02 जुलाई, 2021 को हैदराबाद में सीसीएमबी-लाकोन्स की अपनी यात्रा के दौरान एक सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | जुलाई 2, 2021

“प्रिय बहनों और भाइयों,
मुझे लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण हेतु सीसीएमबी की प्रयोगशाला (लाकोंस) का दौरा करके, आप सबके साथ संवाद करके और इस प्रयोगशाला में किए जा रहे उत्कृष्ट कार्यों से अवगत होकर प्रसन्नता हो रही है।
वास्तव में, भारत के उप-राष्ट्रपति का कार्यभार संभालने के बाद से मैंने एक 'ज्ञान मिशन' की शुरुआत की है और अन्य संस्थानों के साथ-साथ मैंने विभिन्न अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों, आईआईटी और आईआईएम का दौरा किया है। इसका उद्देश्य केवल अपने ज्ञान में वृद्धि करना नहीं है, बल्कि युवाओं को सामान्य से परे देखने और उनके द्वारा चुने गए क्षेत्रों में नई खोज करने के लिए प्रेरित करना भी है। दूसरे शब्दों में, प्रौद्योगिकी और नवोन्मेष से प्रेरित इस तीव्र परिवर्तनशील दुनिया में नवोन्मेषी होना आवश्यक है।
हम सदी में कभी-कभार एक बार आने वाली महामारी के साये में बैठक कर रहे हैं, जब कोविड-19 पूरे विश्व में अपना कहर बरपा रहा है। हजारों जानें गई हैं, जबकि आजीविकाओं और अर्थव्यवस्थाओं पर बहुत बुरा असर पड़ा है। हमारी जीवनशैली नाटकीय रूप से बदल गई है और हम सभी एक नए सामान्य से गुजर रहे हैं और उसे अपना रहे हैं। यह वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा इस अवसर की चुनौतियों से निपटने के लिए आगे आने, महामारी से निपटने के उपाय खोजने में तीव्रता लाने और भावी खतरों से निपटने का समय भी है।
सार्स-सीओवी-2 के बार-बार म्यूटेट होने के कारण उसके नए-नए रूपांतर उभर रहे हैं, जिनकी संक्रमणीयता अधिक तीव्र है। यह चिंता का विषय है और इसकी तीव्रता से फैलने की क्षमता को खत्म करने के लिए वैज्ञानिकों को अपने प्रयास बढ़ाने की जरूरत है। मैं समझता हूँ कि उपयुक्त टीकों और दवाओं के विकास में तेजी लाने के लिए नए वेरिएंट के जीनोम सीक्वेंसिंग की प्रक्रिया को तीव्र किये जाने की आवश्यकता है। शायद, अनुसंधान संस्थानों के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाया जाना चाहिए और एक ऐसा सार्वभौमिक वैक्सीन के विकास की व्यवहार्यता का अध्ययन किया जाना चाहिए, जो विभिन्न रूपांतरों को अप्रभावी बना सके।  
सीक्वेंसिंग पर ध्यान केंद्रित करने वाले विशेष शोध से मौजूदा महामारी के दौरान समय पर हस्तक्षेप करने में सहायता मिलेगी। एक सहायक साधन के तौर पर, सीक्वेंसिंग नए वायरल म्यूटेशन के उद्भव की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इस प्रकार कोविड-19 के प्रसार से निपटने में मदद करता है।   
देश के कुछ चिड़ियाघरों में बाघ, शेर आदि के कोविड -19 से संक्रमित होने की रिपोर्ट के आलोक में नए वेरिएंट की जीनोम सीक्वेंसिंग की आवश्यकता महत्वपूर्ण हो गई है। जैसा कि आप सभी जानते हैं, वायरस का एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में प्रसार - मनुष्यों से जानवरों में या जानवरों से मनुष्यों में जाना उसके नए रूपांतरों को जन्म दे सकता है और इससे महामारी के खिलाफ चल रही लड़ाई में नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है ।
महामारी से उत्पन्न चुनौती के कारण कई संगठन स्वयं को पुनर्गठित करने और समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करने के लिए विवश हुए हैं। इसके प्रभाव का दायरा इतना व्यापक है कि यह असाधारण प्रयासों और संस्थानों के बीच सुदृढ़ सहयोगी व्यवस्था की अपेक्षा करता है। मुझे महसूस होता है कि संक्रामक रोग पैदा होने की प्रक्रिया को समझने और भविष्य में इस तरह की महामारियों को रोकने के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय, दोनों स्तरों पर इन संबंधों को बनाने के लिए लाकोन्स-सीसीएमबी बिल्कुल उपयुक्त स्थिति में है।

