बुधवार, 4 अक्तूबर, 2017 को आचार्य एन. जी. रंगा कृषि विश्वविद्यालय के 49वें दीक्षांत समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु का अभिभाषण।

आंध्र प्रदेश | अक्टूबर 4, 2017

आंध्र प्रदेश के माननीय राज्यपाल और आचार्य एन. जी. रंगा कृषि विश्वविद्यालय (ए.एन.जी.आर.ए.यू.) के कुलाधिपति श्री ई. एस. एल. नरसिम्हन गारू; एएनजीआरएयू के कुलपति डा. वी. दामोदर नायडु, प्रबंधन बोर्ड के सदस्यगण, शैक्षिक परिषद के सदस्यगण, विश्वविद्यालय के अधिकारीगण एवं कर्मचारीवृंद, गणमान्य अतिथिगण, प्यारे विद्यार्थियों, आदरणीय अभिभावकगण, प्रेस और मीडिया के प्रतिनिधिगण, देवियो और सज्जनो:

इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के 49वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करना मेरे लिए गर्व का विषय है। मैं इस अवसर पर सभी विद्यार्थियों, स्वर्ण पदक विजेताओं, और पुरस्कार प्राप्तकर्त्ताओं को हार्दिक बधाई देता हूँ, जो इस अवसर पर अपनी डिग्रियां प्राप्त कर रहे हैं। यह आपकी उपलब्धियों पर उत्सव मनाने और साथ ही प्रेरणा ग्रहण करने का क्षण है। यह वह क्षण है, जिसने आपको अपना पसंदीदा पेशा ग्रहण करने की दिशा में अग्रसर किया है और आपकी आकांक्षाओं को पूरा करने में सहायता प्रदान की है।

आपने कृषि वैज्ञानिक बनने का जो संकल्प लिया है, उसकी भारत जैसे एक ऐसे देश में काफी प्रासंगिकता है, जहां कृषि परिस्थितिकीय विविधताएं तो विपुल मात्रा में मौजूद हैं ही; साथ ही साथ जहां ग्रामीण क्षेत्रों का 64 प्रतिशत कार्यबल कृषि कार्यों में लगा हुआ है और जो कुल ग्रामीण निवल घरेलू उत्पाद में 39 प्रतिशत का योगदान देता है। कृषि भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में मत्स्य-पालन और वानिकी के साथ कृषि का योगदान सबसे अधिक है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सी एस ओ) के द्वितीय विवेचित आकलन के अनुसार 2016-17 के दौरान कृषि और संबद्ध क्षेत्रों (कृषि, पशुधन, वाणिकी और मत्स्य-पालन सहित) का हिस्सा वर्ष 2011-12 के मूल्यों पर सकल संवर्धित मूल्य (जीवीए) का 17.3 प्रतिशत तक होने की संभावना है।

स्वाधीनता प्राप्ति के बाद के सत्तर वर्ष उल्लेखनीय विकास के वर्ष रहे हैं। देश का खाद्यान्न उत्पादन 8.7 प्रतिशत बढ़ गया और 2016-17 में 273.83 मिलियन टन की रिकॉर्ड उंचाई पर पहुंच गया।

जैसा कि खाद्य और कृषि संगठन ने भी स्वीकार किया है:

"भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध, दाल और जूट उत्पादक देश है और चावल, गेंहू, गन्ना, मूंगफली, सब्जियों, फल और कपास का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। भारत का खाद्यान्न उत्पादन 1950 के 50 मिलियन टन की तुलना में 2014-15 में पांच गुना से भी ज्यादा बढ़कर 257 मिलियन टन से भी अधिक हो गया है। भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है, जहां प्रतिवर्ष 130 मिलियन टन से भी अधिक दुग्ध उत्पादन होता है। दुग्ध उत्पादन क्षेत्र ग्रामीण जनता, विशेषकर महिलाओं को रोजगार प्रदान करने का सबसे बड़ा क्षेत्र भी है। 10 मिलियन टन से भी अधिक के वार्षिक उत्पादन के साथ भारत विश्व मत्स्य उत्पादन और मत्स्य पालन में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है।"

तथापि, हमारे समक्ष विकट चुनौतियां मौजूद हैं।

देश में गेंहू को छोड़कर अन्य फसलों की उत्पादकता सिंचाई सुविधा और विकसित प्रौद्योगिकी की कमी के कारण विश्व औसत उत्पादन से भी कम है।

