02 अगस्त, 2019 को नई दिल्ली में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स (आईआईसीए) और सोसायटी फॉर इन्सॉल्वेंसी प्रैक्टिशनर्स ऑफ इंडिया (सीआईपीआई) द्वारा आयोजित इनसॉल्वेंसी रिसर्च फाउंडेशन (आईआरएफ) का उद्घाटन करने के बाद सभा में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति

नई दिल्ली | अगस्त 2, 2019

"मैं दिवाला अनुसंधान फाउंडेशन (आई आर एफ) का उद्घाटन करते हुए प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ। मैं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर (आईआईसीए) और सोसायटी फॉर इन्सोल्वेंसी प्रैक्टिशनर्स ऑफ इंडिया (एसआईपीआई) को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने मुझे आमंत्रित किया।

भारत के दिवाला अध्याय में इस प्रकार के फाउंडेशन की आवश्यकता पर अपने विचार साझा करने से पहले, मैं डा. समीर शर्मा की आई आई सी ए में अनुसंधान संस्कृति निर्मित करने के लिए सराहना करता हूँ।

जैसा कि आप सभी जानते हैं, प्रभावी दिवाला कानून वित्तीय प्रणालियों की स्थिरता के लिए आवश्यक है और आर्थिक विकास तथा संपदा सृजन की बुनियाद है। उद्यमिता में, प्राकृतिक रूप से जोखिम लेना शामिल होता है। व्यापार करने के कुछ विचार अपरिहार्य रूप से गलत साबित होते हैं। इसके अनेक कारण हो सकते हैं। ठोस दिवाला और शोधन अक्षमता प्रक्रिया से ऐसी समस्याएं जल्दी हल हो जाती हैं।

बिना शोधन अक्षमता कानून के यदि कोई संगठन ऋण अदा नहीं कर पाता तो सभी दावेदार, संगठन की परिसंपत्तियों में से हिस्सा लेने की दौड़ में शामिल हो जाते हैं। दावेदारों के इस झगड़े से संगठन दिवालापन की ओर बढ़ता है, चाहे उसका व्यापार ढांचा आमतौर पर स्थिर क्यों न हो।

शोधन अक्षमता प्रक्रिया का उद्देश्य ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए सहायता प्रदान करना और उद्यमिता, व्यापार और अधिक जोखिम को प्रोत्साहित करना है। अत:, कानून के प्रभाव का अध्ययन करके और नियमित आधार पर उसकी विशेषताओं और कमियों की जाँच करके उसमें निरंतर निवेश करना महत्वपूर्ण है।

विकसित देशों में अकादमिक प्रक्रिया नीति विकास, उद्योग अनुसंधान में सहायता प्रदान करने और नवाचारी समाधान निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मैं चाहता हूँ कि अकादमिक जगत और उद्योग के बीच ठोस सहयोग होना चाहिए, ताकि भारत में अनुसंधान संस्कृति में सुधार हो, विशेष रूप से दिवाला और शोधन अक्षमता के मामलों में।

प्रिय बहनों और भाइयों, विविध क्षेत्रों में निवेश माहौल में सुधार करने के लिए आर्थिक सुधारों और भारत को आकर्षक निवेश गंतव्य बनाने के लिए सरकार ने अनेक प्रयास किए हैं। जैसा कि आप सभी जानते हैं, भारत ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में बहुत ऊपर आ गया है और अब 77वें स्थान पर है।

बेशक, हमें इस रैंकिंग में और सुधार लाना है और भारत को निवेशकों के लिए प्रमुख वैश्विक गंतव्यों में से एक बनाना है।

2016 में दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता पारित करके ठोस दिवालापन तंत्र स्थापित करने से, हमने कम समय में तेज कदम उठाए हैं। बेशक, यह हालिया भारतीय आर्थिक सुधारों की सफलता की गाथाओं में से एक है।

कारपोरेट दिवालापन समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) 1 दिसम्बर, 2016 में लागू हुई थी, जिससे संबंधित प्रावधानों को लागू हुए दो वर्षों से अधिक हो गए हैं। दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) की रिपोर्ट के अनुसार, दिसम्बर, 2018 तक लगभग 1500 कारपोरेट ऋण मामले सीआईआरपी के समक्ष आए। इनमें से 142 मामले बंद किए गए, जबकि 63 मामलों को वापस लिया गया। 302 मामलों का परिसमापन किया गया, जबकि 72 मामलों में समाधान योजनाओं को मंजूरी दी गई है।

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता कर्ज लेने वालों के लाभों और व्यवहार को नया रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आईबीसी ने ऋणदाताओं और कर्जदारों के बीच बेहतर बातचीत के लिए मंच तैयार करने में सहायता प्रदान करने में सहायता प्रदान की है।

वित्तीय संकट से गुजर रही फर्में मजदूर और पूंजी नहीं बढ़ाना चाहती हैं। ऐसी फर्मों के बंद होने से मजदूर और पूंजी, मुक्त होंगे। अन्य शब्दों में, शोधन अक्षमता प्रक्रियाएं अंतत: स्वस्थ फर्मों और स्वस्थ अर्थव्यवस्था के लिए संसाधनों के पुनर्चक्रण में सहायता प्रदान करेंगी।

दिवाला और शोधन अक्षमता कानून मूल्यवान लाभ पहुँचा रहे हैं जिन्हें जनता अभी महसूस नहीं कर पा रही है। अत: भारत के लिए ऐसे लाभ जो सुधारों के कारण हुए हैं उन्हें कम महत्व मिला है। इसका एक उदाहरण अधीनस्थ विधान का विचार है।

