03 अप्रैल, 2021 को भुवनेश्वर, ओडिशा में उत्कल विश्वविद्यालय के 50वें दीक्षांत समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

भुवनेश्वर | अप्रैल 3, 2021

“मंदिरों के इस सुन्दर शहर में उत्कल विश्वविद्यालय के 50वें दीक्षांत समारोह के अवसर पर यहां उपस्थित होकर मुझे अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि उत्कल विश्वविद्यालय ओडिशा राज्य का मातृ विश्वविद्यालय और अविभाजित भारत का 17वां विश्वविद्यालय है। अपने 27 स्नातकोत्तर विभागों, 8 उत्कृष्टता के केन्द्रों और एक अंतर्राष्ट्रीय प्रकोष्ठ के साथ यह विश्वविद्यालय वास्तव में ओडिशा में शिक्षा का केन्द्र है। मैं वर्ष 2016 में भारत में राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद् (एनएएसी) द्वारा उत्कल विश्वविद्यालय को ए+ ग्रेड प्रदान किए जाने पर विश्वविद्यालय को बधाई देता हूँ। इस विश्वविद्यालय को यह दर्जा प्रदान किया जाना अपने आप में इसके उच्च शैक्षिक मानकों और उत्कृष्टता के कड़े अनुपालन का प्रमाण है। 
प्रिय छात्रों,
यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि दीक्षांत समारोह हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण दिन होता है - फिर भी, यह महत्वपूर्ण दिन एक यात्रा की शुरुआत होता है।
इस मुकाम तक पहुंचना अपने आप में एक उपलब्धि है जिसके लिए मैं आपको बधाई देता हूँ। जो भी वैयक्तिक गुण आपने यहां ग्रहण किए हैं जैसे जोश, अध्यवसाय, दृढ़ता खुले मन से सीखने की प्रवृत्ति, वे आपके लिए जीवन भर उपयोगी रहेंगे। ये गुण जीवन भर आपका मार्गदर्शन करेंगे।
आप में से कई लोग एक विश्वविद्यालय की चारदीवारी से बाहर कदम रखेंगे और वास्तविक दुनिया में प्रवेश करेंगे जो चुनौतियों और समस्याओं से भरी हुई है।
संक्रमण की यह प्रक्रिया आसान नहीं होगी, लेकिन मुझे विश्वास है कि इस विश्वविद्यालय से प्राप्त मूल्यों और प्रशिक्षण से आप आत्मविश्वास के साथ विश्व का सामना करने में सक्षम होंगे। नई शिक्षा नीति का मुख्य जोर हमारे छात्रों में "विश्व का आत्म-विश्वास के साथ सामना करने" की क्षमता विकसित करने पर है। शिक्षा का उद्देश्य महज ज्ञान संबंधी विकास नहीं है बल्कि चरित्र निर्माण और समग्र एवं सर्वांगीण व्यक्ति तैयार करने हैं जो 21वीं सदी के लिए अपेक्षित बुनियादी कौशल से लैस हों।
प्रिय मित्रों,
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में अंतराष्ट्रीय शिक्षा की शानदार परम्परा रही है। तक्षशिला, नालंदा, वल्लभी और विक्रमशिला जैसी प्राचीन भारतीय विश्वविद्यालयों में भारत और विश्व के अन्य भागों से हजारों छात्र महत्वपूर्ण बहुविषयक परिवेशों में अध्ययन करते थे।
हमें ऐसे समग्र और नवोन्मेषी व्यक्तियों को तैयार करने के लिए इस महान भारतीय परम्परा को वापस लाना होगा जिनमें देश में सामाजिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से बदलाव लाने की विशेष क्षमता होगी।
