03 नवंबर, 2017 को नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन-2017 का उद्घाटन के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया अभिभाषण

नई दिल्ली | नवम्बर 3, 2017

"इस महती सभा का हिस्सा बनकर मुझे काफी प्रसन्न्ता हो रही है। मैं इस अवसर पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (भारत का अग्रणी पर्यावरण न्याय संबंधी न्यायालय), संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी), एशियाई विकास बैंक, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन तथा जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय को विगत में अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तरों पर ऐसे कार्यक्रमों और पर्यावरण संबंधी विश्व सम्मेलन, नवंबर, 2017 के वर्तमान कार्यक्रम को सफलतापूर्वक आयोजित करने में उनके द्वारा किए गए प्रयासों की प्रशंसा करता हूं।

ऐसे कार्यक्रम विश्व स्तरीय पर्यावरण संबंधी व्यापक मामलों पर चर्चा करने का मंच प्रदान करते हैं। यह इस वर्ष उक्त विषय पर आयोजित होने वाला दूसरा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन और राष्ट्रीय हरित अधिकरण के तत्वाधान में आयोजित हो रहा चौथा पर्यावरण संबंधी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन है।

भाईयो और बहनो, हमने अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण जागरूकता, विधिशास्त्र और कानूनों पर दशकों तक विवेचना की है। अब हम वैश्विक तापवृद्धि को नकारने के बजाय उसे स्वीकार करने लगे हैं। हमने जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करने के लिए जलवायु परिवर्तन संबंधी अपने गैर-स्वैच्छिक और गैर अनिवार्य रवैये को त्यागकर उसके प्रति स्वैच्छिक प्रतिबद्धता व्यक्त करना शुरू कर दिया है। अनेक देश पर्यावरण के संरक्षण हेतु अति सक्रिय उपाय कर रहे हैं।

हम सभी भले ही थोड़ा धीरे, थोड़ा कष्ट के साथ, परंतु यह अनुभव कर रहे हैं कि हम अपने पर्यावरण को निर्बाध रूप से नुकसान पहुचाते रहे हैं। सभी देशों को धीरे-धीरे इस बात का बोध हो रहा है कि हमारा अस्तित्व दांव पर है और विनाश को टालने के लिए हमें तेजी से कार्रवाई करनी होगी।

इस अवसर पर मुझे महात्मा गांधी के शब्द याद आ रहे हैं। उन्होंने कहा: "पृथ्वी, वायु, भूमि और जल हमें हमारे पूर्वजों से विरासत के रूप में नहीं मिले हैं, वरन ये हमारे बच्चों से प्राप्त ऋण हैं। अत: हमें उन्हें कम से कम कम उसी रूप में सौंपना होगा जिस रूप में हमें सौंपे गए हैं ।"

वर्तमान में पर्यावरण संबंधी एजेंडा को आगे बढ़ाने और वैश्विक ताप वृद्धि को 1.50 सी. तक सीमित करने के प्रयासों के साथ-साथ 20 सी. से नीचे रखने के उद्देश्य से अत्यधिक सावधानी से तैयार किए गए सतत विकास के मार्ग पर बढ़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामूहिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है। आर्थिक विकास को पर्यावरण से पृथक नहीं समझा जाना चाहिए। राष्ट्रों को एक साथ मिलकर सतत आर्थिक विकास के लिए कार्य करना चाहिए।

विश्व के अनेक देश हमारे ग्रह को 'धरती माता' करते हैं। अनेक धर्मों ने प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण तरीके से जीने संबंधी विचारों की समृद्ध विरासत हमें प्रदान की है। भारत भी ऐसी ऋचाओं और प्रथाओं से सम्पन्न है, जो प्रकृति के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करते हुए उत्सव मनाने, प्रकृति की पूजा और उनका संरक्षण करने की बात करते हैं। उदाहरण के लिए लगभग 20 सदी पहले अथर्वेद में लिखी 'भू-सूक्तम' प्रकृति के प्रति श्रद्धा दर्शाते हुए उत्सव मनाने और इसे सुरक्षित एवं संरक्षित किए जाने की बात करती है।

"हे धरती माता, आपकी पहाड़ियाँ और हिमाच्छादित पर्वत अपनी शीतलता विखेरते रहें, आपके वन उत्साह का संचार करते रहें। आपकी अजेय, अडिग और स्थायी दृढ़ आधार ही मुझे दृढ़ता प्रदान करते हैं।"

पेड़ो के विनाश पर असहमति प्रकट की जाती है। जैसा कि पैगम्बर मोहम्मद ने कहा है, "जो व्यक्ति 'लोट' के पेड़ को काटता है, अल्लाह उसे नरक की अग्नि में भेजेगा।" हिंदू परंपरा में सभी पेड़ पवित्र माने जाते है, सभी सजीव प्राणियों और निर्जीव पदार्थों को महत्व दिया जाता है और उन्हें संरक्षित किया जाता है। संतों ने कहा है, "इशक्स्यम इवम" (संपूर्ण् ब्रहांड दिव्य और पवित्र है।)

