22 अप्रैल, 2020 को विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर उपराष्ट्रपति श्री एम.वेंकैया नायडु का संदेश

नई दिल्ली
अप्रैल 21, 2020

"हम विश्व पृथ्वी दिवस की 50वीं वर्षगांठ का आयोजन ऐसे समय में कर रहे हैं जब पूरा विश्व कोविड-19 महामारी के कारण अभूतपूर्व स्वास्थ्य आपदा से ग्रस्त है। इस महामारी ने वैश्विक पर्यावरण के विषय में भी कुछ चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं। विश्व भर में सम्पूर्ण लॉकडाउन ने विश्व को लगभग थाम सा दिया है, प्रदूषण के स्तरों में कमी आई है और वायु गुणवत्ता में सुधार हुआ है, इसने हमें यह अहसास करवाया है कि मानव ने किस हद तक पर्यावरणीय संतुलन को क्षति पहुंचाई है।

यह समय की मांग है कि हम सभी नागरिक पृथ्वी को एक स्वच्छ और हरा-भरा ग्रह बनाने के लिए सामूहिक प्रयास करें। पर्यावरण संरक्षण हम सबका पावन नागरिक कर्तव्य है। आइए हम माता प्रकृति के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, अपनी विकास की अवधारणा पर पुनर्विचार करें और अपनी उपभोक्तावादी जीवन शैली में बदलाव करें।

आज विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर, मैं नागरिकों से पर्यावरण और प्रकृति के संरक्षण का सक्रिय और सजग प्रहरी बनने और इस ग्रह तथा इस पर रहने वाले मानव और अन्य जीव-जंतुओं के बीच सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व स्थापित करने का आग्रह करता हूँ ।

विश्व पृथ्वी दिवस 2020 के विषय 'क्लाइमेट एक्शन' पर ध्यान केन्द्रित करते हुए, हमें अपनी पिछली गलतियों से सीखना चाहिए और मानव तथा प्रकृति के बीच परस्पर निर्भरता और सह-अस्तित्व के महत्व को समझना चाहिए। आज हम परस्पर निर्भरता वाले विश्व में रह रहे हैं और हम विकास और आधुनिकीकरण के पुराने ढर्रे पर नहीं चल सकते क्योंकि हमारे हर कदम का पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है। यहां यह कहना समीचीन ही होगा कि हमारी प्राचीन औषधीय पद्धति आयुर्वेद में प्रकृति के पांच अवयवों - पंच महाभूतों - पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश का उल्लेख किया गया है तथा सूक्ष्म एवम् बाहरी स्थूल स्तरों पर इन पंच तत्वों में परस्पर संतुलन अभीष्ट माना गया है।

विभिन्न क्षेत्रों के लिए पर्यावरण अनुकूल नीतियां बना कर इस ग्रह को स्थायित्व प्रदान करना ही भविष्य के लिए श्रेयस्कर मार्ग है।

यूएनडीपी (संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम) के अनुसार, आज ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के स्तर में वर्ष 1990 की तुलना में 50 प्रतिशत से भी अधिक वृद्धि हुई है। यूएनडीपी ने यह भी कहा है कि यदि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में साहसिक कदम उठाए जाएं तो वर्ष 2030 तक हम 26 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर का आर्थिक लाभ अर्जित कर सकते हैं। यदि हम अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र पर ध्यान केन्द्रित करें, तो वर्ष 2030 तक केवल ऊर्जा क्षेत्र में ही 18 मिलियन और नए रोज़गार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

आज इस महामारी के समय में जब हम अपने जीवन में अभूतपूर्व व्यवधान अनुभव कर रहे हैं, तब हमारे पास इस बात का संज्ञान लेने का अवसर है कि किस प्रकार हमें अपने विकास के मॉडल पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। आइए हम अपनी आर्थिक और विकास अवधारणाओं का पुनरावलोकन करें और नई अवधारणाएं विकसित करें। हमें अतीत और वर्तमान की कटु कठिनाइयों से समुचित सीख लेकर भविष्य के लिए एक अधिक संधारणीय मार्ग खोजने की आवश्यकता है।

बंद कारखानों और उद्योगों, रद्द की गई उड़ानों और सड़कों पर कम वाहनों के चलने से प्रदूषण के स्तर में उल्लेखनीय कमी आई है। एक अनुमान के अनुसार, सिर्फ वायु प्रदूषण से ही विश्व भर में प्रत्येक वर्ष 7 मिलियन लोगों की मृत्यु होती है। इसलिए, यह समय की मांग है कि हम अक्षय ऊर्जा, हरित भवन अवधारणा, स्वच्छ प्रोद्योगिकियों तथा इलेक्ट्रिक वाहनों को अधिकाधिक अपनाएं।

लॉकडाउन के उपरांत एक वाक्य प्राय: सुनाई देता है "पृथ्वी स्वयं अपने घावों का उपचार कर रही है। यह सच है कि गंगा से लेकर कावेरी तक भारत की विभिन्न नदियों के प्रदूषण स्तर में अत्यधिक कमी हुई है। विशेषकर, कुछ स्थानों पर तो गंगा के पानी में इतनी निर्मलता व शुद्धता आ गई है कि जो पानी स्नान के लिए भी अनुकूल नहीं था वहां गंगा का पानी पीने लायक हो गया है।"

जमीनी स्तर पर, समुदायों को स्वेच्छा से वृक्षारोपण जैसी परियोजनाओं को बड़े पैमाने पर अपनाते हुए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए 'रिड्यूस, रियूज एंड रिसाइकिल' के मंत्र को जीवन में अपनाना चाहिए। एक समाज के रूप में हम सबको सम्मिलित रूप से प्रकृति सम्मत संपोषणीय जीवन शैली को अपनाना चाहिए। एक बेहतर भविष्य के लिए हमें प्रकृति का संरक्षण और संस्कृति का संवर्धन करने की आवश्यकता है।

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