुख रिससिटेशन संस्थाओं के इस विश्वव्यापी मंच में सम्मिलित होने का आमंत्रण दिया है। भारत आईएलसीओआर की सदस्यता के लिए आवेदन कर रहा है।

मैं इस नेक प्रयास का समर्थन करने के लिए आगे आई बहुत-सी संस्थाओं, तेलुगू ऐसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका (टीएएनए), प्रशिक्षण को प्रायोजित करने और इसके लिए डम्मी मुहैया करने के लिए अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडियन ओरिजिन (एएपीआई) की भी सराहना करना चाहूंगा। मैं दिए गए सहयोग और प्रोत्साहन के लिए जिला कलेक्टरों और प्रशासकों की भी प्रशंसा करता हूँ।

मुझे बताया गया है कि बहुत से देशों में उच्च विद्यालय के विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करने के लिए कानून हैं। संभवत:, हमें भी विद्यालयों में सीपीआर प्रशिक्षण को अनिवार्य बनाने के लिए एक कानून की आवश्यकता है। हमें सरकारी क्षेत्र और निजी कंपनियों के सभी कार्मिकों को यह प्रशिक्षण प्रदान करने की आवश्यकता है। हमें एक ऐसा भारत बनाने की आवश्यकता है जहां प्रत्येक नागरिक प्राण-घातक संकट के समय दूसरों की जान बचाने में सक्षम हो।

जय हिंद!"