हमारी सामूहिक विरासत के स्रोतों को पुनर्जीवित किए जाने की आवश्यकता है। हमें केवल अपने अतीत की अच्छी विचारधाराओं को स्मरण करने की ही आवश्यकता नहीं है, वरन् उन आदर्श विचारधाराओं के आधार पर हमें अपने वर्तमान की भी आकार देने की आवश्यकता है। अन्यथा हमारा भविष्य अंधकारमय और बदरंग हो सकता है।

विनाशकारी भविष्य के लक्षण वस्तुत: यहां पहले से ही मौजूद है, जिनको हम अनुभव कर सकते हैं। हमारे यहां कई नगरों में स्वच्छ वायु और स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। हमारे जीवन की गुणवत्ता में निरंतर गिरावट आ रही है।

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) महत्वपूर्ण है किन्तु मानव जीवन को बेहतर बनाया और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। विकास के हमारे सभी प्रयासों की अन्तिम कसौटी गुणवत्तापूर्ण जीवन है। विकास का कोई अर्थ नहीं रह जाता यदि इससे स्वास्थ्य, खुशहाली और सौहार्द्र नहीं बढ़ता है। यदि हम पर्यावरण पर ध्यान देते हैं तो भविष्य में मानवजाति के लिए कोई तनाव नहीं रहेगा।

लगभग चार दशकों तक भारत सरकार में सेवा करने के बाद, प्राय: मेरा इस प्रश्न से सामना होता है- पर्यावरण संरक्षण अथवा विकास में से किसे प्राथमिकता दी जाए। मैं विश्वासपूर्वक यह कह सकता हूं कि इन दोनों के बीच नैसर्गिक रूप से कोई विरोधाभास नहीं है; सिर्फ अत्यधिक दोहन पर अंकुश लगाये जाने की आवश्यता है। जैसा कि गांधी जी ने कहा था कि प्रकृति के पास हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है किन्तु हमारे लालच के लिए नहीं। चुनौती बहुत बड़ी है। तथापि, यदि हमारे पास राजनैतिक इच्छाशक्ति, विधि सम्मत ढांचा और योग्य न्यायपालिका हो तो हम सकारात्मक परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।

हमारी राजनीति का प्रत्येक अंग एक सुनिश्चित भूमिका निभाता है। विधानपालिका जनता के सरोकारों को ध्यान में रखकर कानून बनाती है, कार्यपालिका कारगर तरीके से उन्हें लागू करती है और जनता तक पहुंचाती है। न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि कानूनों की व्याख्या और कार्यान्वयन दोनों अक्षरश: हों।

मुझे आशा है कि इसमें से प्रत्येक व्यक्ति इन उत्तरदायित्वों के प्रत्येक कार्यक्षेत्र में, साझा उद्देश्य के साथ सामंजस्य स्थापित करके कार्य करता है किन्तु वह संविधान द्वारा निरूपित सुस्पष्ट सुपरिभाषित मापदण्डों के तहत ही होता है।

पर्यावरणीय बदलाव जितना हम सोचते थे उससे कहीं अधिक तेजी से हो रहे हैं। जनसंख्या वृद्धि, द्रुत शहरीकरण, उपभोग के स्तरों में वृद्धि, मरूस्थलीकरण, भू-क्षरण और जलवायु परिवर्तन जैसे खतरे आपस में मिश्रित होकर अनेक देशों के समक्ष पानी का घोर संकट पेश कर रहे हैं। इतनी ज्यादा व्यथित करने वाली प्रवृतियां पूरे विश्व के सामने स्वयं को पोषित करना भी मुश्किल बनाती जा रही हैं।

एशिया प्रशांत क्षेत्र के नाम पर, तीव्र और बहुत अपेक्षित आर्थिक विकास ने प्राकृतिक संसाधनों और परितंत्रों पर बहुत गहरा प्रभाव डाला है। हवा की प्रदूषित स्थिति, पानी की अत्यधिक कमी और बड़े पैमाने पर अपशिष्ट पदार्थों का उत्पन्न होना मानवीय एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य के लिए खतरा बन रहे हैं।

विगत दो दशकों में दर्ज की गई सभी प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं के 41 प्रतिशत के साथ यह क्षेत्र विश्व के सबसे अधिक आपदा प्रवर क्षेत्रों में शामिल है जो पिछली शताब्दी में प्राकृतिक आपदाओं से विश्व में होने वाली मौतो के लिए जिम्मेवार है।