ओडिशा का समृद्ध और प्रेरणादायक इतिहास रहा है। कलिंग की इस महान भूमि ने सम्राट अशोक को शांति का पाठ पढ़ाया जिन्होंने धर्म (धर्म विजय) के माध्यम से विजय की नीति का अनुसरण करना आरंभ कर दिया। ओडिशा के राजाओं ने दक्षिण पूर्व एशिया के साथ अंतर-सांस्कृतिक संबंध स्थापित करने तथा हिन्दू और बौद्ध धर्मों के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। कलिंग साम्राज्य अपनी शानदार समुद्रीय परम्पराओं के लिए भी जाना जाता था। समुद्र पर उनका इतना अधिक प्रभुत्व था कि कालिदास ने अपनी प्रसिद्ध कृत्ति 'रघुवंश' में कलिंग के राजा को 'समुद्रों का भगवान' कहा है। कलिंग के साहसिक समुद्री यात्रा व्यापारियों ने श्रीलंका, जावा, बोर्नियो, सुमात्रा और बर्मा के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किए। खुदाई में मिली रोमन वस्तुओं सहित बड़ी संख्या में सिक्के और शिल्पकृतियां प्राचीन ओडिशा में एक समृद्ध व्यापारिक समाज होने की ओर इशारा करते हैं।
आज भी, यहां के लोग अपने समुद्री पूर्वजों की स्मृति में 'बाली यात्रा' का पर्व मनाते हैं जिनके कौशल और उद्यमशीलता ने कलिंग को अपने समय का एक समृद्ध साम्राज्य बनाया।
प्रिय छात्रों,
मैं उनकी कहानियों से प्रेरणा लेना चाहता हूँ और उद्यमशीलता और नवाचार की भावना का आत्मसात करना चाहता हूँ। हमारे विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थाओं की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्हें छात्रों को अपेक्षित कौशल से लैस करना चाहिए ताकि वे रोजगार तलाशने वाले की बजाय रोजगार सृजन करने वाले बन सकें।
मैं आपको ओडिशा के भौमकारा राजवंश का भी स्मरण कराना चाहता हूँ जिसमें 9वीं - 10वीं सदी में महिला शासकों की लम्बी परम्परा रही है। भौमकारा की रानियों ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती दी और लगभग 200 वर्ष तक सफलतापूर्वक शासन किया। ये ऐसे शानदार उदाहरण है जिन पर प्रत्येक भारतीय को गर्व होना चाहिए। मैं युवा पीढ़ी से आग्रह करता हूँ कि वह ऐसी कहानियों के बारे में पढ़े और लिंग-भेदभाव के विरुद्ध लड़ने का प्रण लें। वास्तव में हमारे युवाओं को जातिवाद, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार और हिंसा जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।  
ओडिशा इस दृष्टि से भी एक विशेष राज्य है क्योंकि इसमें आदिवासी लोगों की एक बड़ी आबादी है। राज्य में 62 भिन्न-भिन्न जनजातीय समुदाय रहते हैं जो राज्य की कुल आबादी का 23 प्रतिशत और देश की कुल जनजातीय आबादी का 9.17 प्रतिशत हैं। इसलिए इन जनजातीय समुदायों का विकास और कल्याण हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
यहां मैं इस बात पर बल देना चाहूंगा कि हमें आदिवासियों के साथ सम्मान और संवेदनशीलता के साथ पेश आना चाहिए। श्रेष्ठता का भाव रखना गलत है। सच यह है कि हम जनजातीय समुदायों से बहुत कुछ सीख सकते हैं जो प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करके सादा जीवन व्यतीत करते हैं।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (एससी एसटीआरटीआई) द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि ओडिशा में जनजातीय आबादी मुख्य रूप से कोविड-19 विश्वव्यापी महामारी के प्रभाव से अछूती रही है। इस संक्रमण से बचाने का श्रेय आदिवासियों की अनूठी प्रथाओं और परंपराओं को दिया गया है। उक्त अध्ययन में इस बात पर गौर किया गया है कि आदिवासियों को समूह में चलने के बजाए अधिकांशत: कतारों में चलने की आदत होती है और चलते समय वे एक-दूसरे से पर्याप्त दूरी बनाकर रखते हैं। ऐसी सुरक्षित दूरी और जनजातीय संस्कृति में रचे-बसे स्वास्थ्य संबंधी मानकों के साथ-साथ प्राकृतिक भोजन से विश्वव्यापी महामारी के दौरान उन्हें स्वयं को सुरक्षित रखने में सहायता मिली है।
