03 अगस्त, 2019 को नई दिल्ली में, आउटलुक स्पीक आउट- पोषण कार्यक्रम के तहत पोषण पर आउटलुक इंडिया द्वारा आयोजित आउटलुक पोषण अवार्ड्स 2019 प्रदान करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | अगस्त 3, 2019

मैं यहां ''आउटलुक इंडिया" द्वारा पोषण पर आयोजित "आउटलुक स्पीक-आउट-पोषण" कार्यक्रम में उपस्थित होकर अत्यंत प्रसन्न हूं।

भारत एक ऐसा देश है जो 1.35 बिलियन लोगों की आशाओं पर बना है। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में, मुझे देश और मेरे साथी देशवासियों को अत्यंत नजदीक से देखने का अवसर मिला है। इसलिए, मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि हमारा देश हर क्षेत्र में उत्कृष्टता का प्रदर्शन करने की अदम्य भावना और अतुलनीय क्षमता वाला देश है।

हाल ही का चंद्रयान -2 मिशन हमारे वैज्ञानिक उत्साह और तकनीकी प्रगति के बारे में बहुत कुछ बताता है। हालांकि, यह सुनिश्चित करने कि भारत अपने विकास पथ पर तेजी से आगे बढ़ता रहे, देश के लोग, इसके मानव संसाधन को और अधिक मजबूत और स्वस्थ बनाने की आवश्यकता होगी। और निश्चित रूप से, पोषण मानव संसाधन को स्वस्थ बनाने में एक प्रमुख निर्धारक है।

भारत एक युवा राष्ट्र है, जिसकी 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है, किसी अन्य देश को इतने बड़े जनसांख्यिकीय लाभ का सौभाग्य प्राप्त नहीं है। भारत की प्रगति में तेजी लाने और उसके द्वारा राष्ट्रों के समुदाय में अपना समुचित स्थान प्राप्त किए जाने हेतु हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे लोगों, विशेषकर युवाओं को अच्छा पोषण प्राप्त हो।

तथापि, यह चिंता का विषय है कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एन.एफ.एच.एस.-4) के अनुसार, भारत में पाँच वर्ष से कम आयु के 38.4 प्रतिशत बच्चे अविकसित है।

आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि पिछले 10 वर्षों (एनएफएचएस -3 और 4) में चाइल्डहुड वेस्टिंग 19.8% से बढ़कर 21% हो गई है। मोडरेट एक्यूट मालन्यूट्रिशन (एमएएम) और सिवियर एक्यूट मालन्यूट्रिशन (एसएएम) का बढ़ता जाना गंभीर चिंता का विषय है। अल्पपोषण के अलावा, अतिपोषण या मोटापे की भी समस्या है। कम-से-कम 20.7% भारतीय महिलाएं और 18.6% पुरुष मोटे और अधिक वजन वाले (एनएफएचएस -4) हैं। भुखमरी और मोटापा कुपोषण का दोहरा बोझ है।

पानी की कमी, अभूतपूर्व सूखा, बाढ़ और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता भारत के खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर रहे हैं जिससे हमारी वर्तमान और भावी पीढ़ियों को खतरा है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं, पोषण एक स्वस्थ प्रतिरक्षा प्रणाली और उच्च-स्तर की संज्ञानात्मक क्षमता के लिए आवश्यक है। इसलिए वर्तमान और भावी पीढ़ियों का सशक्तीकरण देश के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यह समावेशी और सतत विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारतीय भोजन और आहार प्रणाली, अपनी विविधता के कारण अच्छे पोषण को बढ़ावा देते हैं। ज़्यादातर लोग मानते हैं कि भारतीय आहार प्रणाली अपने आप में पूर्ण है, और यह वर्तमान और भावी पीढ़ियों का बहुत अच्छी तरह पोषण कर सकती है। ये पारंपरिक भारतीय आहार बेहतर पोषण को बढ़ावा देते हैं, और इसलिए, हमें अपने पारंपरिक भोजन और खान-पान संबंधी परिपाटियों को बढ़ावा देना चाहिए।

