02 जून, 2019 को आंध्र प्रदेश में भारतीय पेट्रोलियम और ऊर्जा संस्थान द्वारा इंडस्ट्री अकादमी इंटरेक्शन फॉर इंप्रूवमेंट आफ क्वालिटी ऑफ अकादमी पर दो दिवसीय सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु का संबोधन

विशाखापट्टनम, आंध्र प्रदेश | जून 2, 2019

"मुझे भारतीय पैट्रोलियम एवं ऊर्जा संस्थान (आईआईपीई) द्वारा आयोजित 'शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार के लिए उद्योग अकादमिक वार्ता' विषय पर दो दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए बड़ी खुशी हो रही है।

यह विषय न केवल सामयिक है अपितु काफी महत्वपूर्ण भी है क्योंकि नए विचारों, नवाचारों और प्रौद्योगिकियों से हमारे जीने, सोचने और कार्य करने के तरीके की गतिशीलता बदल रही है।

भारत में शैक्षणिक माहौल को इन परिवर्तनों के अनुकूल बनाना होगा। वास्तव में, आदर्श रूप से, इन परिवर्तनों की आशा करनी चाहिए और भविष्य को रचनात्मक आकार देने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार करना चाहिए। इसलिए, शिक्षा के सभी स्तरों पर गुणवत्ता में सुधार बहुत महत्वपूर्ण है।

हमें ऐसी प्रणाली की आवश्यकता नहीं है जो उच्चतम मानकों से युक्त न हो। हम ऐसी शिक्षा प्रणाली नहीं अपना सकते जो बड़ी संख्या में अकुशल और बेरोजगार युवाओं को तैयार करती है। प्रति वर्ष, लाखों छात्र उच्च शिक्षण संस्थानों के पोर्टल से बाहर निकल रहे हैं, जिनमें से अधिकांश के पास रोजगार योग्य कौशल की कमी है। युवा स्नातकों को काम पर रखने वाले अधिकांश संगठनों को मजबूरन उन्हें छह महीने से एक वर्ष तक की अवधि के लिए आगे व्यावहारिक

प्रशिक्षण देना पड़ता है। शिक्षा प्रणाली में सुधार की तत्काल आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों से निकलने वाले छात्र न केवल रोजगार पाने लायक हों, बल्कि उनके पास जीवन कौशल, भाषा कौशल, तकनीकी कौशल और उद्यमशीलता के कौशल भी हों, ताकि वे लाभप्रद रूप से नियोजित या स्व नियोजित हो सकें।

स्नातक स्तर की शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को उद्योग या कृषि की जरूरतों को पूरा करने के लिए पूरी तरह से सुसज्जित होना चाहिए या किसी जोखिम उठाने वाले उद्यमी जैसी योग्यता और कौशल उनके पास होना चाहिए।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछले कई वर्षों के दौरान शिक्षा जगत और उद्योग जगत के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए गए हैं। हालाँकि, विभिन्न कारणों से वांछित परिणाम अभी तक प्राप्त नहीं हुए हैं।

मुझे लगता है कि नवप्रवर्तन के लिए आवश्यक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए शिक्षा जगत और उद्योग जगत के बीच एक परस्पर निर्भरता वाला संबंध होना चाहिए। इसे हासिल करने के लिए, उद्योग जगत को अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी और शैक्षणिक संस्थानों के साथ एक मजबूत संघटनात्मक संबंध स्थापित करना होगा।

प्रिय बहनों और भाइयों, प्रौद्योगिकी ने सभी बाधाओं को तोड़ दिया है और दुनिया एक वैश्विक ग्राम बन गयी है। वास्तविकता हमारी शिक्षा प्रणाली में भी परिलक्षित होनी चाहिए और हमारे शिक्षण संस्थान जिस प्रकार से शिक्षा दे रहे हैं, उसमें बड़े स्तर पर परिवर्तन किया जाना चाहिए। हमें वैश्विक रुझानों के साथ तालमेल रखने और यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि हमारे छात्र दुनिया में कहीं भी काम करने में सक्षम हैं।

हमारी शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल सुधार की आवश्यकता है। मुझे लगता है कि हमारे विश्वविद्यालयों और अन्य महत्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थानों में अनुसंधान की संस्कृति को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना होगा। उद्योग जगत को आगे आना चाहिए और शिक्षण संस्थानों को, विशेष रूप से उच्च गुणवत्ता के अनुसंधान के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे और उपकरण बनाने के संदर्भ में मदद देने के लिए हाथ बढ़ाना चाहिए।

उद्योग जगत और शिक्षा जगत को सीमित उद्देश्यों और एकबारगी परियोजनाओं के लिए हाथ मिलाने के बजाय दीर्घकालिक सहयोग को देखना चाहिए। प्रारंभिक अनुसंधान की शुरुआत से लेकर इसे ऐसे उत्पादों में तब्दील करना होगा जो समाज को लाभ पहुंचाते हैं और बड़ी अर्थव्यवस्था में योगदान करते हैं। उद्योग जगत -शिक्षा जगत संबंध दीर्घकालिक होना चाहिए और दोनों का लक्ष्य, दोनों के लिए फायदेमंद स्थिति होना चाहिए।

कंपनियां भी अपनी रुचि के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों की पहचान कर सकती हैं और उनसे जुड़े डॉक्टोरल तथा पोस्ट-डॉक्टोरल अनुसंधान के लिए निधियां प्रदान कर सकती हैं।