एक अनुमान के अनुसार, "2022 तक किसानों की आय दुगुनी करने के लिए विकास के विभिन्न स्रोतों में 33 प्रतिशत तक वृद्धि करनी होगी।"

स्पष्टत:, उन मामलों पर ठोस, समन्वित रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है जो कृषि क्षेत्र और उन लोगों के जीवन स्तर को प्रभावित करते हैं जो मुख्यत: इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। वर्तमान समय में मौजूद खाद्य सुरक्षा संबंधी हालात के बारे में हम आत्मसंतुष्ट नहीं हो सकते हैं। हमारे देश की बढ़ती जनसंख्या की बढ़ती आवश्यकताओं को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि हम स्वयं की खाद्य सुरक्षा संबंधी नीति विकसित करें। बढ़ा हुआ उत्पादन और खाद्यानों का समुचित वितरण हमारे देश को भूख की समस्या को पूर्णतया दूर करने और सभी के लिए पर्याप्त पोषण की लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर कर सकता है।

हमारे माननीय प्रधान मंत्री ने 2022 तक भारतीय किसानों की आय दुगुनी करने की बात कही है। इस संदर्भ में केंद्र सरकार और राज्य सरकारें, दोनों विभिन्न तरह की पहल कर रही हैं। मेरी नजर में, हमें द्विआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। इनमें से पहला दृष्टिकोण आद्योपांत (ई2ई) परिस्थितिकी तंत्र उपलब्ध करवाना है, जिसमें 'इरिगेशन' (सिंचाई), 'इंफ्रास्ट्रक्चर' (अवसंरचना), 'इंवेस्टमेंट क्रेडिट' (निवेश ऋण) और 'इंश्योरेंस' (बीमा) सम्मिलित है; जिसे मैं 4-आई (4-I) की संज्ञा देता हूं। दूसरा है प्रौद्योगिकी का प्रयोगशाला से भूमि (लैब टू लैण्ड-एल 2 एल) तक स्थानांतरण है।

मैं कार्य के प्रथम पहलू की बात करता हूं। उत्तरोत्तर सरकारें परिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ करने के लिए कई सुधारात्मक उपाय करती रहीं हैं, परंतु मुझे लगता है कि ज्यादा समयबद्ध, व्यवस्थित और सर्वांगी प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। नि:संदेश, सिंचाई एक अति महत्वपूर्ण कारक है। वर्षा जल संरक्षण और रोधक बाँधों के निर्माण के अलावा सरकार सिंचाई के अधीन भूमि के विस्तारण की संभावना के लिए नदियों को जोड़ने पर विचार कर रही है। 9 राज्यों; अर्थात् महाराष्ट्र, गुजरात, झारखंड, ओडिशा, बिहार, राजस्थान, तमिलनाडु, कर्णाटक और छत्तीसगढ़ से अंतर-राज्यीय नदियों को जोड़ने संबंधी 40 से भी ज्यादा प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। नर्मदा नदी को गुजरात की अन्य नदियों से जोड़ा जाना, मध्य प्रदेश में केन-बेतवा को जोड़ा जाना और आंध्र प्रदेश में कृष्णा और गोदावरी नदियों को जोड़ा जाना आदि कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जो भविष्य के लिए अति आशापूर्ण मार्ग का सृजन करते हैं।

सिंचाई के अलावा सरकार ग्रामीण सड़कों, विश्वसनीय गुणवत्तापूर्ण विद्युत आपूर्ति, गोदामों, शीत भंडारण की सुविधाओं, प्रशीतक बोगियों और बाजार स्थलों जैसी अवसरंचना पर सुचारु रूप से ध्यान दे रही है। कृषि क्षेत्र की दक्षता को बढ़ाने हेतु ये अवसंरचनात्मक विकास आवश्यक शर्तें हैं।

समय पर उचित ब्याज दर पर ऋण सुविधाएं और कृषि-हितैषी बीमा नीतियां सुदृढ़ पारिस्थितिकी तंत्र निर्माण के दो अन्य महत्वपूर्ण कारक हैं। इससे किसानों को बेहतर, आय देने वाली फसलों और कृषि पद्धतियों में निवेश रने का अवसर मिलता है और उनके आय में बढ़ोतरी होती है। बीमा सुरक्षा किसानों को अनपेक्षित जलवायु और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा प्रदान करती है। किसान क्रेडिट कार्ड और प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) सही दिशा में उठाए गए कदम हैं जिन्हें सर्वव्यापी बनाए जाने की आवश्यकता है।

