04 नवंबर, 2017 को हैदराबाद में 10वें शहरी यातायात व्यवस्था संबंधी भारत सम्मेलन और प्रदर्शनी, 2017 तथा सत्रहवें सीओडीएटीयू सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

हैदराबाद | नवम्बर 4, 2017

"मैं आज यहां 10वें शहरी यातायात व्यवस्था संबंधी भारत सम्मेलन और प्रदर्शनी के उद्घाटन सत्र में आपके बीच आकर प्रसन्नता अनुभव कर रहा हूं। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा तेलंगाना सरकार की भागीदारी में यह आयोजन किया जा रहा है। शहरी यातायात से संबंधित पेरिस, फ्रांस का एक संगठन सीओडीएटीयू भी इस सम्मेलन के साथ अपना 17वां सम्मेलन आयोजित कर रहा है।

यह आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय, भारत सरकार का प्रमुख वार्षिक कार्यक्रम है और इसने विगत वर्षों में शहरी यातायात के क्षेत्र में विचार मंथन और ज्ञान के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

शहरीकरण 21वीं सदी की एक वास्तविकता है और इस सदी को शहरीकरण की सदी कहा जाता है। 2011 की जनगणना से स्पष्ट पता चलता है कि भारत में शहरीकरण की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है और देश का हर तीसरा व्यक्ति शहरों में रहता है। देश के सकल घरेलू उत्पाद में शहरी क्षेत्र की भागीदारी, जो वर्तमान में 66 प्रतिशत है, वर्ष 2031 तक बढ़कर 75 प्रतिशत हो जाने का अनुमान है। शहरीकरण के मौजूदा तरीकों से शहरी परिवहन प्रणालियों के समक्ष अभूतपूर्व चुनौतियां आ रही है।

विश्व भर में शहरी परिवहन हेतु आधारभूत ढांचे के अधिकाधिक निर्माण के बावजूद शहरी क्षेत्रों में स्थानों/कार्यकलापों और सेवाओं तक पहुंच लगातार कठिन हो गई है। दशकों से, अधिकांश देशों में तीव्र गति से शहरी विकास के साथ-साथ मोटर वाहनों के उपयोग में भी वृद्धि हुई है। कई मामलों में, अनियोजित शहरीकरण से शहरों का अव्यवस्थित विस्तार हुआ है जिससे मोटर लाइनों की मांग और अधिक बढ़ी है। इससे कई प्रकार की आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौतियां उत्पन्न हुई है।

विश्व भर में उत्सर्जित कुल ग्रीन हाउस गैसों में शहरी परिवहन का योगदान लगभग 25 प्रतिशत है। शहरों में स्थानीय वायु और ध्वनि प्रदूषण की भी यह एक बड़ी वजह है जो स्वास्थ्य पर खराब असर डालते हैं। परिवहन प्रणालियों के कारण उत्पन्न ट्रैफिक की भारी भीड़ से यात्रियों और परिवाहकों को बहुत आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है और उत्पादकता लागत बढ़ती है। विकासशील देशों के शहरों को इन चुनौतियों का सामना ज्यादा करना पड़ता है। इनमें और भी बढ़ोतरी हो सकती है क्योंकि तथ्य यह है कि आगामी दशकों में विश्व की कुल आबादी में होने वाली 90 प्रतिशत वृद्धि इन्हीं देशों के शहरों में होगी। ये शहर पहले ही अपने परिवहन तंत्र में निवेश की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे है।

विश्व के कई शहरों में, यातायात और परिवहन को एक समान मानने की गलती ने मोटरगाड़ियों की संख्या में वृद्धि की प्रवृत्ति को जन्म दिया है और शहरी सड़कों के नेटवर्क में विस्तार को प्रोत्साहन दिया है।

भारत में भी ऐसी स्थिति रही है। शहरों में मोटर गाड़ियों के बढ़ते प्रयोग से ट्रैफिक की भीड़ और प्रदूषण में लगातार वृद्धि हो रही है। यात्रा में लगने वाले समय में वृद्धि हो रही है जिसका अन्य चीजों पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। सड़कों की लंबाई बढ़ाने के संबंध में मुझे महान अमरीकी नगर वास्तुकार और इतिहासकार लेविस मेम्फॉर्ट की यह उक्ति याद आती है जिसमें उन्होंने कहा है कि "ट्रैफिक की भीड़ से बचने के लिए अधिकाधिक सड़कों का निर्माण वैसे ही है जैसे कोई व्यक्ति मोटापे से बचने के लिए अपनी बेल्ट ढीली करता रहे।"

