01 मार्च, 2019 को हैदराबाद में आंध्र विद्यालय कॉलेज ऑफ आर्ट्स, साइंस एंड कॉमर्स के प्लेटिनम जुबली समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

हैदराबाद | मार्च 1, 2019

"मुझे आज हैदराबाद में आंध्र विद्यालय कॉलेज ऑफ आर्ट्स, साइंस एंड कॉमर्स के प्लेटिनम जयंती समारोह में भाग लेने पर बहुत प्रसन्नता हो रही है।

किसी भी संस्थान के लिए 70 साल पूरा करना एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। सात दशकों की यह यात्रा गुणवत्ता शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य के प्रति संस्थान की अटूट प्रतिबद्धता का प्रमाण है।

मुझे सूचित किया गया है ए. वी. एजुकेशन सोसायटी की स्थापना वर्ष 1944 में की गई थी, जिसका उद्देश्य क्षेत्र के पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा के अवसर उपलब्ध करना था।

इस सोसायटी ने क्षेत्र में छात्रों को स्नातक स्तर तक की शिक्षा प्रदान करने के लिए 1968 में ए. वी. कॉलेज की शुरुआत की और बाद में स्नातकोत्तर शिक्षा प्रदान करने के लिए इसका विस्तार किया।

पिछले सात दशकों में, संस्था ने कई प्रतिष्ठित भारतीय दिए हैं जो इस देश की बड़ी सेवा कर रहे हैं। यह उल्लेखनीय है कि इसके कई पूर्व छात्र भारत और विदेश में कई संगठनों के शीर्ष पदों पर हैं।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति सुभाष रेड्डी; पहली महिला सेना अधिकारी, कैप्टन के. उषा; राष्ट्रीय बैडमिंटन कोच, पुलेला गोपीचंद; ओलंपियन और चैंपियन शूटर, गगन नारंग और कई अन्य सफल व्यक्ति इस महान संस्थान के पूर्व छात्र हैं।

यह देखकर खुशी होती है कि अपने विज़न कथन में, संस्थान उत्कृष्टता की खोज के माध्यम से व्यक्तियों के सशक्तिकरण की परिकल्पना करता है।

मेरी प्रिय बहनों और भाइयों,

यह भारत का सौभाग्य है कि उसके पास एक बड़ी जनसांख्यिकीय पूंजी है।

2020 तक भारत भारत में आबादी की माध्य आयु मात्र 28 होगी जबकि उसकी तुलना में चीन और अमेरिका में यह 37, पश्चिमी यूरोप में यह 45 और जापान में यह 49 होगी।

आर्थिक विकास में जनसांख्यिकी एक बड़ा परिवर्तन ला सकता है और यह आर्थिक विकास की गति और स्वरूप को बदल सकता है।

मेरा मानना है कि ये ऊर्जावान आविष्कारशील और उद्यमी युवा ही भारत की समृद्धि की यशस्वी गाथा लिखेंगे।

लेकिन बहुत कुछ इस बात पर निभर करता है कि श्रमजीवी जनसंख्या में जुड़ रहे नए लोगों को ठीक से शिक्षित और प्रशिक्षित किया जा सकता है या नहीं। भारत को उन 10 मिलियन अतिरिक्त लोगों को रोजगार देने के लिए पयाप्त नौकरियों का सृजन करना है जो हर साल श्रम बल में शामिल होने के लिए तैयार होते हैं।

भारत को लोगों में अधिक से अधिक कुशलता से निवेश करना होगा।

स्वास्थ्य सेवा, गुणवत्ता शिक्षा, नौकरियों और कौशल के माध्यम से जनता कल्याण हेतु निवेश करने से मानव पूंजी का निर्माण करने में मदद मिलती है, जो आर्थिक विकास का समर्थन करने, अत्यधिक गरीबी को समाप्त करने और अधिक समावेशी समाज बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।

मानव पूंजी पहले से ही वैश्विक धन का सबसे बड़ा घटक है और भारत की संपत्ति के सबसे महत्वपूर्ण और तेजी से बढ़ते घटकों में से एक है।

विश्व बैंक सहित कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का मानना है कि वास्तव में, भारत में दुनिया की मानव संसाधन राजधानी बनने की क्षमता है।

यद्यपि भारत ने मानव विकास के क्षेत्र में काफी प्रगति की है, फिर भी यह अशिक्षा, माध्यमिक शिक्षा में आने वाले बड़ी बाधाएं, कम गुणवत्ता वाली सार्वजनिक सेवाओं और लैंगिक भेदभाव जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है।

