05 जून, 2018 को राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में राज्यपालों के 49वें सम्मेलन में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | जून 5, 2018

"मुझे इस सम्मेलन में माननीय राज्यपालों और उप-राज्यपालों के बीच आकर हर्ष की अनुभूति हो रही है।

अपने विभिन्न राज्यो के दौरों के दौरान मैंने आप में से कई लोगों के साथ गहन विचार-विमर्श किया है और मैंने भारत की विकास यात्रा में आपके उत्कृष्ट योगदान को देखा है।

भारत ने, जैसाकि आप सभी जानते हैं, स्वतंत्रता के उपरांत गत सात दशकों में तेजी से प्रगति की है। हालांकि, गत चार वर्षों में देश ने एक नया विकास मार्ग प्रशस्त किया है।

इस नए विकास मार्ग की एक नई गति, उद्देश्य की नई भावना और एक नई दिशा है।

मजबूत राजनैतिक इच्छाशक्ति कई कार्यक्रमों में स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है।

हमारी विशाल, सक्षम नौकरशाही के कौशलों का प्रयोग परिणाम प्रदान करने के लिए किया जा रहा है।

हालांकि, उल्लेखनीय यह है कि हम अनेक नए कार्य कर रहे हैं।

विकास अब अधिक-से-अधिक जन-केन्द्रित और जन प्रेरित हो रहा है। वास्तव में, विकास एक सामाजिक मिशन बन गया है।

हमारी सरकार समाज के प्रत्येक वर्ग में छिपी हुई प्रतिभा और ऊर्जा को अवसर प्रदान कर रही है। यह सामूहिक प्रयास करने वाली एक ऐसी टीम इंडिया का निर्माण कर रही है, जिसका ध्यान राष्ट्रीय विकास पर केंद्रित है।

यद्यपि चुनी हुई सरकारें मुख्यत: कार्यक्रमों की योजना और कार्यान्वयन के लिए उत्तरदायी होती हैं, परंतु विकास रूपी नौका के संचालन हेतु एक प्रबुद्ध परामर्शदाता, एक सलाहकार, एक दोस्त, दार्शनिक और मार्गदर्शक की आवश्यकता सदैव होती है।

ऐसा विशेष तौर पर तब यथार्थ प्रतीत होता है जब संकीर्ण दृष्टिकोण से विकास प्रक्रिया अवरूद्ध होने की संभावना हो। ऐसे समय में आपकी भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

आपने स्वयं को विकास उत्प्रेरक (बढ़ावा देने वाला) बिलकुल सही कहा है। मुझे खुशी है कि आपने राजभवनों को सकारात्मक परिवर्तन के उत्प्रेरक स्थल बनाने में अपने कुछ अनुभवों को भी साझा किया है।

राज भवन सत्ता के समानांतर केन्द्र नहीं हैं। राज्यपालों को विकास प्रक्रिया में सलाहकार की भूमिका निभानी चाहिए।

मुझे विश्वास है कि परिवर्तन को कायम रखने में आने वाले वर्षों में आपकी भूमिका और अधिक होगी। सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के तौर-तरीकों में परिवर्तन, महत्वपूर्ण मुद्दों के बारे में सामाजिक जागरूकता में परिवर्तन, समाज में अस्पृश्यता, महिलाओं के खिलाफ अत्याचार और भेदभाव जैसी सामाजिक बुराईयों के खिलाफ लड़ने के तौर-तरीकों में परिवर्तन इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं।

आपका प्रबुद्ध नेतृत्व अत्यधिक अंतर पैदा कर सकता है।

राज्य सरकार के साथ घनिष्ठ संबंध कायम रखते हुए आप नीतियों और कार्यकमों पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं और सरकार का मार्गदर्शन कर सकते हैं।

अपने विनम्र परामर्श द्वारा आप यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि सभी कार्यक्रमों का लाभ बिना किसी पूर्वाग्रह और भेदभाव के सभी वर्गों तक पहुँचे।