कहने की जरूरत नहीं कि टिकाऊ और स्वच्छ शहरी यातायात व्यवस्था के लिए आयोजना और अभिकल्पना पर अधिकाधिक ध्यान देना जरूरी है। यातायात व्यवस्था का संबंध परिवहन अवसंरचना और परिवहन सेवाओं के विकास से ही नहीं है। यह गतिशीलता में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शारीरिक अवरोधों को दूर करने के बारे में भी है। गतिशीलता को एक अधिकार के रूप में मान्यता देना, जनता पर ध्यान केन्द्रित करना और लोगों को उनके गंतव्यों तक पहुंचने से रोकने वाले अवरोधों को दूर करना है।

सार्वजनिक परिवहन: यद्यपि निजी मोटरीकरण को चाह कर भी पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता तथापि एक किफायती, आरामदेह, विश्वसनीय और सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का प्रावधान करके निजी मोटरीकृत वाहनों की मांग को कम किया जा सकता है। वैश्विक आंकड़े दर्शाते हैं कि विश्व भर में अपने काम के लिए की जाने वाली लगभग 30% यात्राएं सार्वजनिक परिवहन से की जाती हैं। भारत में वर्ष 2011 में सार्वजनिक परिवहन का औसत हिस्सा 30% था। संभव है कि वर्ष 2021 तक यह आंकड़ा घटकर 22% रह जाए। किफायती और सुलभ सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों के अभाव के कारण निजी मिनीबस और माइक्रोबस सेवाओं जैसे अनौपचारिक प्रचालकों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। कुछ शहरों में सार्वजनिक परिवहन के रूप में केवल अनौपचारिक परिवहन ही उपलब्ध है।

वायु और ध्वनि प्रदूषण, दुर्घटनाओं और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों जैसे नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए उच्च क्षमता वाली सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों की आवश्यकता है। यह प्रणाली अल्प आय समूहों को भी समावेशी पहुंच प्रदान करती हैं।

यह प्रशंसनीय है कि भारत ने अनेक शहरों में सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों की व्यवस्था में अत्यधिक उन्नति की है। अनेक शहरों में मेट्रो रेल व्यवस्था में तेजी से वृद्धि हुई है, जिसमें दिल्ली सबसे आगे है। बस रैपिड पारगमन सिस्टम (बीआरटीएस) में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है जहां विभिन्न शहरों में लगभग 250 कि.मी. में यह प्रणाली प्रचालन में है और लगभग 250 किलोमीटर में यह निर्माणाधीन है। मैं बागोटा के वर्तमान मेयर श्री एनरिक पेनेलोसा का एक उद्धरण आपके साथ साझा करना चाहता हूं, जिन्होंने कहा था कि, "एक विकसित देश वह नहीं है जहां गरीब कारों का प्रयोग करें बल्कि विकसित देश वह है जहां अमीर सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करते हैं।"

पूर्ण संपर्क सुविधा: किसी उच्च क्षमता वाले सार्वजनिक परिवहन को लोकप्रिय बनाने के लिए, पूर्ण संपर्क सुविधा उपलब्ध करवाना महत्वपूर्ण है। यदि यात्री को मेट्रो स्टेशन अथवा बस स्टॉप तक पहुंचने के लिए सुविधाजनक परिवहन नहीं मिलता है तो बहुत संभव है कि यात्री द्वारा अपने निजी वाहन का उपयोग किया जाएगा।

गैर-मोटरीकृत परिवहन: पैदल और साइकिल के लिए गैर-मोटरीकृत परिवहन अवसंरचना का विकास न केवल सु-स्थापित सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों के लिए पूर्ण संपर्क सुविधा के रूप में कार्य करता है बल्कि स्वास्थ्य पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। टिकाऊ परिवहन व्यवस्था का लक्ष्य प्राप्त करने हेतु पैदल चलना और साइकिल का उपयोग करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। पैदल-पथों और समर्पित साइकिल ट्रैकों के विकास से न केवल टिकाऊ शहरी परिवहन का अत्यधिक संवर्धन होगा अपितु शहर में सार्वजनिक परिवहन के समग्र परिस्थितिकी तंत्र में भी सुधार होगा। एक स्वस्थ जीवनशैली के संवर्धन, मधुमेह और मोटापे से बचाव और प्रदूषण को कम करने के लिए अधिकाधिक पैदल पथों और साइकिल ट्रैकों की आवश्यकता है।

