संसद और विधानमंडलों के काम-काज को रोकना लोकतंत्र को कमजोर करने के समान है: उपराष्ट्रपति

मुंबई
जुलाई 27, 2019

उपराष्ट्रपति ने सांसदों और विधायकों के उच्छृंखल व्यवहार पर पीड़ा व्यक्त की;
विधानमंडलों के कार्यकरण के लिए लोगों के जनादेश का सम्मान करना अनिवार्य: उपराष्ट्रपति
उपराष्ट्रपति ने राज्यों को ग्रामीण स्थानीय निकायों को 29 विषयों के हस्तांतरण पर प्रगति की समीक्षा करने के लिए कहा;
उपराष्ट्रपति ने महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा स्थापित प्रथम लोकतंत्र पुरस्कार प्रदान किए

भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु ने कहा है कि संसद और विधानमंडलों के कामकाज को रोकना लोकतंत्र को कमजोर करने और लोगों के साथ विश्वासघात करने के समान है।

महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग द्वारा मुंबई में आज आयोजित एक समारोह में 'लोकतंत्र पुरस्कार' प्रदान करने के बाद बोलते हुए श्री नायडु, जो राज्यसभा के सभापति हैं, ने कहा कि वह राज्य सभा में पिछले दो वर्षों के दौरान कुछ सदस्यों के व्यवहार से बहुत व्यथित हैं।

सदस्यों द्वारा नियमों और परंपराओं की अवहेलना के परिणास्वरूप सदन में उत्पन्न अव्यवस्था के कारण उपराष्ट्रपति व्यथित थे। राज्य सभा के सदस्यों पर उदाहरण पेश करके नेतृत्व करने की विशेष जिम्मेदारी होती है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि सांसद और विधायक नारेबाजी करते हैं और कार्यवाही को बाधित करते हैं, तो वे संसदीय लोकतंत्र को हानि पहुंचाते हैं।

एक महिला पीठासीन अधिकारी के बारे में लोक सभा के एक सदस्य द्वारा की गई आपत्तिजनक टिप्पणी पर दुख व्यक्त करते हुए श्री नायडु ने कहा कि महिलाओं का अनादर करना हमारी संस्कृति में नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसा व्यवहार हमारे संसदीय लोकतंत्र की प्रतिष्ठा को कम करेगा।

यह बताते हुए कि सत्ताधारी और विपक्षी दल को एक-दूसरे को शत्रु या विरोधी नहीं मानना चाहिए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोगों के जनादेश का सम्मान करना और वर्तमान सरकारों को जनादेश के अनुसार कार्य करने की अनुमति देना विधायिकाओं के कार्यकरण का एक अनिवार्य सिद्धांत होना चाहिए।

यह देखते हुए कि संसद और विधायिकाओं के प्रभावी कामकाज को सुनिश्चित करने में सत्ताधारी और विपक्षी दोनों दलों की साझा जिम्मेदारी है, श्री नायडु ने उनसे आपसी सम्मान और समझौते की भावना अपनाने का आग्रह किया।

उपराष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र के लिए वाद-विवाद, चर्चा और निर्णय महत्वपूर्ण होता है और इन्हें अव्यवस्था, व्यवधान और विधान बनने में देरी से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है "जो कि लोकतंत्र की भावना की उपेक्षा करने के अलावा और कुछ नहीं है"।

यह कहते हुए कि संसद और राज्य विधायिकाओं के प्रमुख कार्य विधान बनाना, विचार-विमर्श करना और कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करना है, श्री नायडु ने कहा कि यदि सरकारें लोगों से किए गए वायदों से पीछे हटती हैं तो विपक्ष उनका विरोध कर सकता है और उन्हें ऐसा करना चाहिए।

श्री नायडु ने कहा कि सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों को देश के लोगों की भलाई और देश के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन में संयुक्त हितधारकों के रूप में कार्य करना चाहिए। “हमारे राष्ट्र को प्रभावी और जिम्मेदार सरकारों और विपक्ष दोनों की आवश्यकता है।” उन्होंने कहा कि “यदि दोनों में से कोई भी कमज़ोर हो जाता है तो देश के हितों की रक्षा सही ढंग से नहीं हो सकती।”

उपराष्ट्रपति ने कहा कि "राज्य सभा के पीठासीन अधिकारी के रूप में, मैंने हमेशा जोर दिया है कि विपक्ष को सदन के कामकाज के सभी पहलुओं में अपना पक्ष रखने की अनुमति दी जानी चाहिए। यही एकमात्र तरीका है जिससे हम अपने संसदीय लोकतंत्र को अधिक सार्थक बना सकते हैं। हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश हैं। गुणवत्ता के मामले में भी हमें सबसे अच्छा बनना होगा।”

73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों द्वारा दिए गए अधिदेश के अनुसार स्थानीय निकायों को शक्तियों के हस्तांतरण पर उन्होंने कहा कि इन्हें संवैधानिक रूप से सशक्त किए हुए भले ही 26 साल बीत गए हों, परन्तु अब भी यह हस्तांतरण संतोषजनक प्रतीत नहीं होता है।

उपराष्ट्रपति ने सभी राज्यों से आग्रह किया कि वे 29 विषयों को उनके पास स्थानांतरित करने पर हुई प्रगति की समीक्षा करें और कहा कि इस पर आगे देरी करना संवैधानिक अधिदेश का उल्लंघन करने के समान होगा।

पंचायती राज निकायों को सशक्त बनाने के लिए पर्याप्त धन, कार्यों और कार्यकर्ताओं-इन तीन बातों को विकसित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए श्री नायडु ने कहा कि जब लोग अपने से संबंधित मामलों में स्वयं भाग लेंगे, तो लोकतंत्र अधिक सार्थक और मजबूत होगा।

श्री नायडु ने लोकतंत्र को सफल बनाने में 5 बातों के महत्व को रेखांकित किया। वे हैं- 1) चर्चा 2) वाद-विवाद 3) निर्णय 4) विकेंद्रीकरण 5) परिणाम

इस वर्ष राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की 150 वीं जयंती का उल्लेख करते हुए श्री नायडु ने याद दिलाया कि गांधी जी शक्तियों के विकेंद्रीकरण के सबसे बड़े पक्षधर थे और उनका मानना था कि प्रत्येक गाँव को अपने स्वयं के मामलों के लिए जिम्मेदार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश में लोकतांत्रिक नींव को और मजबूत करने के लिए पूरी तरह कार्यात्मक और जमीनी स्तर पर उत्तरदायी शासन प्रणाली के लिए यह अत्यंत आवश्यक है।

उपराष्ट्रपति ने हर पांच साल में स्थानीय निकायों के चुनाव कराने को अनिवार्य बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया जिसमें राज्य सरकारों को उन्हें स्थगित करने की गुंजाइश न हो।

इस अवसर पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फड़नवीस, महाराष्ट्र के राज्य निर्वाचन आयुक्त श्री जे.एस. सहरिया और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

उपराष्ट्रपति ने विभिन्न श्रेणियों में पुरस्कार पाने वाले 15 लोगों को लोकतंत्र पुरस्कार प्रदान किए।

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