अपने निष्पक्ष, समदूरवर्ती दृष्टिकोण के माध्यम से आप विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच निरंतर संवाद बनाए रख सकते हैं और ऐसा वातावरण बना सकते हैं जो विकास संबंधी मुद्दों पर सर्वसम्मति बनाए।

अपने पद के माध्यम से आप यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि नीतियां और कार्यक्रम संवैधानिक उपबंधों के अनुरूप हों।

वरिष्ठ राजनेता के रूप में अपनी हैसियत के माध्यम से सिविल सोसाइटी और युवाओं को राष्ट्र निर्माण में अधिक सक्रिय रूप से शामिल होने के लिए प्रेरणा दे सकते हैं।

आज हमारे पास एक अभूतपूर्व अवसर है। सभी पणधारियों को शामिल करते हुए विकास संबंधी संवाद में परिवर्तन लाने का एक अवसर। समावेशी, संवहनीय विकास पर केंद्रित करते हुए विकास की धारा को परिवर्तित करने का अवसर। हमें इस अवसर को खोना नहीं चाहिए।

एक संवैधानिक प्राधिकारी के रूप में आपके कई उत्तरदायित्व हैं। देश आपकी तरफ बहुत आशान्वित होकर देखता है। लोग आपके द्वारा बोले जाने वाले हर शब्द को सतर्क होकर सुनते हैं और वे आपके द्वारा उठाए जाने वाले प्रत्येक कदम पर नजर रख रहे हैं।

ये अपेक्षाएं दिन-प्रति-दिन बढ़ रही है और हमारे पास सक्रिय मीडिया है जो हममें से प्रत्येक पर अनवरत नजर रखता है। प्रश्न है कि : हम कैसे बोलते हैं, हम कैसे करते हैं और कैसे हम संविधान की रक्षा के मुख्य लक्ष्य को अक्षरश: पूरा करते हैं?

आपमें से प्रत्येक के पास जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में लंबा अनुभव है। इसलिए मैं निश्चिंत हूँ कि इस उत्कृष्ट पद पर रहते हुए आप ऐसी विरासत का निर्माण करेंगे जिसपर आप और देश गर्व कर सके।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कुछ विषयों पर आपको सचेत रहने की जरूरत है।

निष्पक्ष और समदूरवर्ती दृष्टिकोण हमारे भाषणों और कार्यकलापों में परिलक्षित होना चाहिए।

हम जनता में जिन मूल्यों का समर्थन करते हैं उन्हें हमें "जीना" चाहिए। सहानुभूति, सामंजस्य, सत्यनिष्ठता, पर्यावरण संरक्षण एवं अकादमिक श्रेष्ठता के साथ-साथ सत्यनिष्ठा प्रमुख है।

जनता को यह महसूस करना चाहिए कि हम उत्तरदायी हैं और उनके दृष्टिकोण या विचार सुनने के इच्छुक हैं। तभी जैसा सामाजिक परिवर्तन हम सभी चाहते हैं, वैसे सामाजिक परिवर्तन का प्रवर्तक बनने की उनकी अधिक संभावना होगी।

जब हम गांधी जी के जन्म की 150वीं वर्षगांठ मनाने वाले हैं, हमें अवश्य स्मरण करना चाहिए कि उनके असंख्य, कालातीत संदेशों में से दो ऐसे हैं जो हमारे कर्त्तव्य निष्पादन में सहायता करेंगे।

उन्होंने हमसे कहा था:

"आप जो सुधार दुनिया में देखना चाहते हैं आप को स्वयं उस सुधार का हिस्सा होना चाहिए।"

दूसरा उन्होंने कहा:

"तुम्हें एक जन्तर देता हूँ। जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम् तु पर हावी होने लगे, तो यह कसौटी आजमाओं: जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शकल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुँचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा? यानि क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है? तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम् समाप्त होता जा रहा है।"

मैं आप सभी को हमारे देश की सेवा करने के प्रयासों की सफलता के लिए शुभकामना देता हूँ।

जय हिन्द!"