अंतर-तंत्रीय एकीकरण: परिवहन के विभिन्न तरीकों के एकीकरण से यात्रियों को सुगम संपर्क सुविधा मिलती है। इसमें संयुक्त (अंतरण) स्टेशन, समन्वित समय निर्धारण, संयुक्त किराये, एकल टिकट अथवा कॉमन मोबिलिटी कॉर्ड और संयुक्त सार्वजनिक सूचना कार्यकलाप शामिल हो सकते हैं। मूलत: यह एकीकरण तीन स्तरों अर्थात वास्तविक, प्रचालनात्मक तथा किराया एकीकरण स्तर पर हो सकता है। वास्तविक एकीकरण में स्टेशन पास-पास होते हैं जिससे एक प्रकार के परिवहन से दूसरे प्रकार के परिवहन तक सीधा संपर्क सुकर बनता है। इसमें अक्सर स्टेशनों पर आवागमन की सुविधा भी शामिल होती है। पश्चिमी यूरोप के शहर, विशेष रूप से सार्वजनिक और गैर-मोटरीकृत परिवहन के बीच अंतर-तंत्रीय एकीकरण को सुकर बनाने में बहुत आगे हैं। कोच्ची मेट्रो ने एक कॉमन मोबिलिटी कॉर्ड की सुविधा शुरू की है जिसे मेट्रो व बस के साथ-साथ जल परिवहन प्रणाली में भी उपयोग में लाया जा सकता है। बंगलौर मेट्रो, नागपुर मेट्रो तथा लखनऊ मेट्रो जैसी अन्य मेट्रो प्रणालियां भी इसी प्रकार के कॉमन मोबिलिटी कार्ड अपना रही है।

भूमि के उपयोग तथा परिवहन आयोजना का समेकन: एक टिकाऊ परिवहन प्रणाली का विकास यात्रा की आवश्यकता और यात्रा अवधि की लम्बाई को कम करने के प्रमुख लक्ष्य के साथ शहरी भूमि के व्यवस्थापन से शुरू होता है। भूमि के उपयोग और यातायात व्यवस्था के बीच के संबंध की उपेक्षा करने के कारण शहरों का अत्यधिक अव्यवस्थित फैलाव हो गया है, जैसा कि अनेक शहरों में देखा जा सकता है। एक समेकित आयोजना पद्धति अपनाने से सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे। इसे पारगमन अभिमुखी विकास (टीओडी) नीति के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।

पारगमन अभिमुखी विकास (टीओडी): पारगमन अभिमुखी विकास एक ऐसी अवधारणा है जिसमें उच्च क्षमता वाले सार्वजनिक परिवहन स्टेशनों के आस-पास मिश्रित और सघन विकास पर बल दिया जाता है। यदि मेट्रो अथवा बीआरटी स्टेशनों के आसपास पैदल यात्रियों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न सुविधाओं के विकास पर जोर दिया जाए तो संभवत: निवासी अपने क्षेत्र से बाहर जाने के लिए मेट्रो अथवा बस की सेवाएं लेंगे तथा घर के आसपास के क्षेत्रों में जाने के लिए पैदल चलेंगे अथवा साइकिल का उपयोग करेंगे। सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों तथा निर्मित परिवेश का समेकन सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों और शहर दोनों को सफल बनाता है। मैं यह जानकर प्रसन्न हूं कि आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय ने एक राष्ट्रीय पारगमन अभिमुखी विकास नीति तैयार की है जिसका उपयोग किसी शहर-विशेष के लिए टीओडी नीति तैयार करने के लिए किया जा सकता है। लगातार बढ़ती मेट्रो रेल और बीआरटी प्रणालियों को देखते हुए शहरों को टीओडी नीति अपनाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।

