संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित University of Peace ने भारत के उपराष्ट्रपति को डाक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया

San Jose, Costa Rica
मार्च 8, 2019

भारत के उपराष्ट्रपति ने धार्मिक मतांधता और द्वेष के स्थान पर सहिष्णुता और समन्वय बढ़ाने की अपील की
-संघर्ष मुक्त विश्व के लिए उपराष्ट्रपति ने विभिन्न मतों के बीच सद्भावना बढ़ाने का आह्वाहन किया
-आतंकवाद शांति की हमारे साझा अपेक्षाओं के लिए सबसे बड़ा खतरा, शक्ति का प्रयोग रक्षा के लिये किया जाय, आक्रमण के लिए नहीं – उपराष्ट्रपति

भारत के उपराष्ट्रपति और राज्य सभा के सभापति श्री एम. वेंकैया नायडु को आज “भारत में कानून के शासन लोकतंत्र तथा सतत विकास” में उनके योगदान के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित University of Peace द्वारा डाक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्होंने यह मानद उपाधि कोस्टारिका की राजधानी सान जोस में University of Peace के डीन के हाथों स्वीकार की।

University of Peace, संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा दिसंबर, 1980 में पारित प्रस्ताव के फलस्वरूप स्थापित की गई है। इस विश्वविद्यालय का उद्देश्य “शांति संबंधी मुद्दों पर, अंतर विभागीय अध्ययन और शोध के माध्यम से, व्यक्ति और समाजों के संपूर्ण विकास के लिए ज्ञान का प्रसार” करना है। भारत ने भी इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किये थे। श्री एम.वेंकैया नायडु इस विश्वविद्यालय द्वारा मानद डाक्टरेट से सम्मानित किये जाने वाले पहले भारतीय हैं।

शहरी विकास मंत्री के रूप में अपने तीन वर्षीय कार्यकाल में श्री नायडु ने देश में हो रहे तेज शहरीकरण के परिपेक्ष्य में, पर्यावरण सम्मत स्थायी शहरीकरण की नयी योजना-रणनीति लागू की। स्मार्ट सिटी मिशन, अमृत, शहरी स्वच्छ भारत मिशन, सभी के लिए आवास जैसी योजनाऐं प्रारंभ की। शहरों में प्रदूषण की रोकथाम तथा नये वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का प्रयोग, निर्माण की पर्यावरण सम्मत पद्वति जैसी नयी पहल की। 2017 में देश के उपराष्ट्रपति का पदभार संभालने के बाद भी, आप देश के विभिन्न भागों में जाकर कानून का शासन, वैचारिक संकीर्णता से मुक्ति, पारदर्शी प्रशासन और समन्वयवादी विकास जैसे विषयों के समर्थन में अपने विचार व्यक्त करते रहे हैं।

उपाधि को स्वीकार करते हुए अपने भाषण में, श्री नायडु ने कहा कि “यह सम्मान निजी तौर पर अकेले मेरा नहीं, बल्कि मेरे देश का है। यह सम्मान उस देश, उस सभ्यता, उस संस्कृति के लिए है जिसने अनादि काल से शांति का संदेश दिया है। आज जब विश्व शांति के महान दूत महात्मा गांधी का 150वां जन्मजयंती वर्ष मना रहा है, मुझे यह सम्मान प्राप्त करने का गौरव प्राप्त हुआ है।”

श्री नायडु ने विश्व शांति और मानवता के कल्याण के लिए विद्वेषपूर्ण, कट्टर मतांधता और तानाशाही की ताकतों को परास्त करने का आह्वाहन किया। लोगों से वृहत्तर समाज को भी अपने परिवार की तरह स्वीकार करने की अपील करते हुए, श्री नायडु ने कहा “विचारों, मतों, भाषाओं, संस्कृतियों तथा धार्मिक विश्वासों की अद्भुत विविधता को सहज सहर्ष स्वीकार करने की क्षमता ही हमारे परस्पर सौहार्दपूर्ण सहअस्तित्व का आधार है। परस्पर सौहार्द और समानता खोजने की इच्छा ही समाज में शांति का सूत्र है।”

श्री नायडु ने कहा कि हमें हर किसी में अंतर्निहित दिव्यता देखनी चाहिए। उन्होंने आग्रह किया कि विश्व के सभी बड़े धर्मों में निहित उदार विचारों को संकलित कर सौहार्द और सद्भाव पर आधारित एक नया विश्वदर्शन बनाने के प्रयास किये जाने चाहिए। उन्होंने विभिन्न धर्मों और मतों के बीच संवाद और सद्भाव की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म, जैन और बौद्ध धर्म सभी संघर्ष का त्याग कर, विश्वबंधुत्व और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की शिक्षा देते हैं।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि व्यापार और सूचना क्रांति की बदौलत आज भूमंडलीकरण तेजी से बढ़ा है। विश्व के देश आज कहीं अधिक सघनता से जुड़े हुए हैं। लेकिन भूमंडलीकरण के इस दौर में भी आतंकवाद विश्व शांति के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है। भारत इस खतरे का वर्षों से सामना कर रहा है। धार्मिक कट्टरवाद के बढ़ते खतरे के प्रति आगाह करते हुए श्री नायडु ने कहा कि आतंकवाद के विरूद्ध साझा संघर्ष करना होगा और सम्मिलित प्रयासों से अवैध हथियारों और अवैध धन के विश्व व्यापी तंत्र को तोड़ना होगा। उन्होंने कहा भारत की शांतिपूर्ण विकास यात्रा में बढ़ता आतंकवाद सबसे बड़ी चुनौती रहा है। इस संदर्भ में श्री नायडु ने समन्वयवादी और पर्यावरण सम्मत स्थाई विकास सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा उठाये गये कदमों की भी जानकारी दी। उन्होंने कहा सुशासन में नागरिकों की भागीदारी, कानून का राज, त्वरित न्याय, जन आकांक्षाओं को न केवल संतुष्ट करेंगे बल्कि सामाजिक विवाद और संघर्ष भी कम करेंगे।

शांति को विकास के लिए अपरिहार्य शर्त बताते हुए, श्री नायडु ने कहा कि राष्ट्रवाद और अंतरराष्ट्रीय सहयोग परस्पर पूरक होने चाहिए। उन्होंने कहा कि शक्ति का प्रयोग सिर्फ रक्षात्मक होना चाहिए आक्रामक नहीं।

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