03 दिसंबर, 2019 को नई दिल्ली में दिव्यांग व्यक्तियों के सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | दिसम्बर 3, 2019

“प्रिय बहनों और भाइयों,

अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस के अवसर पर राष्ट्री य दिव्यांंगजन सशक्तिकरण पुरस्का

इस 'दिवस' का नाम अंतर्राष्ट्रीय विशेष योग्य जन दिवस होना चाहिए।

हमारे यहां विशेष योग्यताओं से लैस कई उल्लेखनीय दिव्यांग पुरुष और महिलाएं हैं, जिन्होंने अनेक क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। यदि उनको उचित वातावरण और अवसर दिया जाए तो वे राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

आज, हम इनमें से कुछ महान व्यक्तियों को उनकी उपलब्धियों के लिए सम्मानित कर रहे हैं।

मैं उन सभी पुरस्कार विजेताओं को बधाई देता हूं जिन्होंने असाधारण धैर्य और दृढ़ संकल्प दिखाया है।

मैं उनकी दृढ़ता और साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा करता हूं।

वे निश्चित रूप से कई अन्य लोगों के लिए अनुकरणीय व्यक्ति हैं।

बहनों और भाइयों,

भारत में विश्व स्तर पर दिव्यांगजनों की संख्या सबसे अधिक है।

भारत की जनगणना 2011 के अनुसार, हमारे देश में दिव्यांगजनों की संख्या 2.68 करोड़ है, जो हमारी जनसंख्या का 2.21% है।

मुझे डर है कि यह आँकड़ा इस से भी अधिक हो सकता है, क्योंकि मानसिक समस्याओं से ग्रसित लोग अक्सर इन बीमारियों से जुड़े सामाजिक कलंक के कारण इन्हें छिपाते हैं।

बहनों और भाइयों,

जाहिर है कि दिव्यांगजनों को अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थितियों के संदर्भ में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

चूंकि हम एक समावेशी समाज - एक ऐसा समाज जो अपने सबसे कमजोर वर्गों की जरूरतों के लिए सम्मान पाने और संवेदनशील हो, बनने के लिए प्रतिबद्ध हैं, इसलिए यह बड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

हमें दिव्यांगता के विभिन्न आयामों का व्यापक रूप से अध्ययन और विश्लेषण करने की आवश्यकता है।

हमें दिव्यांगता के कारणों की पहचान करने और उनसे निपटने के तरीके खोजने की आवश्यकता है ताकि प्रत्येक व्यक्ति को गरिमामय जीवन जीने का अधिकार मिले।

गर्भवती माताओं और छोटे बच्चों को उचित पोषण और देखभाल प्रदान करने और ग्रामीण भारत में बेहतर और सुलभ चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की तत्काल आवश्यकता है।

दिव्यांगता की शीघ्र पहचान भी महत्वपूर्ण है। इस से हम पुनर्वास उपायों और प्रभावित व्यक्तियों के सशक्तिकरण के लिए शुरुआत से ही प्रभावी उपाय करने में सक्षम होंगे।

कम से कम जिला स्तर पर उचित पुनर्वास मॉडल के साथ टीकाकरण और रोग निरोधक कार्यक्रमों के सामंजस्य की आवश्यकता है।

पोलियो का उन्मूलन इस तरह के समन्वित प्रयासों का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

दुर्घटनाओं से होने वाली विकलांगता को कम करने के लिए, हमें सड़क और कार्यस्थल पर सुरक्षा में सुधार करने की आवश्यकता है।

एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 1990 की तुलना में 2016 में सड़क दुर्घटनाओं की वजह से 65% अधिक लोग विकलांग हुए ।

मुझे डर है, अगर मौजूदा रुझान जारी रहता है, तो सड़क दुर्घटनाएं देश में मृत्यु और विकलांगता का प्रमुख कारण बन सकती हैं।

इसलिए, हमें सड़क सुरक्षा में सुधार करने और सुरक्षित ड्राइविंग के बारे में जागरूकता फैलाने की दिशा में गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। मोटर यान अधिनियम में हालिया संशोधन सही दिशा में उठाया गया एक कदम है।

दिव्यांगों के समक्ष एक बड़ी चुनौती उनके प्रति समाज का रवैया है। लोग अक्सर विकलांग व्यक्ति को 'सहानुभूति' और 'दया' के पात्र के रूप में देखते हैं। इससे उनके आत्मसम्मान में कमी आती है।

