02 अक्टूबर, 2020 को नई दिल्ली में “गांधी और विश्व” पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार में एक पूर्व-दर्ज वीडियो के माध्यम से भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का भाषण

नई दिल्ली | अक्टूबर 2, 2020

"मुझे विदेश मामलों की भारतीय परिषद द्वारा "गांधी और विश्व" विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार में विदाई भाषण देते हुए हर्ष की अनुभूति हो रही है।

मैं गांधीजी की 150वीं जयंती को मनाने के लिए आयोजित किए गए दो वर्षीय उत्सव के समापन अवसर पर आईसीडब्ल्यूए द्वारा गांधीजी पर आयोजित इस कार्यक्रम की सराहना करता हूं।

इन दो दिनों के दौरान, इस सेमिनार में गांधीजी के सिद्धांतों और दुनिया भर में उनके प्रभाव तथा उनकी प्रासंगिकता को दर्शाया गया। गांधीवादी मूल्य शाश्वत हैं। वे सभी देशों के लिए और हर काल के लिए प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। हालांकि, वे नई चुनौतियों का सामना कर रहे विश्व में अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं।

कोविड-19 महामारी के मद्देनजर विश्व सबसे बड़े स्वास्थ्य संकटों में से एक संकट का सामना कर रहा है। 1918 में स्पेनिश फ्लू के दौरान विश्व के समक्ष जब इसी प्रकार की चुनौती पैदा हुई थी, तो गांधीजी ने सभी लोगों विशेष रूप से गरीबों और वंचितों के दर्द को समझने की आवश्यकता के बारे में उल्लेख किया था।

जबकि सामाजिक दूरी, व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता और मास्क पहनना आज के दौर के महत्वपूर्ण मानदंड बन गए हैं, तो महात्मा द्वारा तत्कालीन महामारी के दौरान लिखी गई बातों को स्मरण करना उपयुक्त होगा: "एक बार फिर काले बादल उमड़-घुमड़ रहे हैं। यदि हमारे लोग निम्नलिखित नियमों का ध्यान रखें तो यह उनके लिए अत्यधिक लाभकारी होगा अन्यथा उनको काफी नुकसान उठाना पड़ेगा"- उन्होंने उस समय वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती से खुद को बचाने के लिए आवश्यक मानदंडों का उल्लेख करते हुए उनका वर्णन किया था।

ये सही अर्थों में परीक्षण का समय है। महामारी ने विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर अकल्पनीय कहर बरपाया है और लोगों के जीवन विशेष रूप से गरीब और हाशिये पर रहने वाले वर्गों के जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। ये समय जरूरतमंदों की मदद करने और उनकी कठिनाई को कम करने का है। जैसा कि स्पैनिश फ्लू के दौरान लोगों के दर्द को समझने की आवश्यकता के बारे में महात्मा द्वारा कहा गया है, वर्तमान समय गरीबों के प्रति सहानुभूति का नहीं अपितु संवेदना दर्शाने का है।

प्रिय बहनों और भाइयों,

जैसा कि आप सभी जानते हैं, महात्मा गांधी के जन्मदिन को संयुक्त राष्ट्र द्वारा 'अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस' के रूप में मान्यता प्रदान की गई है और इसका आयोजन किया जाता है।

यह न केवल महात्मा द्वारा मानवता पर छोड़ी गई अमिट छाप का प्रतीक है, अपितु विश्व को स्तत् तौर पर यह स्मरण कराता है कि प्रगति के लिए शांति एक आवश्यक पूर्व शर्त है।

महात्मा गांधी ने अपने सत्य और अहिंसा के संदेश के माध्यम से दुनिया को अन्याय के खिलाफ संघर्ष की एक नई विधा, जीवन का एक नया तरीका सिखाया।

वे 20वीं शताब्दी में उत्पीड़ितों के लिए प्रकाश की एक किरण बन गए और उनकी मृत्यु के 72 वर्ष बाद वे आज भी एक उम्मीद की किरण बने हुए हैं।

भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराने के लिए सत्याग्रह और अहिंसा के मूल्यों पर आधारित दर्शन के अनुसार किए गए उनके प्रयासों ने देश की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया और दुनिया भर में अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्षों को प्रेरित किया।

आज मुझे यह देखकर प्रसन्नता हुई कि भारत और 14 देशों के विद्वान इस वेबिनार में भाग ले रहे हैं। महात्मा गांधी के जीवन और दर्शन पर आपकी उपस्थिति और कार्य उनके संदेशों, मूल्यों और शिक्षाओं तथा उनकी शाश्वत प्रासंगिकता के महत्व को रेखांकित करते हैं- जो जाति, वर्ग, पंथ, लिंग और भूगोल की बाधाओं से परे हैं।

जबकि सत्याग्रह और अहिंसा महात्मा के दर्शन के दो आधार थे, परंतु महात्मा के जीवन में सबसे अधिक प्रेरणादायक है मानवता की स्वाभाविक भलाई में उनका अटूट विश्वास। महात्मा का मानना था कि लोग बुरे नहीं होते, केवल कर्म बुरे होते हैं।

एक ऐसा विश्व जहां आतंकवाद, युद्ध और जघन्य अपराध की घटनाएं मानवता में हमारे विश्वास को हिला रही हैं, हमें महात्मा द्वारा कही गई बात को सदैव याद रखना चाहिए। उन्होंने कहा था: "आपको मानवता में विश्वास नहीं खोना चाहिए, मानवता एक महासागर है। यदि महासागर की कुछ बूँदें गंदी हैं, तो महासागर गंदा नहीं होता है।"

सत्य, अहिंसा और शांति के सार्वभौमिक सिद्धांत शायद आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। 1948 में महात्मा की हत्या के बाद से दुनिया काफी बदल गई है।

हाइड्रोजन बम के विकास से लेकर जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आतंकवाद से लेकर भौतिकवाद तथा आईटी के असाधारण विकास तक यह विश्व दार्घकालिक विकास की खोज कर रहा है। विश्व दु:साध्य चुनौतियों का समाधान तलाश रहा है।

दुनिया को आज एक आरोग्यकर स्पर्श, एक मानवीय स्पर्श, एक सामंजस्यपूर्ण स्पर्श की आवश्यकता है। गांधीवादी आदर्श विश्व को यह स्पर्श प्रदान कर सकते हैं।

शायद, महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती के अवसर पर उनकी सार्वभौमिक रूप से प्रशंसित विरासत, शिक्षाओं, नैतिकता और सिद्धांतों को याद करने का इससे अधिक प्रासंगिक समय नहीं हो सकता है। जब डा. मार्टिन लूथर किंग से पूछा गया, 'आज गांधी कहां हैं?' तो उन्होंने उत्तर दिया, "गांधी अपरिहार्य है। अगर मानवता को प्रगति करनी है, तो गांधी अपरिहार्य हैं। उन्होंने शांति और सद्भाव की दुनिया विकसित करने के लिए मानवता की दृष्टि से प्रेरित होकर अपना जीवन जिया, विचार किया और कार्य किया। हम केवल अपने जोखिम पर उनकी अनदेखी कर सकते हैं। एक व्यक्ति के रूप में गांधी की जीवन-गाथा प्रत्येक उस मनुष्य के लिए अत्यधिक प्रासंगिक है जो औसत स्तर से ऊपर उठने और एक सार्थक जीवन जीने की आकांक्षा रखता है।"

जब डा. किंग 1959 में भारत पहुंचे तो उन्होंने प्रसिद्व टिप्पणी की थी, “अन्य देशों में मैं एक पर्यटक के रूप में जा सकता हूं, लेकिन भारत में मैं एक तीर्थयात्री के रूप में आता हूं। शायद भारत ही वह भूमि है जहां सबसे पहले अहिंसक सामाजिक परिवर्तन की तकनीक विकसित की गई थी, जिसका पूरे दक्षिण अमेरिका में मेरे देश के लोगों ने मॉन्टगोमरी, अलबामा और अन्य स्थानों पर प्रयोग किया है। हमने उन्हें प्रभावी और स्थायी पाया है - वे वास्तव में काम करती हैं!"

