01 अगस्त, 2019 को नई दिल्ली में जानकी देवी स्मारक कॉलेज के हीरक जयंती समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु द्वारा दिया गया भाषण

नई दिल्ली | अगस्त 1, 2019

“जानकी देवी स्मृति कॉलेज के संस्थापना दिवस के इस अविस्मरणीय अवसर पर आप सभी विद्यार्थियों, शिक्षकों, कॉलेज प्रशासन तथा गणमान्य अतिथियों के साथ सम्मिलित हो कर, इस कॉलेज के हीरक जयंती समारोह का उद्घाटन करते हुए, अत्यंत हर्ष का अनुभव कर रहा हूं।

मुझे यह जान कर प्रसन्नता हुई है कि जानकी देवी स्मृति कॉलेज का उद्देश्य ही बालिकाओं को अच्छी शिक्षा प्रदान कर,उन्हें आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना है जिससे वे समाज और वृहत्तर विश्व के उत्थान में सार्थक योगदान दे सकें।

इस महाविद्यालय के संस्थापक श्री बृज कृष्ण चंदीवाला जी, जिन्हें स्नेहपूर्वक भाई जी भी कहते थे, एक दूरदृष्टा थे। गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित, यह उन्हीं की दृष्टि थी कि बेटियों को विशेषकर दुर्बल वर्ग की बेटियों को अच्छी शिक्षा प्रदान की जाए।

उन्होंने करोल बाग के पास का व्यापार क्षेत्र महिलाओं के लिए कॉलेज स्थापित करने के लिए चुना क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि व्यापार वर्ग की महिलाओं में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है। उनका मानना था कि उच्च वर्ग के लिए शिक्षा आसानी से सुलभ थी और अधिक कठिन चुनौती यह थी कि वंचितों और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को गुणवत्तापूर्ण, सस्ती शिक्षा प्रदान की जाए।

मुझे यह जानकर हर्ष हो रहा है कि आज जेडीएमसी दिल्ली विश्वविद्यालय के सबसे विशिष्ट कॉलेजों में से एक है। मुझे यह जानकर हर्ष है कि जेडीएमसी के पास उत्कृष्ट सुविधाएं है जो अपने छात्रों के लिए शैक्षिक और पाठयक्रम संबंधी रुचियों का अनुसरण करने के लिए एक सर्वांगीण वातावरण प्रदान करता है।

इस कॉलेज की छात्राओं, जिनमें से कई, मेरा मानना है कि मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आती हैं, ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई और राष्ट्र के लिए सार्थक योगदान दिया है।

इस प्रकार, इस संस्था ने छह दशकों तक छात्राओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त की है।

मुझे विशेष प्रसन्नता इस बात की है कि इस महाविद्यालय का महिला विकास केन्द्र, एनसीसी, एनएसएस, तथा गांधी स्टडी सर्किल सामाजिक मुद्दों जैसे कानूनी शिक्षा,महिला स्वास्थ्य और सशक्तिकरण, प्रौढ़ शिक्षा आदि में छात्राओं को प्रशिक्षित करते हैं जिससे उनमें सामाजिक जागृति का विकास हो।

मुझे यह भी बताया गया है कि आर्थिक रूप से दुर्बल छात्रों की हर प्रकार से मदद करने के लिए महाविद्यालय में समान अवसर प्रकोष्ठ स्थापित किया गया है, जिसके तहत निःशुल्क भोजन भी उपलब्ध कराया जाता है। दिव्यांग छात्राओं की विशेष आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी अनुकूल परिवेश उपलब्ध कराने के लिए मैं जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज की सराहना करता हूं। सर्वसमावेशी शिक्षा प्रदान करने की दिशा में आपके निष्ठा पूर्ण प्रयास का मैं अभिनंदन करता हूँ।

एक सक्रिय पर्यावरण कार्यक्रम के माध्यम से पर्यावरण-हितैषी पहलों की जागरूकता का प्रचार करने के लिए कॉलेज की प्रशंसा करता हूं।

कॉलेज में स्थित वर्षा जल संचयन प्रणाली की गणना सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरनमेंट द्वारा दिल्ली के बेहतरीन उदाहरणों में की गई है। यह जरूरी है कि ऐसे प्रयासों के माध्यम से युवा विद्यार्थियों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए।

मेरे प्यारे भाइयों और बहनों,

शिक्षा का उद्देश्य मेरे हृदय के बेहद करीब है। अपने कार्यकाल के दो वर्षों में मैंने पूरे देश की यात्राएं की हैं और छात्रों एवं शिक्षकों के साथ बातचीत की है और संवाद किया है।