सरकार को आद्योपांत सेवाएं सुनिश्चित करनी होगी। बीज खरीदारी से लेकर फसल कटाई के पश्चात के क्रियाकलापों को पूरा किए जाने तक किसानों की आवश्यकताओं को सक्षम किसान हितैशी संस्थानों के नेटवर्क के माध्यम से पूरा किया जाना चाहिए। नि:संदेह कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश बढ़ाए जाने की आवश्यकता है जो वर्तमान में सकल घरेलु उत्पाद उत्पाद का 2.7 प्रतिशत है।

कृषि उत्पादों का विपणन और उस पर लाभ-प्राप्ति अधिकांश किसानों के समक्ष एक बड़ी चुनौती है। किसानों को अभी भी स्थानीय बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता है और प्राय: उत्पादों को मजबूरन बेचना पड़ता है। 'ई-नैम (ई-एनएएम)' नामक पहल कृषि उत्पादों के लिए ई-व्यापार का प्लेटफार्म मुहैया कराके इस स्थिति का समाधान तलाशने की कोशिश का नाम है। कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम में पूरे राज्य में बाजार शुल्क के एकल-बिंदु करारोपण और संयुक्त एकल व्यापार लाइसेंस लागू करके संशोधन किया जाना प्रस्तावित है।

सरकार की 'ई2ई' पहल पर निजी क्षेत्रों का योगदान भी अपेक्षित है। इसके अलावा, प्रयोगशाला से भूमि तक को सुदृढ़ किए जाने संबंधी दृष्टिकोण नामक एक अति महत्वपूर्ण दूसरा पहलू भी है, जिसका मैने शुरु में ही उल्लेख किया है। आप सभी के समक्ष यह एक बड़ी चुनौती है। आप इस विश्वविद्यालय में अर्जित ज्ञान और कौशल को देश के कृषि परिदृश्य को रूपांतरित करने के क्रम में किसानों तक किस तरह स्थानांतरित करेंगे? आप ग्रामीण भारत के किसानों के जीवन को सकारात्मक रूप से किस तरह प्रभावित करेंगे?

आप बहुत सारे काम कर सकते हैं और प्रणाली की दक्षता को विकसित करने में अपनी नवोन्मेषी क्षमताओं का उपयोग कर सकते हैं। मैं कुछ ऐसे क्षेत्रों का उल्लेख कर रहा हूं, जिन पर कृषि विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण की अन्य संस्थाओं तथा अनुसंधान संस्थानों द्वारा विशेष रूप से ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।

प्रथम, अधिक उपज देनेवाले बीजों के उपयोग और भूमि तथा जल के कार्यक्षम उपयोग के माध्यम से उत्पादकता को बढ़ाकर कृषि को गहन बनाना। खाद्यान्न फसलवाले कुल 69 प्रतिशत भू-भाग पर अधिक उपज देनेवाले बीज बोये जाते हैं। इस कार्यक्षेत्र व्याप्ति का विस्तार किया जाना चाहिए। जबकि सरकार द्वारा सिंचाई सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है, तथापि जल के कार्यक्षम उपयोग के संबंध में किसानों को शिक्षित किए जाने की आवश्यकता है। "ऐसा देखा जाता है कि समान स्तर की सिंचाई सुविधावाले जिलों में भी सकल उत्पादकता में व्यापक अंतर दिखता है।" अल्प मात्रा में उपलब्ध संसाधन की प्रत्येक बूंद का इष्टतम उपयोग किया जाना चाहिए। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि एक ही जमीन पर ज्यादा से ज्यादा फसल उगाई जाएं।