दिव्यांगगजन 'सहानुभूति' और 'दया' के पात्र नहीं हैं अपितु उन्हें 'समवेदना' और 'संबल' दिए जाने की आवश्यकता है।

यह वही सम्मान की भावना है, जो प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए नए नाम को रेखांकित करती है, जब उन्होंने 'विकलांग' शब्द की जगह 'दिव्यांग' नाम दिया।

प्रिय बहनों और भाइयों,

मैंने हाल ही में संसद भवन में एक कार्यक्रम में शिरकत की, जिसमें अल्पसुविधाप्राप्ति वर्गों के बच्चों ने सांकेतिक भाषा में राष्ट्रगान गाया। यह दिल को छूने वाला अनुभव था।

मेरा सुझाव है कि सभी स्कूल इसे अपनाने पर विचार करें। यह बच्चों में उनके शुरूआती जीवन में विकलांगता के प्रति संवेदनशीलता को विकसित करने का एक अच्छा तरीका होगा।

इसके अलावा, दिव्यांगता के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण को बदलने के लिए, हमें उन लोगों के बारे में अधिक जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है जिन्होंने संगीत, गणित, विज्ञान, खेल और पर्वतारोहण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में महान ऊंचाइयों को छुआ है।

मुझे खुशी है कि मुख्य धारा के भारतीय सिनेमा ने दिव्यांगता पर 'तारे ज़मीन पर', 'ब्लैक' और 'पा' जैसी कई प्रशंसनीय फिल्में बनाई हैं।

यह एक अच्छा चलन है और इसे और प्रोत्साहित करने की जरूरत है। इससे दिव्यांगता के बारे में लोगों की धारणा को बदलने में काफी मदद मिलेगी।

प्रिय बहनों और भाइयों,

मुझे खुशी है कि सरकार ने दिव्यांगों के सामने आने वाली चुनौतियों को व्यवस्थित रूप से दूर करने के लिए कई पहल की हैं।

सरकार ने 2016 में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम में संशोधन किया। इसने हमारे दिव्यांग भाइयों और बहनों के कल्याण के लिए एक बहुत ही प्रगतिशील 'अधिकार-आधारित' ढांचा तैयार किया है।

सरकारी नौकरियों में दिव्यांगों के लिए आरक्षण का कोटा 3% से बढ़ा कर 4% और उच्च शिक्षा संस्थानों में 3% से बढ़ा कर 5% कर दिया गया है।

शिक्षा दिव्यांगों सहित हर व्यक्ति के सशक्तिकरण की कुंजी है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि समावेशी स्कूलों और विशेष स्कूलों पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए ताकि प्रत्येक दिव्यांग बच्चे को अच्छी गुणवत्तायुक्त शिक्षा मिले।

कई गैर-सरकारी संगठन दिव्यांगों के पुनर्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। मुझे खुशी है कि सरकार नागरिक समाज संगठनों के साथ साझेदारी कर रही है।

अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

2015 में सुगम्य भारत अभियान की शुरुआत के बाद से सरकार के लिए दिव्यांगों के लिए सुलभ वातावरण बनाना प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में से एक रहा है। सुगम्य बनाये जाने वाले मौजूदा बुनियादी ढाँचे के आकार को देखते हुए मेरा यह मानना है कि दिव्यांगों के लिए बाधा मुक्त वातावरण चाहे वो भौतिक बुनियादी ढांचे या परिवहन या आईसीटी पारिस्थितिकी तंत्र में हो, तैयार करने हेतु सभी हितधारकों के बीच सहयोगात्मक प्रयासों की आवश्यकता है।

मैं कॉर्पोरेट और निजी संस्थाओं से आग्रह करता हूं कि वे अपने बुनियादी ढांचे को दिव्यांगों के लिए सुगम्य बनाने के लिए हर संभव कदम उठाएं।

दिव्यांगों की गतिशीलता बढ़ाने के लिए सरकार समान रूप से प्रतिबद्ध है। हाल के दिनों में, सरकार ने दिव्यांगों के लिए सहायक और मददगार उपकरणों के वितरण पर अधिक जोर दिया है। मुझे यह जानकर खुशी है कि इस कार्यक्रम ने काफी हद तक ध्यान आकर्षित किया है और पूरे देश में सकारात्मक जागरूकता पैदा की है।