मुझे बताया गया है कि लाकोन्स देश के उन चार केंद्रों में से एक है, जो कोविड-19 संक्रमण के लिए जानवरों के नमूनों का परीक्षण कर सकता है। मुझे यह जानकर खुशी हो रही है कि इसने हाल ही में केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण तथा वानिकी, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सहयोग से पिंजरे में बंद जानवरों के लिए कोविड-19 जांच के बारे में चिड़ियाघर के फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं।

मैं सीसीएमबी को कोविड-19 को कम करने में इसके योगदान के लिए भी बधाई देना चाहता हूं, जिसमें तीव्र निदान, जीनोम सीक्वेंसिंग और निगरानी की स्थापना शामिल है। मुझे यह जानकर खुशी हो रही है कि सीसीएमबी के वैज्ञानिक भारत में कोरोना वायरस के प्रसार और इसके तेजी से विकास की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं। सीसीएमबी में किए गए शोध से यह भी पता चला है कि कोरोना वायरस हवा से फैलता है तथा सीवेज और जंगली जानवरों में भी इसका पता लगाया जा सकता है। इस वायरस का सरलता से होने वाला प्रसार कई चुनौतियां उत्पन्न करता है, और जिस तरह से यह नए होस्ट या अन्य प्रजातियों को संक्रमित कर सकता है, वह शोध का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र होगा। सीसीएमबी को इसी दिशा में आगे बढ़ना है और कुछ मूल्यवान तथ्यों पर प्रकाश डालना है।

मुझे बताया गया है कि लाकोन्स के रूप में एक अनोखी सुविधा को स्थापित किये जाने के संबंध में 1990 के आरंभ में विचार किया गया था, जब भारत में आनुवांशिक विभिन्नता और वन्य जीवों के नमूनों की प्रजनन-क्षमता का अध्ययन करने के लिए प्रयोगशाला नहीं थी। अपने आरंभ के बाद से ही, लाकोन्स ने अनेक जैव-प्रौद्योगिकी साधन विकसित किए हैं और वन्य जीवों के संरक्षण में उनका प्रयोग किया है।

लाकोन्स द्वारा विकसित की गई सार्वभौमिक प्राइमर प्रौद्योगिकी ने दोषियों को न्यायिक प्रक्रिया में लाने और न्याय प्रदान करने के लिए एक शक्तिशाली साधन उपलब्ध कराकर देश भर में वन्यजीव फोरेंसिक को मजबूत किया है। इससे राज्यों के वन विभाग सुरक्षा उपायों को लागू करने में सक्षम बने हैं। इस प्रौद्योगिकी का लाभ वन्य जीवों, वन्य पौधों और उनके अंशों के गैर-कानूनी व्यापार को रोकने में मिला है।

मुझे यह जानकार खुशी है कि लाकोन्स के वैज्ञानिकों ने सूचना के स्त्रोत के रूप में जानवरों के डीएनए का उपयोग कर स्टार कछुओं को तस्करों से बचाने के बाद वापस उनके निवास स्थल नल्लामला पहाड़ियों में भेजने में मदद की है।
 
मुझे यह जानकर खुशी है कि लाकोन्स का नेशनल वाइल्डलाइफ जेनेटिक रिसोर्स बैंक दुनिया भर में ऐसी 23 विशेष प्रयोगशालाओं में एक है। मुझे बताया गया है कि लाकोन्स के वैज्ञानिकों ने सहायक प्रजनन के लिए प्रौद्योगिकी विकसित की है और इन आधुनिक प्रौद्योगिकियों का प्रयोग कर काला हिरण, चीतल और नील कपोत का सफलतापूर्वक प्रजनन किया है। नेहरू जूलॉजिकल पार्क में लुप्तप्राय पिसूरी हिरणों की संख्या को कुछ हिरणों से सफलतापूर्वक बढ़ाकर 250 तक किया गया है। उन हिरणों को सफलतापूर्वक अमराबाद के जंगलों में छोड़ दिया गया है। इसी प्रकार के प्रयास कश्मीर में हंगुल हिरण, छत्तीसगढ़ में जंगली भैंसे और दार्जिलिंग में रेड पांडा के लिए भी किए जाने चाहिए।