भारत सरकार ने भारत में उच्च शिक्षा की बेहतरी के लिए कई सक्रिय पहलें की है।

'स्वयं प्रभा' कार्यक्रम जो 32 डीटीएच चैनलों के माध्यम से यह उपग्रह संचार का उपयोग करते हुए, उच्च गुणवत्ता वाली शैक्षिक सामग्री को सबसे पिछड़े क्षेत्रों में पहुंचाती है, से लेकर, 'राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी (एनडीएल)' तक जो सीखने के संसाधनों का एक वर्जुअल भंडार है, ऐसी कई नवोन्मेषी पहलें अब भारतीय उच्च शिक्षा को परिभाषित करती है।

सरकार ने सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में कई "इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस" (आईओई) के निर्माण के लिए एक मिशन भी शुरू किया है, ताकि वे सर्वश्रेष्ठ वैश्विक संस्थानों में गिने जाएं, जिससे भारत उच्च शिक्षा के लिए दुनिया के एक पसंदीदा गंतव्य होने का दर्जा प्राप्त कर सकेगा।

हम 'स्मार्ट इंडिया हैकाथॉन' जैसे कई उत्साहवर्धक, अभिनव विचारों को भी लेकर आए हैं, जो व्यापक रूप से समाज को पेश आने वाली सामान्य समस्याओं के समाधान खोजने के लिए नई सोच को बढ़ावा देते हैं।

समय आ गया है कि भारत एक और अधिक प्रभावी शिक्षा योजना को आगे बढ़ाए, जिसमें मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्सेस और वर्चुअल क्लासरूम जैसे नई प्रौद्योगिकी से संबंधित अवसरों का यथासंभव दोहन किया जा सके।

कोई भी देश अपनी कामकाजी आबादी जिसमें महिला और पुरुष दोनों शामिल हैं, की पूर्ण भागीदारी के बिना अपनी पूर्ण क्षमता प्राप्त नहीं कर सकता और 21वीं सदी की कठिन चुनौतियों का सामना नहीं कर सकता है।

महिलाओं के साथ भेदभाव का आर्थिक विकास पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।

लैंगिक संवेदनशीलता के जरिए लैंगिक समानता और महिलाओं की सुरक्षा पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। लैंगिक संवेदनशीलता घर, स्कूलों और कॉलेजों में शुरु होनी चाहिए।

मैं इस संस्थान से आग्रह करता हूं कि वह अधिक से अधिक युवतियों को उच्च शिक्षा के अवसरों का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु यथासंभव प्रयास करें।

यह वक्त है कि हम उच्च शिक्षा के प्रति अपने दृष्टिकोण और अपनी कार्यनीति का पुन:आंकलन और पुनर्मूल्यांकन करें।

इस बात के बावजूद कि हमने अपनी शिक्षा प्रणाली का काफी विस्तार किया है और पहले से कहीं अधिक युवा स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ रहे हैं, आज भी स्पष्ट रूप से गुणवत्ता की कमी है।

शिक्षा प्राप्ति सर्वेक्षण अधिगम में महत्वपूर्ण कमियों की ओर इंगित करते हैं।

जबकि भारत में कुछ विश्वस्तरीय संस्थान हैं, जो उच्च शिक्षा प्रदान करते हैं, हमारे देश में बड़ी संख्या में औसत दर्जे के संस्थान भी चल रहे हैं।

2015 में विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग कॉलेजों, प्रबंध संस्थानों आदि के संस्थानों के लिए एक विशाल रैकिंग अभ्यास, राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) शुरू किया गया था।

यह भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में जवाबदेही और पारदर्शिता लाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

बेरोजगारी के अलावा, भारत को लोगों के नियोजनीय न होने की समस्या का भी सामना करना पड़ रहा है।

नौकरी उपलब्ध होने के बावजूद, नौकरी के लायक सही कौशल वाले उम्मीदवार उपलब्ध नहीं होते हैं।

इस मुद्दे से निपटने के लिए, अक्तूबर 2016 में, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना 2.0 शुरू की गई है। इसका लक्ष्य 4 वर्षों की अवधि में 10 मिलियन युवाओं को प्रशिक्षित करना है। अपनी शुरूआत के बाद से, इसने 3.5 मिलियन से अधिक युवाओं को प्रशिक्षित और प्रमाणित किया है।

वक्त आ गया है कि हम पढ़ाई, लेखन और आरंभिक गणित में अधिगम परिणामों में सुधार करने के अलावा स्कूलों में व्यावसायिक शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करें।

पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धति दोनों के संदर्भ में शिक्षा गुणवत्ता को भी नए सिरे से परिभाषित और परिष्कृत करने की आवश्यकता है।

हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे युवा नौकरी के लिए तैयार हैं।

हमें उन्हें रोजगार सृजन करने हेतु सक्षम बनाने के लिए उद्यमिता कौशल से लैस भी करना होगा।