यह भी देखा गया है कि कई भारतीय राज्यों ने पोषण के क्षेत्र में अनुकरणीय कार्य किया है। अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़, पंजाब, मिजोरम, गुजरात, ओडिशा, दिल्ली और असम ने बालकों के अवरूद्ध विकास में कमी दर्शायी है।

मेघालय, मिजोरम, बिहार, झारखंड और केरल 'वेस्टिंग' को कम करने में सफल हुए हैं। सिक्किम, असम, छत्तीसगढ़, ओडिशा, राजस्थान, बिहार और झारखंड रक्ताल्पता को कम करने में सफल हुए हैं। हमें अपनी सफलता का जश्न मनाना चाहिए और ऐसे प्रमाणों और अधिगम में वृद्धि करने पर गर्व महसूस करना चाहिए। ये उपलब्धियाँ दूसरों को ऐसी पहलों को दोहराने और इन्हें आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित कर सकती हैं।

हमारे कार्यक्रम और नीतियां प्रमाण आधारित होनी चाहिए। मैं आईसीएमआर, सीएफटीआरआई, आईसीएआर, एनआईएन, आईआईटी और एम्स जैसे अनुसंधान और शैक्षणिक संस्थानों से पोषण के क्षेत्र में और अधिक शोध करने का आग्रह करूंगा।

यह भी नोट किया जाना चाहिए कि कुपोषण को दूर करने का दूसरा अवसर बालिकाओं के मामले में किशोरावस्था मिलता है जबकि जीवन के शुरुआती 1000 दिन कुपोषण को दूर करने का पहला अवसर प्रदान करते है। लड़कियों की कम आयु में विवाह को रोकना, लड़कियों को बीच में पढ़ाई छोड़ने से रोकना, पहले बच्चे के लिए जल्दबाजी न करना और बच्चों के जन्म के बीच पर्याप्त अंतर से बेहतर पोषण में काफी मदद मिलेगी है।

हमें पोषण संबंधी योजना बनाने में कृषि मंत्रालय, पशुपालन मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रालय को भी शामिल करना होगा। आदर्श स्थिति में यह है कि किस फसल से इष्टतम पोषण प्राप्त हो इसे जानने के लिए हम कृषि मानचित्र को पोषण मानचित्र से मिलाकर देखें और इसी आधार पर विभिन्न प्रकार के बीजों के 'किट' की अनुशंसा करें। शुष्क भूमि कृषि को बढ़ावा देने से पोषण के मामले में बड़ा और सकारात्मक परिवर्तन आएगा।

जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करना अत्यंत महत्वपूर्ण है जो नवजात रुग्णता / मृत्यु दर को रोकता है। यह गर्भनाल के अलग होने के पश्चात निरंतर प्रतिरक्षा का निर्माण करने में मदद करता है। छह महीनों तक अनन्य रूप से स्तनपान कराया जाना सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। भारत में, अनन्य स्तनपान की दर केवल 55% (एनएफएचएस-4) है और केवल 41% नवजात शिशु के जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करने में सक्षम होती हैं। स्तनपान को 2 साल की आयु तक जारी रखने की आवश्यकता है। यह उल्लेख करना उचित है कि हम 1 से 7 अगस्त तक "विश्व स्तनपान सप्ताह" मना रहे हैं। हमें शिशुओं में इष्टतम पोषण सुनिश्चित करने और रोग के जोखिम को कम करने के लिए स्तनपान को सक्रिय रूप से बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

प्रिय बहनों और भाइयों, आई.सी.डी.एस. की पहुंच किसी अन्य प्रणाली से कहीं अधिक है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आई.सी.डी.एस. के अंतर्गत 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए उचित अनुपूरक भोजन और गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए पूरक भोजन प्रदान किया जाए।