स्वामी विवेकानंद के अनुसार, "शिक्षा का अर्थ उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा चरित्र का निर्माण होता है, बुद्धि की शक्ति बढ़ती है और ज्ञान में तीव्रता आती है जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति सक्षम बनता है।"

राष्ट्र की प्रगति शिक्षा की नींव पर निर्भर करती है। आज, भारत जनसांख्यिकीय लाभांश के कगार पर खड़ा है जहां इसकी जनसंख्या के 65 प्रतिशत भाग की आयु 35 वर्षों से कम है। यह देश के त्वरित विकास के लिए एक अभूतपूर्व अवसर है।

राष्ट्र के समग्र और समावेशी विकास को प्राप्त करने के लिए इस लाभांश को परिवर्तित करने का एकमात्र रास्ता हमारे युवा लोगों को अच्छी गुणवत्ता वाली और वहनीय शिक्षा प्रदान करना है।

हमारे स्कूलों और विश्वविद्यालयों को उत्कृष्टता का ऐसा केंद्र होना चाहिए जहां ज्ञान प्रदान किया जाता है, कौशल का सम्मान किया जाता है, चरित्र का निर्माण किया जाता है, जिज्ञासा प्रेरित होती है और नैतिकता को दृढ़ किया जाता है। हालाँकि, समय की आवश्यकता हमारी शिक्षा प्रणाली को पुनर्जीवित करने की है।

हम एक अप्रचलित और पुरानी पड़ चुकी शैक्षिक प्रणाली का और सहारा नहीं ले सकते हैं जो कि मध्यमता, रटंत विद्या को बढ़ावा देती है और रचनात्मकता का गला घोंटती है और भविष्य में हमें आगे बढ़ाने के बजाय हमें पीछे की ओर खींचती है।

हमारे शिक्षण संस्थानों को यथास्थिति से बचना चाहिए और बदलते समय के अनुसार परिवर्तन लाना चाहिए। हमें अपने पाठ्यक्रम, शिक्षण पद्धति और अनुसंधान सुविधाओं का निरंतर और निष्पक्ष मूल्यांकन करना होगा। हमें निरंतर अद्यतन और उन्नयन करते रहना होगा।

हमें यह भी समझना होगा कि केवल शिक्षा से कोई व्यक्ति रोजगार प्राप्त नहीं कर सकता। शैक्षिक संस्थानों को छात्रों को 21वीं सदी के ज्ञान संचालित, परस्पर संबद्ध होते जा रहे विश्व के लिए महत्वपूर्ण जीवन कौशल सहित आवश्यक कौशल प्रदान करने चाहिए।

स्कूलों और कॉलेजों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे देश के बच्चे और युवा ऐसा ज्ञान और कौशल प्राप्त करें जो उन्हें एक नए भारत और नई दुनिया के निर्माण में सक्रिय योगदान देने में सक्षम बनाए।

उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नींव मजबूत हों। हमें जिस चीज की जरूरत है वह है देखने और आत्मसात करने की क्षमता, उसे आत्मसात करने और अभिव्यक्त करने, सवाल पूछने और जवाब मांगने, समझने और खोज करने की क्षमता। यह भी सर्वोपरि महत्व की बात है कि हमारे बच्चों को यह सुनिश्चित करने के लिए एक 'नैतिक दिशासूचक’ से लैस होना चाहिए जिस से वे कभी भी सही मार्ग से विचलित न हों

कोठारी आयोग ने यह टिप्पणी की है कि " “किसी देश की महानता उसके क्षेत्र की सीमा, उसके संचार की अवधि या उसकी संपदा की मात्रा पर निर्भर नहीं करती है, बल्कि जीवन के उच्च मूल्यों के लिए प्यार पर निर्भर करती है। सभी को गरीब और पीड़ित लोगों के लिए, महिलाओं के लिए सम्मान और आदर की भावना, भाईचारे में विश्वास, जाति, रंग, धर्म आदि की परवाह किए बिना विकसित करनी चाहिए।

हमारे शैक्षणिक संस्थानों को समानता और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना चाहिए और ज्ञान के प्रसार के माध्यम से सामाजिक और सांस्कृतिक अंतर को कम करना चाहिए।