इसके अलावा, देश में श्रवण दोष से पीड़ित व्यक्तियों लिए एक सांझी भाषा और सम्प्रेषण विकसित करने के लिए, सरकार ने भारतीय सांकेतिक भाषा अनुसंधान और प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की है। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि संस्थान पहले ही 6000 से अधिक शब्दों का एक सांकेतिक भाषा शब्दकोश बना चुका है और एक मानकीकृत भारतीय सांकेतिक भाषा को विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है।

सरकार देश के सभी दिव्यांगों के लिए एक राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने के लिए एक विशिष्ट पहचान परियोजना को भी लागू करने की कार्रवाई भी कर रही है ताकि प्रत्येक पात्र व्यक्ति को सरकारी योजनाओं के लाभ मिल सकें।

मुझे बताया गया है कि हाल ही में सरकार ने दिव्यांग खेल केंद्र स्थापित करने की पहल की है। दिव्यांगों के बीच खेल को बढ़ावा देना एक स्वागत योग्य कदम है और इससे निश्चित रूप से दिव्यांगों के बीच समावेश और आत्मविश्वास की भावना पैदा होगी। मुझे उम्मीद है कि ये केंद्र आने वाले वर्षों में देश के सभी क्षेत्रों से दिव्यांगों के लिए खेल के क्षेत्र में अग्रणी संस्थानों के रूप में उभरेंगे। हमारे खिलाड़ियों ने लगातार पैरालंपिक में देश को गौरवान्वित किया है।

हमें दिव्यांगों को सामाजिक और सांस्कृतिक क्रियाकलापों में शामिल करने की आवश्यकता है जहां उन्हें अपनी क्षमताओं के अनुसार भाग लेने की स्वतंत्रता हो। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि दिव्यांगजनों के कलात्मक कौशल को पहचानने और बढ़ावा देने के लिए इस साल अप्रैल में राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में और जुलाई में बालयोगी सभागार, संसदीय ग्रंथागार में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

मैं यह भी कहना चाहूंगा कि रोजगार दिव्यांग व्यक्तियों के आर्थिक सशक्तिकरण की कुंजी है। मुझे खुशी है कि सरकार दिव्यांग व्यक्तियों के कौशल विकास के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना कार्यान्वित कर रही है, जिससे उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सके। सरकारी प्रतिष्ठानों में भी उनके लिए रिक्तियां आरक्षित की गई हैं।

मुझे यह बताया गया है कि सरकार ने मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास संस्थान की स्थापना को अनुमोदित किया है। यह संस्थान मानसिक बीमारी से ग्रस्त व्यक्तियों के पुनर्वास के लिए इस महाद्वीप में अपनी तरह का पहला केंद्र होगा और मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास के क्षेत्र में क्षमता निर्माण को भी बढ़ावा देगा। मुझे उम्मीद है कि इस संस्थान को मानसिक बीमारी से ग्रस्त व्यक्तियों के पुनर्वास के लिए एक विश्व स्तरीय संस्थान के रूप में विकसित किया जाएगा।

प्रिय बहनों और भाइयों,

अपनी बात समाप्त करने से पहले, मैं स्वामी विवेकानंद के शब्दों को उद्धृत करना चाहूंगा जिन्होंने कहा था।

"हर आत्मा दिव्य है, आप सभी के भीतर सभी इच्छाओं और सभी दुखों को दूर करने की शक्ति है। इस पर विश्वास करो, और वह शक्ति प्रकट होगी"।

एक समाज के रूप में हमें प्रत्येक नागरिक हेतु एक परिपूर्ण जीवन जीने के लिए उपयुक्त परिस्थितियों का निर्माण करना चाहिए। जन्मजात शक्ति को प्रकट होने देना चाहिए।

यह विचार आप पर छोड़ते हुए, मैं एक बार फिर से सभी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेताओं को बधाई देता हूं और उन्हें सफल जीवन के लिए शुभकामनाएं देता हूं। मुझे विश्वास है कि वे देश में दिव्यांगजनों के बेहतर जीवन और भविष्य के लिए नेतृत्व करते रहेंगे और उन्हें प्रेरित करते रहेंगे।

धन्यवाद,

जय हिन्द!"