देश में सूक्ष्म पोषक तत्व संबंधी कुपोषण को पूरक आहार, खाद्य पदार्थों के पुष्टिवर्धन (फूड फोर्टिफिकेशन), ऐसे फसलों का विकास जिनमें पोषक गुण अधिक हो (बायो- फोर्टिफिकेशन), और पारंपरिक रूप से पौधे उगाकर दूर करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हरी पत्तेदार सब्जियां, फल, दालें और अन्य प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों के सेवन में वृद्धि करके आहार विविधीकरण को सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।

टीकाकरण बच्चों को विभिन्न खतरनाक बीमारियों के शिकार होने से बचाने के लिए आवश्यक है। मुझे प्रसन्नता है कि सरकार ने टीकाकरण की व्याप्ति में व्यापक सुधार लाने के लिए "मिशन इन्द्रधनुष" शुरू किया है।

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा अभियान और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के माध्यम से सुरक्षित मातृत्व सुनिश्चित करने के अपने प्रयासों को जारी रखते हुए, हमें सभी महिलाओं के लिए अच्छी गुणवत्ता, सुलभ और सस्ती मातृत्व संबंधी स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने पर भी ध्यान देना होगा।

चूंकि पोषण का कृषि क्षेत्र के साथ निकट संबंध है, हमें पोषण युक्त फसलों की कृषि, शुष्क भूमि कृषि और प्राकृतिक रूप से बायो-फोर्टिफाइड फसलों जैसे लघु कदन्न, आंवला और सहजन को बढ़ावा देना होगा।

समय आ गया है कि भारत खाद्य, पोषण और जल सुरक्षा के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई) का उपयोग कर परिशुद्ध कृषि पर ध्यान केंद्रित करे।

सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, जिसे आमतौर पर विटामिन और खनिजों की कमी अर्थात् इनके स्वस्थ सीमा-रेखा के नीचे होने, के रूप में जाना जाता है, आज भारत में एक प्रमुख सार्वजनिक-स्वास्थ्य समस्या है। यह सभी राज्यों में सभी आय समूह के लोगों को प्रभावित करता है।

सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के परिणामस्वरूप उत्पादकता में कमी आ जाती है और संज्ञानात्मक और शारीरिक विकास मंद पड़ जाता है। हमें पूरक आहार, खाद्य पदार्थों के पुष्टिवर्धन (फूड फोर्टीफिकेशन) और आहार में विविधता के माध्यम से इस कमी को दूर करना होगा।

मुझे यह भी लगता है कि राज्य खाद्य आयोगों को राज्य खाद्य और पोषण आयोग के रूप में नामोद्दिष्ट किया जाना चाहिए और उन्हें पौष्टिक भोजन की समीक्षा, निगरानी और उस भोजन तक पहुँच सुनिश्चित करने की शक्तियां प्रदान की जानी चाहिए।

पोषण संबंधी आंकड़ों को तैयार करने, उनका विश्लेषण करने और विभिन्न क्षेत्रों में हस्तक्षेप की स्थिति की समीक्षा करने के लिए एक प्रणाली स्थापित करने के अलावा, सफल-सिद्ध हुए हस्तक्षेपों के प्रभावी कार्यान्वयन पर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है। आंगनवाड़ी केन्द्रों को पोषण, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा सेवाओं का अभिसरण बिंदु बनाना चाहिए।

मुझे लगता है कि मानव पूंजी क्षमता का भी लाभ उठाने की आवश्यकता है जिसमें 60 मिलियन महिला सदस्यों वाले 5.5 मिलियन स्व-सहायता समूह, 76000 ग्राम-स्तरीय दुग्ध सहकारी समितियां, 640,867 ग्रामों की 2,50,000 ग्राम पंचायत, 13.63 लाख आंगनवाड़ी केंद्र, 1.4 मिलियन कार्यकर्ता और 1.4 मिलियन सहायक शामिल है। इसके अलावा, आशा कार्यकर्ताओं और एएनएम को भारत को कुपोषण मुक्त बनाने वाले अभियान की सफलता के लिए मिलकर काम करना चाहिए।