मुझे लगता है कि कॉरपोरेट जगत को कुछ अनुसंधान -उन्मुखी शैक्षणिक संस्थानों की पहचान करनी चाहिए और अनुसंधान परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए एक विशेष संचित भंडार या कोष की स्थापना करनी चाहिए जो नवाचारों को बढ़ावा देगा, समाज और देश की अर्थव्यवस्था को लाभान्वित करेगा।

हमारे विश्वविद्यालयों की पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रमों में व्यापक बदलाव किया जाना चाहिए। उद्योग जगत को विश्वविद्यालय विभागों के साथ बातचीत करनी चाहिए और उन पाठ्यक्रमों का एक सेट बनाने में मदद करनी चाहिए जो उद्योग जगत की उभरती जरूरतों के अनुरूप हो।

जैसा कि हम सभी जानते हैं, भारत को कभी विश्वगुरु कहा जाता था और दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आए ज्ञान-साधकों को आकर्षित करने वाले नालंदा, तक्षशिला, पुष्पगिरि और शिक्षा के अन्य केंद्रों सहित यह पूरे विश्व में सम्मानित था। ये केंद्र तीरंदाजी से लेकर खगोल विज्ञान और वेदों से लेकर राजनीति तक कई क्षेत्रों में शिक्षा प्रदान करते थे। समय आ गया है कि भारत फिर से ज्ञान और नवाचार का वैश्विक केंद्र बने। यह तभी संभव होगा जब हम एक-दूसरे से सीखने की संस्कृति का निर्माण करें और एक साथ सहयोगात्मक तरीके से विकास करें।

सभी हितधारकों को शिक्षा और अनुसंधान की गुणवत्ता में व्यापक सुधार लाने के लिए मिलकर काम करने की आवश्यकता है। नवाचार-उन्मुख अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए अकादमिक-उद्योग ज्ञान समूहों को बढ़ावा देने की भी आवश्यकता है। विद्वत समीक्षित अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में गुणवत्तापूर्ण शोध पत्र प्रकाशित करने और नवाचारों के लिए पेटेंट प्राप्त करने में भारत अग्रणी देशों में होना चाहिए।

नीति निर्माताओं, विशेषज्ञ निकायों, शिक्षाविदों, शैक्षिक संस्थानों और औद्योगिक क्षेत्र को देश के युवाओं को उच्च स्तरीय प्रवीणता प्राप्त करने के लिए उपयुक्त ज्ञान और कौशल प्रदान करने का प्रयास करना चाहिए और उद्योग जगत और शिक्षाविदों के बीच क्रियात्मक तालमेल बनाना चाहिए।

शिक्षण संस्थानों को उपयोगी अवधारणाओं और अनुप्रयोग-उन्मुख, समस्या-समाधानकारी दृष्टिकोणों पर ध्यान देना चाहिए।

कुछ देशों में कॉरपोरेट्स, विश्वविद्यालयों/शैक्षणिक संस्थानों तक पहुंच बना रहे हैं और सहयोग कर रहे हैं। मैं भारत में भी इसी तरह की प्रवृत्ति देखने की उम्मीद करता हूं।

मुझे बताया गया है कि नवाचार को प्रोत्साहित करने और उद्योग-अकादमिक संबंध बनाने के लिए, मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आईआईटी- मद्रास को लगभग 300 करोड़ रुपये की संवर्धित धनराशि दी है। इसी प्रकार इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम डिज़ाइन एंड मैन्युफैक्चरिंग (ईएसडीएम) और इंडियन इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमीकंडक्टर्स एसोसिएशन (आईईएसए) ने ईएसडीएम स्पेस में एक रोबस्ट टेलेंट पाइपलाइन का निर्माण करने के लिए आईआईटी-खड़गपुर के साथ काम करने पर सहमति व्यक्त की है।

इस तरह के और अधिक सम्बन्धों की आवश्यकता है ताकि शिक्षा जगत और उद्योग जगत संयुक्त रूप से समाज से जुड़ी विभिन्न समस्याओं पर काम करने के लिए छात्रों को बेहतर अवसर प्रदान करने हेतु वास्तविक समय में अनुप्रयोग आधारित अनुसंधान प्लेटफ़ॉर्म बनाएं।

इस तरह के सहयोग दोनों के लिए फायदेमंद होंगे। उदाहरण के लिए, शैक्षणिक संस्थान उद्योग जगत और उनकी प्रवृत्तियों की समुचित आवश्यकताओं को जान पाएंगे। तदनुसार, वे अनुप्रयोग-आधारित अनुसंधान कर सकते हैं। दूसरी तरफ उद्योग जगत नियोजन के लिए नई प्रतिभाओं को खोजने और एक विवेकपूर्ण तरीके से संसाधनों का उपयोग करने में सक्षम होगा।

मुझे यकीन है कि शिक्षा और उद्योग जगत के सामूहिक प्रयासों से न केवल शिक्षण-ज्ञान अभ्यास की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि शिक्षा और उद्योग जगत के बीच की खाई को पाटने में भी मदद मिलेगी। आईआईपीई, आईआईएम-विशाखापत्तनम, एयू, सीआईआई और एपीपीसीबी द्वारा इस दिशा में की गई पहल प्रशंसनीय है।

अंत में अपनी बात समाप्त करने से पहले, मैं इस बात पर बल देना चाहूंगा कि यह बातचीत एक औपचारिक और नियमित कार्यक्रम के रूप में समाप्त नहीं होनी चाहिए। बल्कि, इस पर आगे और चर्चा होनी चाहिए और ठोस सिफारिशों और कार्रवाई के साथ अकादमिक-उद्योग सहयोग को और अधिक गति प्रदान की जानी चाहिए।

जय हिन्द!"