मुझे यह उल्लेख कर प्रसन्नता हो रही है कि लुप्तप्राय प्रजातियों की जैव-बैंकिंग को बढ़ावा देने के लिए चिड़ियाघरों से संबंधित लाकोन्स की गतिविधियों से देश के विभिन्न भागों के पाँच चिड़ियाघरों को मिलाकर एक संघ का गठन किया जा रहा है। यह कदम उचित समय पर उठाया जा रहा है। मुझे विश्वास है कि यह संघ और अन्य ऐसे संगठन इस जैव-बैंकिंग सुविधा का पूरा लाभ उठाएंगे।

मौजूदा जलवायु परिवर्तन से मनुष्य सहित हमारे आस-पास के सभी जीवों के जीवन पर बहुत असर पड़ा है। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि भारत में कुछ सर्वाधिक जैव-विविधता वाले क्षेत्र हैं और इसमें अनेक प्रकार के पारिस्थिकीय तंत्र हैं, जैसे कि जंगल, घास के मैदान, आर्द्रभूमि, रेगिस्तान और तटीय एवं सामुद्रिक पारिस्थिकीय तंत्र। हमें न केवल अपने पारिस्थिकीय तंत्रों को सुरक्षित और संरक्षित करने की जरूरत है, बल्कि हमें पशुओं, पेड़-पौधों और मनुष्यों के हित के लिए लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए।

मैं बेहतर भविष्य के लिए हमेशा प्रकृति की सुरक्षा करने और संस्कृति को संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल देता हूँ।

मुझे विश्वास है कि आधुनिक जैवप्रौद्योगिकीय साधन जीव-जंतुओं और पारिस्थिकीय तंत्रों पर प्रतिकूल प्रभावों को कम करने में सहायक होंगे।

अपने भाषण का समापन करने से पहले, मैं लोगों से अपील करता हूँ कि वे वैक्सीन लगवाने में संकोच न करें और वैक्सीन की आवश्यक डोज लें। आज लोगों में यह जागरूकता फैलाये जाने की जरूरत है कि वैक्सीन अधिक सुरक्षा प्रदान करेगी और यदि संक्रामण हो भी जाए तो बीमारी की गंभीरता कम होगी। फिर भी लोगों को एहतियात बरतने में कमी नहीं करनी चाहिए। सभी को भीड़ से बचना चाहिए, सामाजिक दूरी का पालन करना चाहिए, मास्क पहनना चाहिए और हवादार क्षेत्रों में रहना चाहिए और कोविड-19 उपयुक्त व्यवहार करना चाहिए।

और जब हम कोविड-19 महामारी से घिरे हैं, इसने हमें अपने देश में अन्य संक्रामक बीमारियों से लड़ने के लिए तकनीकी रूप से तैयार रहने का महत्व भी समझाया है। अब इस बात की जरूरत है कि भारत ऐसी पशुजन्य बीमारियों पर अधिक ध्यान दे, जो पशुओं और मनुष्यों दोनों को प्रभावित करती हैं। ऐसी अनेक रिपोर्टें हैं जो जलवायु परिवर्तन को उभरती संक्रामक बीमारियों से जोड़ रही हैं। इसलिए, मैं आशा करता हूँ कि सीसीएमबी, लाकोन्स, अन्य अनुसंधान संस्थान और भारत के जन स्वास्थ्य संगठन जीनोम का तीव्रता से अनुक्रमण करने वाले मंचों का उपयोग कर इस मामले में निगरानी रखने के लिए अपनी सुविधाओं का विस्तार करेंगे।

निस्संदेह, 'सबका स्वास्थ्य' के संबंध में विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। यह विचार 'महा उपनिषद' में पहले ही "वसुधैव कुटुंबकम" या "पूरा विश्व एक परिवार है" के रूप में समाहित है। मैं अपने वैज्ञानिकों से आग्रह करता हूँ कि वे भारत को जन-स्वास्थ्य और भविष्य में उभरने वाली स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना करने में आत्मनिर्भर और विश्व नेता बनाएँ।

जय हिन्द !”