दक्षिणपूर्व एशिया में, वार्षिक रूप से वनों की कटाई का औसत क्षेत्रफल एक मिलियन हेक्टेयर से अधिक है जिसके परिणामस्वरूप 2005 और 2015 के बीच प्रत्येक वर्ष सैंकड़ों मिलियन टन कार्बन-डाई-आक्साइट उत्पन्न हुई।

भेषज और व्यक्तिगत देखभाल के उत्पादों सहित इंसानों एवं औद्योगिक अपशिष्टों द्वारा इस क्षेत्र में जल संदूषण एक बड़ी समस्या है।

यह प्राक्कलन है कि लगभग 30 प्रतिशत आबादी संदूषित पेयजल का सेवन करती है। जल-जनित रोग और अस्वच्छ जल इस क्षेत्र में वार्षिक रूप से 1.8 मिलियन मौतों का कारण बनते हैं। असुरक्षित सफ़ाई व्यवस्था, अशोधित अपशिष्ट जल का निपटान और कृषि रसायनों का अपवाह जलजनित रोगों, विशेषकर एशिया के घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में, के बढ़ने के लिए जिम्मेवार है।

अनियंत्रित क्षेपण, जो कि इस क्षेत्र में अभी भी अपशिष्ट निपटान का प्रमुख तरीका है, भी बीमारियों का प्रमुख कारण है। उदाहरण के लिए, मुम्बई में नगरपालिका के कुल ठोस अपशिष्ट का लगभग 12% या तो सड़कों पर खुले में या लैण्डफिल स्थलों पर जलाया जाता है।

तीव्र आर्थिक वृद्धि और अंधाधुंध औद्योगिकीकरण ने भी अस्वस्थ, प्रदूषणकारी और कार्बन से ओत-प्रोत जीवनशैली को बढाया है।

वैश्विक तापवृद्धि बढ़ते तापमान की वजह से ही केवल मात्र चिंता का विषय नहीं है। यह लोगों को बदली हुई भौगोलिक स्थितियों और जलवायु संबंधी परिस्थितियों की वजह से आजीविका, भोजन और आश्रय की तलाश में विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, अस्वस्थ पर्यावरण की वजह से लगभग 12.6 मिलियन मौत अर्थात् वैश्विक रूप से दर्ज होने वाली प्रत्येक 4 मौतों में से एक, होती हैं। इसमें से 8.2 मिलियन मौतें कैंसर, हृदयाघात, हृदय संबंधी समस्याओं, दीर्घकालिक श्वसन रोगों आदि जैसे असंचारी रोगों के कारण हुई हैं। क्षेत्रीय रूप से, दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र के निम्न और मध्यम आय वाले देश सबसे अधिक प्रभावित हैं।

प्रबुद्ध वक्ताओ और श्रोताओ, मैं यह चाहूंगा कि हम सब कतिपय प्रमुख मुद्दों पर मनन करें तथा हमारी मौजूदा परिस्थितियों के समाधान तलाशें।

1. क्या विकास को मापने का एक बेहतर तरीका औपचारिक रूप से अपनाने का समय विश्व के लिए आ गया है जो कि और ज्यादा सर्वांगीण हो तथा आर्थिक वृद्धि की ही नहीं अपितु प्रगति एवं जीवन की गुणवत्ता की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करें?

2. क्या हम देशों की सीमाओं से परे जा सकते हैं और उन मामलों में जो सम्पूर्ण मानवता के लिए अत्यन्त सरोकार के हैं, उनमें वैश्विक नागरिकशास्त्र और वैश्विक सरकार के शासन को अपना सकते हैं?

3. क्या हम परि-केन्द्रित उपागम की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं जहां मानवजाति केवल मात्र प्रबंधक न हो अपितु पृथ्वी की संरक्षक भी हो?

4. क्या हम आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने की नवोन्मेषी पद्धतियों की खोज और अविष्कार कर सकते हैं और पर्यावरण पर बिना कोई प्रतिकूल प्रभाव डाले सर्वांगीण समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं?

हमें किसी आपदा के होने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। हमें ज्ञान और विवेक को ठोस कार्रवाई के साथ जोड़ना होगा। हमें अपनी भूमिकाओं को परिभाषित करना होगा और अपनी प्राकृतिक संपदा का चौकस संरक्षक बनना होगा।

हमें जागरूकता को बढ़ाना होगा और सक्रिय हो कर अपनी आबादी के सभी वर्गों को इसमें शामिल करना हेागा। इस सम्मेलन की कार्यवलि पूर्णत: समयोचित है। मैं आपके लाभदायक विचार-विमर्शों का स्वागत करुंगा और आपकी कार्यान्वयन योग्य सिफारिशों की व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा हूं।

मैं आपको सफल सम्मेलन के लिए बधाई देता हूं।

जय हिन्द।"