हमें अपने उच्च शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए डिजिटल क्रांति की असीम संभावनाओं का पूरी तरह से दोहन करना होगा।

हमें अपने युवाओं को इस प्रौद्योगिकी का प्रयोग करने और यथासंभव सीमा तक इसकी क्षमता का उपयोग करने के लिए तैयार करना होगा।

हमें शिक्षा तक समान पहुंच पर भी ध्यान देने की ज़रूरत हैं। महिलाओं और बालिकाओं, अनुसूचित जातियों और जनजातियों, दिव्यांगों और अल्पसंख्यक समूहों को उच्च शिक्षा तक एक बाधा मुक्त और समान पहुंच प्रदान करने की आवश्यकता है।

भारत, सामाजिक न्याय और शिक्षा के लिए समान अवसरों जैसे आदर्शों के प्रति दृढ़ता से समर्पित है जो कि सामाजिक लोकतंत्र को प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहला कदम है।

हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों को वैश्विक उत्कृष्टता के केन्द्र बनाने के लिए, हमें स्वयत्ता और गुणवत्ता को बढ़ावा देने और इन संस्थानों के लिए ऐसा समर्थकारी वातावरण बनाने का प्रयास करना चाहिए जिससे वे उत्कृष्टता हासिल करने हेतु बपनी अलग राह बना सके।

हमें दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों के साथ सार्थक सहयोग रखना चाहिए और हमारी आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षण, अनुसंधान और पाठ्यक्रम में उनके द्वारा अपनाई गई सर्वोत्तम प्रथाओं को सीखना और उन्हें अपनाना चाहिए।

हमने पहले ही भारतीय छात्रों और शिक्षकों को, दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ अकादमिक और उद्योग विशेषज्ञों के साथ बातचीत करने का अवसर प्रदान करने के लिए गलोबल इनिशियेटिव ऑफ एकेडेमिक नेटवर्क्स (जीआईएएन) शुरू कर दिया है।

इस तरह की कई और साझेदारियों को बढ़ावा दिया जाना है।

हमें शिक्षकों को अत्यधिक सक्षम बनाने के लिए उन्हें प्रशिक्षण प्रदान करने हेतु काफी मात्रा में संसाधनों का निवेश करना होगा।

हमारा शिक्षा क्षेत्र नई चुनौतियों का सामना कर रहा है और हमें ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है जो इनसे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए सक्षम हों।

जबकि मैं मानता हूं कि शिक्षा से रोजगार और आजीविका की सुरक्षा प्राप्त होनी चाहिए, लेकिन मैं यह नहीं मानता कि नौकरी ही शिक्षा का अंतिम उद्देश्य है।

हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम अपने स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जो शिक्षा प्रदान करते हैं, वह व्यक्ति को आत्म खोज, ज्ञान और जागृति की ओर ले जाए।

शिक्षा को छात्र के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित करके उसे समग्र रूप से सशक्त बनाना होगा।

शिक्षा को एक मजबूत चरित्र का निर्माण करना होगा और नेतृत्व गुणों के अलावा छात्रों में नैतिक मूल्यों का विकास करना होगा और उन्हें आवश्यक जीवन कौशल भी प्रदान करने होंगे।

शिक्षा को व्यक्ति का श्रेष्ठ पक्ष बाहर लाना चाहिए और उसे ज्ञान और सशक्तिकरण तक ले जाना चाहिए।

यह सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का एक साधन है।

शिक्षा सतत, आजीवन सीखने की प्रक्रिया है और यह एक डिग्री प्राप्त करने पर ही समाप्त नहीं होती है।

प्रिय छात्रों,

हमेशा अपने चुने हुए ज्ञान क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने का लक्ष्य रखें और इस हेतु प्रयास करें।

अस्थायी असफलताओं से कभी भी हतोत्साहित न हों क्योंकि हर अनुभव जीवन में एक नया सबक सिखाता है।

सभी स्थितियों में समभाव बनाए रखें, आत्मविश्वासी बनें लेकिन अहंकारी नहीं।

यह दुनिया अवसरों से भरी है। आपको उनका लाभ उठाना चाहिए। जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने सौ साल पहले कहा था- "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक आपका लक्ष्य पूरा न हो जाए"।

मुझे उम्मीद है कि ए. वी. कॉलेज गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के अपने प्रयास में सफल होगा।

मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप वैश्विक नागरिक तैयार करने की पूरी कोशिश करें, जो 21वीं सदी की प्रतिस्पर्धी, तेज गति वाली दुनिया की किसी भी चुनौती से निपटने के लिए अच्छी तरह से तैयार है।

मैं आप सभी को आपके भविष्य के प्रयासों के लिए बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

धन्यवाद।

जय हिन्द।"