दिवाला और शोधन अक्षमता व्यवस्था के कार्यकरण में सुधार के लिए सूचना के उपयोग की प्रभावी प्रक्रिया आवश्यक है। अनुसंधान संचालित विनियमन प्रक्रिया में सांख्यिकीय ढांचे की आवश्यकता है और मुझे विश्वास है कि आईआरएस अधिक सुदृढ़ व्यवस्था का आधार स्तंभ बन सकता है।

मुझे जानकारी दी गई है कि अब तक राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण में 1,322 मामले दाखिल किए गए हैं और 4,452 मामले प्रवेश-पूर्व चरण में निपटाए गए हैं, जबकि 66 मामले न्यायिक निर्णय के बाद निपटाए गए और अन्य 260 मामलों के परिसमापन का आदेश दिया गया है।

मुझे यह जानकारी भी दी गई है कि ऋणदाताओं से, 66 हल हुए मामलों से लगभग 80,000/- करोड़ रुपए वसूले गए हैं। इस संबध में, प्रवेश-पूर्व चरण में 4452 मामले निपटाए गए हैं, निपटान की गई धनराशि लगभग 2.02 लाख करोड़ रुपए है। मैं इस बात से भी अवगत हूँ कि कुछ बड़े मामले सुलझाए जाने के अंतिम चरणों में हैं और इनसे प्राप्त अनुमानित राशि लगभग 70,000 करोड़ रुपए है।

एनपीए श्रेणी के अंतर्गत आने वाले नए खातों में कमी आई है जो यह दर्शाता है कि कर्जदारों और ऋण दाताओं के व्यवहार में निश्चित रूप से सुधार हुआ है। यह वित्तीय बाजार पर आईबीसी के सकारात्मक प्रभाव का स्पष्ट प्रमाण है। मैं यह जानकर प्रसन्न हूँ कि वर्तमान सरकार की प्रतिबद्धता से, दिवालापन पेशेवरों का वृहत उद्योग भारत में विकसित हुआ है।

प्रिय बहनों और भाइयों, दिवालापन गतिशील कानून है और इसे निरंतर विकास की आवश्यकता है। बाजार में विकास से तालमेल बनाए रखने के लिए कानून में तेज बदलावों की आवश्यकता है। मैं यह जानकर प्रसन्न हूँ कि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स (आई आई सी ए) द्वारा एस आई पी आई, दिवालापन थिंक टैंक के सहयोग से इंसोल्वेंसी रिसर्च फाउंडेशन (आई आर एफ) की स्थापना की गई है, जो जनहित और ठोस नीति निर्माण में सहायता करने हेतु एक स्वतंत्र अनुसंधान केन्द्र है।

मुझे विश्वास है कि इसकी गतिविधियों से विद्धानों का संवर्ग और दिवालापन के क्षेत्र में शिक्षाविदों, विद्वानों और न्यायविदों का एक मजबूत नेटवर्क उभरकर सामने आएगा।

मैं जानता हूँ कि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कारपोरेट अफेयर्स (आई आई सीए) ने कारपोरेट मामलों और शासन से संबंधित प्रमुख मामलों में कारपोरेट कार्य मंत्रालय की पहलों में सहयोग दिया है। यह अन्य पहलों के साथ अनुसंधान को बढ़ावा दे रहा है और क्षमता निर्माण कर रहा है और कारपोरेट शासन, प्रतिस्पर्धा कानून, निवेशक शिक्षा, दिवाला और शोधन अक्षमता और कारपोरेट सामाजिक दायित्व के क्षेत्र में नीतियों की वकालत कर रहा है।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि यह भारत का एकमात्र ऐसा संस्थान है जो अपना प्रमुख स्नातक दिवाला कार्यक्रम (जीआईपी) संचालित करने के लिए भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (आई बी बी आई) द्वारा प्राधिकृत है। आई आई सी ए ने इस कार्यक्रम को संचालित करने के लिए भारत और विदेशों के विद्वानों को एकत्रित किया है।

सोसायटी ऑफ इंसोल्वेंसी प्रैक्टिशनर्स ऑफ इंडिया, संक्षिप्तत: सीपी, पहला स्वतंत्र थिंक टैंक है जो दिवाला और दिवाला उद्योग के सॉफ्ट बुनियादी ढांचे के विकास के प्रति समर्पित है।

अत्यावश्यक कानूनी सुधार लाने में सरकार के प्रयास भारत की विकास गाथा को पुन: परिभाषित कर रहे हैं। अत:, अंत में, दिवाला और शोधन अक्षमता सुधारों से कर्जदारों के व्यवहार में मूल्यवान लाभ हुआ है, जो प्रचालन संबंधी और वित्तीय ऋणदाताओं दोनों के संबंध है। इसके आगे का मार्ग डाटा सेट और उच्च गुणवत्तापूर्ण नीति दल बनाने में निहित है, जो विभिन्न क्षेत्रों में कार्यक्रम को आगे बढ़ायेंगे।

मैं चाहता हूँ आईआरएफ, वैश्विक जाँच पद्धतियों का अनुकरण करके और उन्हें भारतीय संदर्भ में प्रासंगिक बनाकर और अपनाकर सहायता प्रदान करे। मैं उद्योगों से भी आग्रह करता हूँ कि वे अपने कारपोरेट सामाजिक दायित्व के भाग के रूप में अनुसंधान को बढ़ावा दें।

मैं आईआरएफ को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ। मैं आशा करता हूँ कि यह भारत का अग्रणी अनुसंधान केन्द्र बनकर उभरेगा और वैश्विक उत्कृष्टता केन्द्र के रूप में अपनी पहचान बनाएगा।

मैं पुन: आईआरएफ, आईआईसीए और सीआईपीआई को बधाई देता हूँ और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए अपनी शुभकामनाएं देता हूँ।

धन्यवाद

जय हिंद"