02 अगस्त, 2019 को नई दिल्ली में भारतीय वन सेवा के 2018 बैच के अधिकारी प्रशिक्षुओं को भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा संबोधन

नई दिल्ली | अगस्त 2, 2019

“भारतीय वन सेवा के 2018 बैच के प्रशिक्षार्थी अधिकारियों के बीच उपस्थित होकर मुझे वास्तव में बहुत खुशी हो रही है। मुझे इस बात की भी बेहद खुशी है कि आज हमारे बीच भूटान के दो युवा प्रशिक्षार्थी अधिकारी भी हैं।

मैं आप सभी का उपराष्ट्रपति भवन में स्वागत करता हूँ!

वानिकी का हमेशा से भारतीय लोकाचार और संस्कृति में बहुत ही विशेष स्थान रहा है। हमारे लिए जंगल केवल संसाधन मात्र नहीं,बल्कि उससे भी अधिक हैं। वे देश की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक विरासत हैं।

अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951 के तहत गठित तीन अखिल भारतीय सेवाओं में से एक भारतीय वन सेवा पर हमारे प्राकृतिक वनों की रक्षा का भार है।

आपको प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और भागीदारी, स्थायी प्रबंधन के माध्यम से देश की पारिस्थितिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय वन नीति को लागू करने का कार्य सौंपा गया है।

यह एक महान कार्य है, यह एक प्रतिष्ठित कार्य है और सबसे बढ़कर यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।

मैं इस अवसर पर इस पेशे को चुनने के लिए आप सभी को बधाई देता हूं।

आज वन अधिकारियों की पारंपरिक भूमिका मौलिक रूप से बदल गई है। उनको न केवल वनों के स्थायी प्रबंधन, बल्कि उन लोगों के सशक्तीकरण की ज़िम्मेदारी भी सौंपी गई है, जो वनों पर निर्भर हैं।

हमारी राष्ट्रीय निधि के संरक्षक के रूप में, विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक अच्छा संतुलन बनाने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका है। यह संतुलन भारत जैसे तेजी से विकास कर रहे राष्ट्र के समावेशी और सतत विकास के लिए आवश्यक है।

मेरे प्यारे युवा अधिकारियो,

आपके पास विश्व के 17 विशालाकार जैव विविधता वाले देशों में से एक की जैव विविधता के रक्षण और पोषण करने का जनादेश है।

विश्व की अभिलिखित प्रजातियों का 7-8 प्रतिशत हिस्सा भारत में है। जिस तरह से हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन करते हैं वह न केवल हमारी जैव विविधता, बल्कि वैश्विक जैव विविधता की रक्षा में भी एक निर्णायक भूमिका निभाता है।

प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक पारिस्थितिक क्षेत्र की अलग-अलग चुनौतियां हैं और युवा वन अधिकारियों के रूप में आपको इन चुनौतियों से निपटने के लिए अपने आप को ज्ञान और कौशल से लैस करना चाहिए।

राष्ट्रीय वन नीति का उद्देश्य हमारे वृक्षों का आच्छादन 23% से बढ़ा कर 33% करना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें अपने देश में वनरोपण कार्यक्रमों पर बड़ा जोर देना होगा।

मैं आपसे भारत के पूर्वोत्त र क्षेत्र के वनों को संरक्षित करने पर विशेष जोर देने के लिए कहता हूं जहां पिछले 18 वर्षों से लगातार वृक्षाच्छादित क्षेत्र की कमी हो रही है।

मेरे प्यारे युवा मित्रो,

वनस्पति और जीवों की कई प्रजातियां अब अपने नैसर्गिक वास के नुकसान और विखंडन तथा लापरवाह दोहन के कारण विलुप्ति के खतरों का सामना कर रही हैं। जैव विविधता के नुकसान से पारिस्थितिकी तंत्र में बड़े, अप्रत्याशित और विनाशकारी परिवर्तन हो सकते हैं जिससे पृथ्वी पर सभी जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

भारत की कम से कम 10 प्रतिशत अभिलिखित वन्य वनस्पतियां और इसके कुछ वन्य जीव उस सूची में हैं जिनकी प्रजातियां खतरे में हैं। हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते हैं। जैव-विविधता एक महत्वपूर्ण संसाधन है जिसका परिश्रमपूर्वक संरक्षण करने की आवश्यकता है क्योंकि यह अपने आप में जीवन की कुंजी है।

नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र जैसे कि तटीय क्षेत्रों, पर्वतों और पहाड़ों, आर्द्रभूमियों, रेगिस्तानों, झूमकृषि क्षेत्रों को संरक्षित करने की जरूरत है ताकि उनसे मिलने पारिस्थितिक लाभों के अलावा बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका को बनाए रखा जा सके।

पिछले कुछ दशकों में, विश्व में पर्यावरणीय क्षरण, वन आच्छादन में कमी और जलवायु परिवर्तन के कारण मानव जाति के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।

सबसे प्रभावी कार्बन अवशोषक होने के नाते वन, वातावरण में बढ़ती ग्रीनहाउस गैसों और ग्लोबल वार्मिंग के लगातार मंडराते खतरे को कम करने के सबसे शक्तिशाली उपाय हो सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के क्षरण को दूर करने के लिए भारत की विश्व में अहम भूमिका है और यह आबादी और अर्थव्यवस्था के मामले में दुनिया के बड़े देशों में से एक है।

इसलिए, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के क्षरण को दूर करने के लिए भारत को विश्व का नेतृत्व करना चाहिए और अन्य राष्ट्रों के अनुसरण योग्यर एक मॉडल बनाना चाहिए।

हमने पहले ही संरक्षण संबंधी लक्ष्यों की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। हाल ही में जारी बाघ जनगणना के परिणामों में अनुमान लगाया गया है कि भारत में बाघों की संख्या 2006 में 1411 से बढ़कर 2018 में 2,976 हो गई है, जो कि वास्तव में प्रसंशनीय हैं।

यह उपलब्धि हमारे वन अधिकारियों के कौशल, प्रतिबद्धता, क्षमता और समर्पण का एक प्रमाण है।

वन अधिकारी होने के कारण आपका कार्य आसान नहीं है। आपके सामने चुनौतियां जटिल हैं और आपसे अपेक्षाएं हमेशा बहुत अधिक रहेंगी।

महात्मा गांधी ने कहा था , "हम विश्व के वनों के साथ जो कुछ कर रहे हैं, वह उसी का प्रतिबिंब है, जो हम अपने और एक दूसरे के साथ कर रहे हैं"।

अपने करियर में आगे बढ़ने के साथ राष्ट्रपिता का यह कथन आपकी कथनी और करनी का मार्गदर्शन करे।

मैं आप सभी को आपके भविष्य के प्रयासों की शुभकामनाएं देता हूं।

धन्यवाद!

जय हिन्द!"