शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो हमारे छात्रों को परिवर्तन के प्रति अभिलाषी बनाए: उपराष्ट्रपति

देहरादून
नवम्बर 30, 2019

विश्वविद्यालय और उद्योग जगत छात्रों को भावी व्यवसायी के रूप में ढालने के लिए एकजुट हों : उपराष्ट्रपति;
भारत को विश्व के 100 शीर्ष संस्थानों में अपना स्थान बनाने और वैश्विक ज्ञान का केन्द्र बनाने का लक्ष्य निर्धारित करें : उपराष्ट्रपति का भारतीय विश्वविद्यालयों को आह्वान
कथनी और करनी के बीच अंतर को पाटने का आह्वान
भारत को समूची शिक्षा प्रणाली के बारे में पुनर्विचार करने की आवश्यकता
यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम ऐण्ड एनर्जी स्टडीज (यूपीईएस) के 17वें दीक्षांत समारोह में संबोधन

उपराष्ट्रपति श्री एम. वेकैंया नायडु ने आज कहा कि शिक्षा का उद्देश्य छात्रों में न केवल वैज्ञानिक भावना और उद्यमियता के प्रयासों को प्रोत्साहित करना होता है, बल्कि उन्हें परिवर्तन के प्रति अभिलाषी बनाना भी होता है।

आज देहरादून में यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनेर्जी स्टडीज (यूपीईएस) के 17वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए श्री नायडु ने हमारे तकनीकी संस्थानों में उद्यमिता शिक्षा प्रदान करने का आह्वान किया, ताकि बड़ी संख्या में स्नातक मात्र नौकरी की तलाश करने वाले न बनें, बल्कि उनमें कारोबार, नौकरियां और धन का सृजन करने संबंधी कौशल और आत्मविश्वास भी उत्पन्न हो।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की वृद्धि की रफ्तार निरंतर स्थिर बने रहने और विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक तीव्र होने के कारण आज पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है। उन्होंने कहा कि भारत को बड़ी तादाद में युवा आबादी होने का भी लाभ मिल रहा है और उसकी 50 प्रतिशत जनसंख्या 25 वर्ष से कम आयु के लोगों की है।

उन्होंने कहा कि यदि इस जनसांख्यिकीय लाभांश का इस्तेमाल समावेशी एवं सतत वृद्धि तथा विकास के लिए किया जाना है और इसका लाभ उठाया जाना है, तो हमारे युवाओं को क्षेत्र विशेष पर केंद्रित शिक्षा, कौशल और विशेषज्ञता से लैस करना होगा।

हमारे युवा स्नातकों की रोजगारपरकता के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए श्री नायडु ने छात्रों को भविष्य के लिए तत्पनर पेशेवर बनाने हेतु विश्वविद्यालयों और उद्योग जगत से एकजुट होने का आग्रह किया।

यह देखते हुए कि नियमित नौकरियों की जगह अब कृत्रिम बौद्धिकता और स्वचलन लेता जा रहा है, श्री एम. वेकैंया नायडु ने शिक्षण संस्थानों से जल्दी से इस सांचे में ढलने और विकसित होने का अनुरोध किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि विश्वविद्यालयों को छात्रों को ऐसे कार्यों को करने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए, जिन्हें मशीनें नहीं कर सकतीं।

उन्होंने शिक्षण संस्थानों को रटन्त विद्या वाली शिक्षण पद्धति को त्यागने और विविध प्रकार की जानकारी, समस्याओं के समाधान, निर्णय लेने और विश्लेषण का समावेश करने पर अधिक ध्यान देने की सलाह दी। उन्होंने कहा, "स्कूलों में डिजिटल कौशल के साथ-साथ सोचने-समझने के सिद्धांतों को लागू किया जाना चाहिए"।

यह देखते हुए कि चौथी औद्योगिक क्रांति आसन्न ही है, उन्होंने शिक्षण संस्थानों से ज्ञान और कौशल प्राप्त करते हुए इसके लिए तत्पर रहने का अनुरोध किया, ताकि लंबी छलांग लगाई जा सके।

श्री नायडु ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को समूची शिक्षा प्रणाली के बारे में पुनर्विचार करने की जरूरत है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि हम परिवर्तन की ओर अग्रसर नहीं होंगे तो हमारे पीछे छूट जाने का खतरा है।

अतीत में भारत के ‘विश्वगुरू’ के दर्जे का उल्लेख करते हुए श्री नायडु ने भारतीय विश्वविद्यालयों से देश को एक बार फिर से वैश्विक ज्ञान का केन्द्र बनाने के लिए कड़ा प्रयत्न करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारतीय विश्वविद्यालयों को विश्व की शीर्ष 100 संस्थानों के बीच अपना स्थान बनाने का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए।

सरकार की ओर से की गई निष्ठा, अर्पित और ध्रुव जैसी अनेक पहलों का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने चेताया कि अकेले सरकार के प्रयासों से विश्वस्तरीय शिक्षा प्रणाली का सृजन करने में सफलता नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा, "हमारे सरकारी और निजी दोनों तरह के सभी संस्थानों को सरकार के साथ तालमेल बनाकर काम करना होगा।"

उन्होंने राय व्यक्त की कि केवल अकादमिक रूप से दक्ष स्नातक तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है। श्री नायडु ने कहा कि छात्रों में केवल ज्ञान संबंधी कौशलों को ही विकसित नहीं करना चाहिए, बल्कि उनमें सांस्कृतिक जागरूकता और समानानुभूति, दृढ़ता और धैर्य, टीम वर्क और नेतृत्व क्षमता सहित सामाजिक और भावनात्मक ‘व्यावहारिक कौशल' भी विकसित करने पर जोर दिया जाना चाहिए।

माननीय उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत सांस्कृतिक रूप से जीवन के सभी क्षेत्रों में महान विविधता का पालना रहा है और अभी भी है, और विश्व धरोहर के लिए इन समृद्ध विरासतों का न केवल पोषण और संरक्षण किया जाना चाहिए बल्कि इन्हें समृद्ध भी किया जाना चाहिए।

उन्होंने विश्वविद्यालयों से कथनी और करनी के बीच की खाई को पाटने तथा देश और विदेशों में उद्योगों, अनुसंधानों और विकास प्रयोगशालाओं के साथ नेटवर्किंग करके शोध को बढ़ावा देने का प्रयास करने का आग्रह किया।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की ताकत उसके युवाओं में है, जो इसे एक प्रमुख आर्थिक और तकनीकी शक्ति में बदलने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उपराष्ट्रपति जी ने उनसे अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को याद रखने तथा भारत की जनता को तकनीकी प्रगति के लाभ प्रदान करने को कहा।

इस अवसर पर उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती बेबी रानी मौर्य, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, उत्तराखंड सरकार के शिक्षा मंत्री श्री धन सिंह रावत, यूपीईएस के कुलपति डॉ. एस.जे. चोपड़ा और विश्वविद्यालय के उप-कुलपति डॉ. दीपेंद्र कुमार झा सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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