नवप्रवर्तनशील वित्तपोषण और भू-मूल्य अभिग्रहण: उच्च क्षमता वाले सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों में मांग एवं क्षमता में एक बड़े अंतर के कारण निवेश आवश्यकताएं बहुत अधिक हो सकती है। अत: वित्तपोषण के नवप्रवर्तनशील साधनों की संभावनाओं की खोज करना महत्वपूर्ण है। बंगलौर मेट्रो द्वारा बांड जारी किए जाने और भू-मूल्य अभिग्रहण के माध्यम से एक कॉरीडोर का वित्तपोषण इस बात का उदाहरण है कि एजेंसियां किसी प्रकार से वित्तपोषण के नवप्रवर्तनशील साधनों का लाभ उठाने की चेष्टा कर रही हैं। हाल ही में भारत सरकार द्वारा जारी भू-मूल्य अभिग्रहण नीति को संबंधित शहर और राज्य सरकारों की सहायता और सरलीकरण के माध्यम से विभिन्न एजेंसियों द्वारा अपनाया जा सकता है।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी: वर्तमान समय में अधिक से अधिक शहर सार्वजनिक और निजी संसाधनों तथा विशेषज्ञता का लाभ उठाने के लिए, शहरी परिवहन परियोजनाओं के विकास और कार्यान्वयन हेतु सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) का चुनाव कर रहे हैं। अनेक ऐसे शहरों, जिन्होंने मेट्रो रेल अथवा अन्य उच्च क्षमता वाली सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों की व्यवस्था करने हेतु किसी न किसी रूप से सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल को अपनाया है, में बैंकॉक, क्वालालम्पुर, मनीला, ब्यूनेस आयर्स, रियो डि जेनेरो, सिंगापुर, हांगकांग तथा लंदन शामिल हैं।

मैं तेलंगाना सरकार को हैदराबाद मेट्रो रेल परियोजना के त्वरित कार्यान्वयन के लिए बधाई देना चाहता हूं जो, संपन्न होने के बाद सार्वजनिक निजी भागीदारी पद्धति से कार्यान्वित की जाने वाली विश्व की सबसे बड़ी मेट्रो रेल परियोजना बन जाएगी।

यदि शहरी क्षेत्रों को सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक रूप से सक्षम बनाया जाना है तो शहरी भूमि के उपयोग और परिवहन योजना और निवेश हेतु एक संपूर्ण और समेकित पद्धति अपनाए जाने की आवश्यकता है।

शहरी परिवहन क्षेत्र में अधिकांश पर्यावरणीय चुनौतियां, निजी मोटर वाहनों को चलाने के लिए अनवीकरणीय जीवाश्म ईंधन पर उसकी निर्भरता में निहित है। स्वच्छ ईंधनों का उपयोग करने, प्रदूषण फैलाने वाले पुराने वाहनों का उपयोग बंद करने, जन परिवहन के सुदृढ़ीकरण और इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग के संवर्धन और कम से कम बड़े महानगरों में कार के पंजीयन से पूर्व पार्किंग स्थलों की उपलब्धता सुनिश्चित करने जैसे उपाय अपनाए जाने की आवश्यकता है।

बेहतर शहरी आयोजना और दीर्घकालिक परिवहन योजनाओं के साथ सार्वजनिक परिवहन की कार्य पद्धति में बदलाव, पर्यावरण को क्षति न पहुंचाते हुए शहरों के विकास को सुकर बनाने के लिए आवश्यक है। परिवहन के विकास को टिकाऊ बनाने के लिए तकनीकी, वित्तीय और नीतिगत उपाय किए जाने की आवश्यकता है। शहरी यातायात व्यवस्था शहरों के स्थानिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय संरचना में ही संनिहित है।

मैं पुन: दोहराता हूं कि शहरी परिवहन, शहरी अवसंरचना के महत्वपूर्ण घटकों में से एक है जिस पर तत्काल कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है। परिवहन का भविष्य सम्पोषणीय चुस्त यातायात व्यवस्था और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों में निहित है। हमारे शहरों को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाने के मिशन में योजना बनाने वालों, शहरी प्राधिकरणों और समाज को संयुक्त रूप से जुड़ना होगा।

शहरी यातायात व्यवस्था संबंधी भारत सम्मेलन, शहरी परिवहन के विभिन्न तात्कालिक मुद्दों को समझने, अंतरराष्ट्रीय और घरेलू विशेषज्ञों के अनुभवों से लाभ लेने, विश्व भर में प्रचलित सर्वोत्तम पद्धतियों के बारे में जानने और विभिन्न संगठनों के समकक्ष समूहों के साथ बातचीत हेतु हितबद्ध पक्षकारों की भागीदारी हेतु एक मंच उपलब्ध कराता है।

मैं शहरी क्षेत्रों में बेहतर जीवन के लिए बेहतर यातायात प्रणालियों का सृजन करने के आपके प्रयासों के लिए आप सब को शुभकामनाएं देता हूं।

धन्यवाद! जय हिन्द।"