इन जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए और पर्याप्त बजट के साथ उन्हे सशक्त बनाना चाहिए।

प्रधानमंत्री पोषण अभियान - जो कि समग्र पोषण के लिए एक योजना है - देश में पोषण संबंधी सभी हस्तक्षेपों के लिए मार्गदर्शक बिन्दु हो सकता है। इसका लक्ष्य वर्ष 2017-18 से वर्ष 2019-20 तक तीन चरणों में 100 मिलियन लोगों को लाभान्वित करना है। इसका उद्देश्य अवरूद्ध विकास, अल्प-पोषण, रक्ताल्पता और जन्म के समय कम वजन की समस्या में कमी लाना है।

मुझे लगता है कि पोषण अभियान को पंचायतों, सिविल सोसाइटी संगठनों और लोगों के नेटवर्क की अधिकाधिक भागीदारी के साथ एक अभियान के रूप में कार्यान्वित करने की आवश्यकता है।

वस्तुतः कुपोषण और पोषण संबंधी अन्य समस्याओं को समाप्त करने के लिए स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ बेटी पढाओ अभियान और इनके जैसी अन्य योजनाओं की तर्ज पर एक राष्ट्रीय आंदोलन होना चाहिए।

मुझे यह भी लगता है कि उप-ग्राम स्तर पर महिला पोषण-योद्धाओं या परिवर्तन प्रवर्तकों का सृजन करके इसे बदलकर देश में पोषण क्रांति लाने की आवश्यकता है। इन परिवर्तन प्रवर्तकों को नेताओं को हर घर जाकर जागरूकता पैदा करना और परामर्श प्रदान करना होगा।

प्रिय बहनों और भाइयों, भारत कुपोषण से निपटने हेतु पोषण क्रांति लाने के लिए निश्चित रूप से तैयार है और इसका नेतृत्व महिलाओं को करना होगा।

स्वास्थ्य क्षेत्र के सभी हितधारकों और नीति निर्माताओं को मोटापे की बढ़ती समस्या पर तुरंत ध्यान केंद्रित करना होगा। आइए हम कुपोषण पर भारत के दोहरे बोझ को समाप्त करें।

अंत में अपने भाषण को समाप्त करते हुए, मैं इस बात पर बल देना चाहूँगा कि प्रत्येक बच्चे को अच्छा पोषण प्राप्त करने का अधिकार है। कुपोषण को जीवन के पहले 1000 दिनों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए और एक जीवन-चक्र दृष्टिकोण अपनाते हुए इसके सभी रूपों में समाप्त करना आवश्यक है।

कुपोषण को मिटाने के लिए हमें कई श्रेष्ठ प्रथाओं, साक्ष्यों और मॉडल पर आधारित प्रणाली का निर्माण करना होगा। भविष्य की क्षमता और अधिकतम शारीरिक और मानसिक क्षमता से संपन्न नई पीढ़ी के नागरिकों के निर्माण के लिए गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

इस राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए सरकार और विकास भागीदारों को एक साझा मंच पर एक साथ आना और काम करना होगा। कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) निधियों का अधिक से अधिक आवंटन पोषण संबंधी हस्तक्षेपों के लिए होना चाहिए।

संसद सदस्यों को भी अपने एमपीएलएडी फंड का उपयोग पोषण के लिए करना चाहिए। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत भी सामुदायिक भूमि पर न्यूट्री गार्डन/किचन गार्डन बनाए जाने को बढ़ावा देकर संभवतः पोषण-संबंधी गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है।

मैं इस प्रासंगिक राष्ट्रीय मुद्दे पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने हेतु एक साथ आकर यह संयुक्त प्रयास करने के लिए आउटलुक ग्रुप और पीसीआई को बधाई देता हूं। अच्छा पोषण अब कोई विकल्प नहीं है; बल्कि यह नए भारत के उज्जवल भविष्य की एक पूर्वापेक्षा है।

धन्यवाद!

जय हिन्द!"