मेरा सुझाव है कि विश्वविद्यालयों को जनजातीय समुदायों के इन सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए और उन्हें अपने पाठ्यक्रमों में शामिल करना चाहिए। मैं यह भी चाहता हूँ कि उत्कल विश्वविद्यालय जैसी संस्थाएं जनजातीय लोगों द्वारा सामना की जाने वाली समस्याओं पर शोध करें और उनके विकास और कल्याण के लिए नीति-निर्माण में सक्रिय रूप से योगदान दें।
एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा जिसे मैं ओडिशा जेसे राज्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानता हूँ, वह आपदा प्रबंधन है। आपने राज्य में नियमित रूप से चक्रवात, बाढ़ और सूखे का सामना किया है। इसलिए, आपदा प्रबंधन को शुरुआती दिनों से ही हमारी शिक्षा का एक अभिन्न घटक बनाना अत्यावश्यक है। इससे हम भविष्य में ऐसी किसी आपदा का सामना करने के लिए बेहतर रूप से तैयार होंगे। मैं आशा करता हूँ कि उत्कल विश्वविद्यालय इस संबंध में अगुवाई करेगा।
प्रिय छात्रों,
आप शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, प्रबंधकों, सिविल सेवकों, वकीलों और नेताओं की हमारी अगली पीढ़ी हैं।
आपको याद रखना चाहिए कि आपका भविष्य इस देश के भविष्य के साथ जुड़ा हुआ है और यह महज शब्दाडम्बर नहीं है। आपको यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि अनुशासन, ईमानदारी और परिश्रम सार्वजनिक जीवन सहित किसी भी क्षेत्र में सफलता की कुंजी हैं। आपको लाभवंचित लोगों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील बनना होगा।
हमारे पास बहुत बड़ी आर्थिक क्षमता है जिससे सभी क्षेत्रों में मानव विकास सूचकांक में सुधार आ सकता है। हम भुखमरी, बीमारी, अज्ञानता और प्रत्येक उस बुराई से लड़ सकते हैं जो हमारे विकास की गति को धीमा करती है।
और परिवर्तन के लिए युवाओं की भूमिका अति महत्वपूर्ण है। सामाजिक जागरूकता और संवेदनशीलता से ही वह परिवर्तन आ सकता है जिसका हम सपना लेते हैं।
आपके भावी जीवन के लिए मेरी शुभकामनाएं।
मेरा आपसे आग्रह है कि आप चुनौतियों का सामना करें और परिवर्तन लाने में अग्रणी भूमिका निभाएं।
अपने लक्ष्य को प्राप्त करें और नए विश्व के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएं।
भविष्य निर्माता बनें।
आप इस काम को कर सकते हैं और मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
इस अवसर पर, मैं इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय द्वारा मानार्थ डिग्री प्रदान किए जाने के लिए श्री शक्तिकांत दास, गर्वनर, भारतीय रिजर्व बैंक, श्री गिरीश चन्द्र मुर्मू, भारत के नियंत्रण एवं महालेखापरीक्षक, कुमारी न्यायमूर्ति संजू पांडा, उड़ीसा उच्च न्यायालय, डा. अजीत कुमार मोहंती, निदेशक, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र (बीएआरसी) और डा. विजय कुमार साहू, सलाहकार, ओडिशा सरकार को बधाई देना चाहूँगा।
मैं डिग्री, डॉक्टरल डिग्री और स्वर्ण पदक पाने वाले छात्रों को पुन: बधाई देना चाहूँगा।
मैं इस महत्वपूर्ण दिवस पर शिक्षकों, शिक्षण और गैर-शिक्षण स्टॉफ तथा डिग्री प्राप्त करने वाले छात्रों के परिजनों और अभिभावकों को भी अपनी शुभकामनाएं देता हूँ।
धन्यवाद।

जय हिन्द!”