दूसरा क्षेत्र 'विविधता' से संबंधित है। किसानों को विभिन्नता अपनाते हुए फल, सब्जी, रेशेदार फसल, कॉडिंमेंट दाल मसाले और गन्ना जैसे ऊंचे दाम वाली फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यह स्थापित हो चुका है कि अनाज और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों की औसत उत्पादकता; जो कि 41,169 रु. प्रति हेक्टेयर है, की तुलना में ऊंचे दाम की फसलों की औसत उत्पादकता 1.4 लाख रु. प्रति हेक्टेयर है। डेयरी और वानिकी जैसे संबंधित क्षेत्रों में भी विविधता की प्रबल संभावनाएं हैं। पशुधन की उत्पादकता अभी भी काफी कम है जो प्रति दुधारू भैंस द्वारा औसत 4.90 किलों दूध उत्पादन और प्रति दुधारू गाय द्वारा औसत 3.1 किलो दूध उत्पादन है। ठीक इसी तरह, विशेषकर इस तथ्य के मद्देनजर कि वर्तमान में भारत अपनी 40% गैर-ईंधन संबंधी लकड़ी की जरूरतों को लकड़ी और लकड़ी के उत्पादों के आयात से पूरा करता है, हमें किसानों को कृषि-वानिकी और वानिकी अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।

परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकियों को दक्षता के साथ किसानों तक हस्तांतरित करके और सूचना, ज्ञान तथा कौशल उपलब्ध करवाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी का नवोन्मेषी तरीके से उपयोग करके हम इन दो क्षेत्रों के कार्यों को लागू कर सकते हैं और उसमें तेजी ला सकते हैं। हमें भारतीय कृषि को निम्न उत्पादकता के स्तर से उच्च उत्पादक स्तर पर लाने के लिए उसमें प्रमुख बदलाव लाने होंगे और साथ ही साथ यह सुनिश्चित करना होगा कि यह टिकाऊ और यथोचित भी हो। बहु-विषयक दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए आपको समस्योन्मुख अनसंधान करना चाहिए। आपको अपनी प्रयोगशाला तथा किसानों की भूमि के बीच महत्वपूर्ण संपर्क को मजबूत करना चाहिए। मौसमी दशाओं की अग्रिम भविष्यवाणी, मृदा जांच और जल उपलब्धता के संदर्भ में आपको फसल पद्धतियों और फसल कटाई के पश्चात् की प्रक्रिया और खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों के संबंध में किसानों को सलाह देने हेतु 'कृषि विज्ञान केंद्र' जैसे सरकार द्वारा विकसित तंत्र के साथ मिलकर काम करना चाहिए। आपको फसल और पशुधन की उत्पादकता को बढ़ाने हेतु विभिन्न विकल्पों पर अपनी विशेषज्ञ सलाह देनी होगी। आपके स्वदेशी और विश्व प्रौद्योगिकियों से सीख लेनी चाहिए। आपको विभिन्न कृषि प्रक्रियाओं के लिए इस क्षेत्र में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों को लाना होगा, परंतु केंद्र किसानों को सर्वदा अपने काम में केंद्रीय स्थान प्रदान करना होगा। मुझे खुशी है कि इस विश्वविद्यालय के छात्र छ: महीने लंबे ग्रामीण कृषि-कार्य अनुभव संबंधी कार्यक्रम के माध्यम से जमीनी हकीकत और किसानों के जीवन के बीच आवश्यक संपर्क को बनाये रखते हैं। मुझे विश्वास है इससे विद्यार्थियों को किसानों के साथ अपना अनुभव साझा करने और साथ ही साथ किसानों के अनुभव और पद्धतियों से नया परिज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिलता है। मेरे विचार में यह एक महत्वपूर्ण द्विआयामी शिक्षण प्रक्रिया है।

प्रिय साथियो, आप ज्ञान के एक ऐसे व्यापक नेटवर्क का हिस्सा हैं, जो एक जैसे कार्य के निष्पादन हेतु समर्पित हैं। हमारे पास एक व्यापक प्रणाली है जिसमें 63 राज्य कृषि विश्वविद्यालय 4 सम कृ‍षि विश्वविद्यालय, एक केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, 106 आईसीएआर अनुसंधान संस्थान और 680 कृषि विज्ञान केंद्र शामिल हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस विश्वविद्यालय के आप सभी व्यक्ति वैज्ञानिक ज्ञान के भंडार को समृद्ध करेंगे और अपने 'अन्नदाता' के हित के लिए सृजनात्मक रूप से इस ज्ञान का उपयोग करेंगे। मुझे विश्वास है कि आप ज्ञान की इस गंगा को किसानों के खेतों तक लें जाएंगे और इस तरह से आधुनिक भारत के लोगों के चेहरे पर स्पष्ट खुशहाली लाकर आप 'आनंददाता' बन जाएंगे।

जय हिन्द।