प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर, जिसे भारतीयों द्वारा सम्मानपूर्वक 'गुरुदेव' के रूप में जाना जाता है, ने महात्मा की प्रशंसा करते हुए टिप्पणी की थी कि,"गांधीजी के आह्वान पर भारत उसी प्रकार नई महानता की ओर अग्रसर हुआ, जैसे पूर्व में एक बार जब बुद्ध ने सभी जीवों के बीच सहयोगी भावना और करुणा की सत्यता की उद्घघोषणा की थी।"

महात्मा की महानता उनकी योग्यता और सीखने की इच्छा में निहित है। उन्होंने न केवल दुनिया को गहन रूप से प्रभावित किया, बल्कि दुनिया को समान रूप से अपने विचारों को प्रभावित करने और प्रेरित करने की अनुमति भी दी।

रूसी लेखक लियो टॉल्स्टॉय की पुस्तक 'द किंगडम ऑफ गॉड इज़ विदिन यू' और उनके निबंध 'क्रिस्टियनिटी एंड पैट्रियोटिज्म' ने गांधीजी पर गहरी छाप छोड़ी, जबकि उनके 'जीवन की सादगी' और 'प्रयोजन की शुद्धता’ के सिद्धांतों ने उन्हें अत्यधिक प्रभावित किया। उन्होंने यह भी लिखा कि पुस्तक पढ़ने से अहिंसा में उनका विश्वास कैसे सुदृढ़ हुआ।

जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया है, महात्मा के विचार और सिद्धांत मानवता के सामने दीर्घकालिक विकास और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने से लेकर आतंकवाद से मुकाबला करने तक की विभिन्न चुनौतियों से निपटने के लिए लिए पथप्रदर्शक का कार्य करते रहेंगे।

वह सहयोग और सहकारिता में विश्वास करते थे, जो आज एक वैश्विक आवश्यकता है - चाहे महामारी से लड़ने की बात हो या गरीबी से लड़ने की बात हो। उन्होंने सुविदित तौर पर कहा था: "हर किसी की ज़रूरत के लिए पर्याप्त है, लेकिन लालच के लिए नहीं" और उनके विश्वास कि "पृथ्वी, वायु, भूमि और जल हमारे पूर्वजों से विरासत नहीं, अपितु हम पर बच्चों का ऋण हैं" को ऐसे दौर में दीर्घकालिक विकास को आगे बढ़ाने के लिए स्मरण किया जाना चाहिए जब अत्यधिक पर्यावरणीय शोषण के कारण त्रासदी बढ़ रही है।

महात्मा गांधी के दर्शन और सर्वोदय की उनकी अवधारणा हमारी सरकार, जो एक शांतिपूर्ण और समृद्ध भारत सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है, के लिए निरंतर मार्गदर्शक रही है । स्वच्छता पर महात्मा द्वारा दिए गए बल को आगे बढ़ाने के लिए प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी जी ने देश भर में स्वच्छ शहरों और गांवों के लक्ष्य को अनुभूत करने के लिए स्वच्छ भारत अभियान प्रारंभ किया।

सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याओं से ग्रस्त विश्व में गांधीवादी आदर्शों को पुनर्जीवित करना समय की मांग है।

अंत में, अपनी बात समाप्त करने से पहले, मैं इस वेबिनार में भाग लेने वाले सभी विद्वानों को बधाई देता हूं। कई देशों की भागीदारी समकालीन दुनिया के लिए गांधीजी की विरासत की प्रासंगिकता को रेखांकित करती है।

मैं दक्षिण अफ्रीका, म्यांमार, रूस, सिंगापुर, ओमान, श्रीलंका, इटली, जर्मनी, मैक्सिको, ब्राजील, अर्जेंटीना, कोस्टा रिका, उज्बेकिस्तान और चीन के सभी विद्वानों को उनके ज्ञानवर्धक कार्यों के लिए हार्दिक बधाई देता हूं।

जय हिन्द!"