हमें यह भी महसूस करना चाहिए कि वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी प्रगति के इस युग में, मिथ्या धर्म और अंध विश्वास के लिए कोई जगह नहीं है। देश में अनुसंधान और नवाचार की संस्कृति को बढ़ाने के लिए कम उम्र के बच्चों के बीच एक वैज्ञानिक प्रवृत्ति पैदा करना महत्वपूर्ण है।

मेरे प्यारे युवा मित्रों,

मैं महिला सशक्तिकरण और बालिकाओं को शिक्षित करने की आवश्यकता का भी प्रबल पक्षधर रहा हूं।

मेरा दृढ़ता पूर्वक यह मानना है कि महिलाओं की क्षमताओं में निवेश करना और उन्हें सशक्त बनाना आर्थिक विकास और समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण है। 'सभी के लिए शिक्षा' सभी सरकारों की प्राथमिक नीति रही है। हमने आजादी के बाद सात दशकों में शिक्षा में महत्वपूर्ण प्रगति की है।

1947 में हमारी साक्षरता दर 12 प्रतिशत थी जो 2011 में बढ़कर 74.04 प्रतिशत हो गयी है।

दुर्भाग्यवश, पुरुषों और महिलाओं की साक्षरता दर के बीच का अंतर बहुत अधिक है। 2011 की जनगणना के अनुसार, पुरुषों की साक्षरता दर 82.14 प्रतिशत थी जबकि महिलाओं में यह 65.46 प्रतिशत थी।

हालांकि यह अंतर कम होता जा रहा है और 2011 से पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाएं साक्षर हो गई हैं, फिर भी हमें अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है।

भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने और विश्व में नेतृत्व की स्थिति प्राप्त करने के सपने की आकांक्षा रखता है इसलिए यह शिक्षा के महत्व और महिलाओं के सशक्तिकरण की उपेक्षा नहीं कर सकता।

भारत के मानव संसाधन का लगभग 50 प्रतिशत महिलाएं हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने हाल ही में अनुमान लगाया है कि पुरुषों की संख्या में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी बढ़ाने से भारत में सकल घरेलू उत्पाद में 27 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है। यदि 50% कुशल महिलाएं कार्य बल में शामिल हो सकती हैं, तो भारत अपनी वृद्धि दर एक वर्ष में 1.5 प्रतिशत अंक से 9 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि उसकी महिलाएं कार्यबल में योगदान दें।

महिलाओं का सशक्तिकरण उन्हें चुनौतियों का जवाब देने, परिवार के भीतर उनकी स्थिति में सुधार लाने और निर्णय लेने में भाग लेने के लिए सक्षम बनाता है। आज एक सुखी परिवार और एक स्वस्थ और मजबूत समाज महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना कायम नहीं रह सकता है।

वर्तमान सरकार भी महिला सशक्तिकरण को बड़ी प्राथमिकता देती है। कुछ दिन पहले राज्य सभा में पारित मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2019 का उद्देश्य महिलाओं के लैंगिक अधिकारों और न्याय को सुनिश्चित करना है।

विधेयक का पारित होना वास्तव में भारत के विधायी इतिहास में एक महान क्षण है। यह एक प्रमुख सामाजिक सुधार विधेयक है जो मुस्लिम महिलाओं को न्याय सुनिश्चित करने में एक लंबा रास्ता तय करेगा। मैं इस महत्वपूर्ण विधेयक को पारित करने के लिए सभी सांसदों की सराहना करता हूं।

यह एक ऐसे देश के लिए लंबे समय से अपेक्षित था जिसने लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समानता के अपने गहरे सिद्धांतों पर बहुत गर्व किया है।

महिलाओं की साक्षरता सिर्फ आर्थिक अवसरों तक ही सीमित न होकर उस से अधिक है। महिलाओं के बीच ज्ञान और जागरूकता बढ़ाने से समाज पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, साक्षरता का सीधा संबंध स्वास्थ्य और शिशु मृत्यु दर से है। केरल में सबसे अधिक महिला साक्षरता दर और सबसे कम शिशु मृत्यु दर है जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में महिला साक्षरता दर कम है और शिशु मृत्यु दर उच्च है।

यह देखा गया है कि महिला शिक्षा का गरीबी उन्मूलन और स्थायी विकास पर अधिक गहरा और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

मैं आशा करता हूं कि जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज की तरह और भी संस्थान आगे आएं और हमारी बेटियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकाधिक अवसर उपलब्ध कराएं।

मैं एक बार पुनः जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज को इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए बधाई देता हूं और आपके भावी प्रयासों की सफलता के लिए शुभकामनाएं देता हूं।

धन्यवाद!

जय हिन्द!