शासन प्रक्रिया को व्यवस्थित करें, समयबद्ध सेवाएं प्रदान करें: उपराष्ट्रपति

नई दिल्ली
मार्च 22, 2021

‘बुनियादी सेवाओं को प्राप्त करने में आम आदमी के जीवन में संघर्ष नहीं होना चाहिए’

उपराष्ट्रपति ने सुविधाओं में बेहतर सुधार के लिए और अधिक 'विश्वास-आधारित शासन' का आह्वान किया

तकनीकी नवाचारों के मामले में एक भी नागरिक नहीं छूटना चाहिए: उपराष्ट्रपति श्री नायडू

उपराष्ट्रपति ने प्रयोजन और कार्यान्वयन के बीच के अंतर को कम करने का आह्वान किया; शासन में परिणामोन्मुखी दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी

शहरी शासन का ध्यान ‘जीवन के अधिकारों’ पर केन्द्रित होना चाहिए: उपराष्ट्रपति श्री नायडू

उपराष्ट्रपति ने पंचायतों और स्थानीय निकायों के लिए अधिक विषयों को विकेंद्रीकृत और विकसित करने का आह्वान किया

उपराष्ट्रपति ने वर्चुअल रूप से ‘ब्रिंगिंग गर्वन्मैन्ट एंड पीपल क्लोजर’ पुस्तक का विमोचन किया
उपराष्ट्रपति श्री एम वेंकैया नायडू ने कहा कि सुशासन की अंतिम परीक्षा लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक सरकारें लोगों के करीब होनी चाहिए, उनकी जरूरतों के प्रति सरकारों को संवेदनशीलता अपनाते हुए देखभाल और सुविधात्मक भूमिका अपनानी चाहिए। सार्वजनिक कार्यालयों में आम नागरिक को होने वाली कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए, श्री नायडू ने सुझाव दिया कि आवश्यक सेवाओं को सुव्यवस्थित किया जाना चाहिए और आरटीआई जैसे नागरिक चार्टों में स्पष्ट रूप से उस समय को भी निर्दिष्ट किया जाना चाहिए जिसके भीतर किसी भी सेवा का लाभ उठाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि बुनियादी सेवाएं प्राप्त करना आम आदमी के लिए संघर्षपूर्ण नहीं होना चाहिए।
भारत सरकार के पूर्व सचिव, डॉ. एम. रामचंद्रन की पुस्तक ‘ब्रिंगिंग गर्वन्मैन्ट एंड पीपल क्लोजर’ का विमोचन करते हुए श्री नायडू ने कहा कि लेखक के उल्लेखानुसार लोगों की उम्मीदों में सार्वजनिक कार्यालयों में प्रणालियों और प्रक्रियाओं को “आसान, पारदर्शी, समस्या-मुक्त” होना चाहिए ताकि ये लोगों के लिए परेशानी का सबब न बनें। उन्होंने लेखक के विचारों के साथ सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि सार्वजनिक कार्यालयों में अत्यधिक समय लेने वाली प्रक्रियाएं ही लोगों के लिए परेशान मुख्य कारण बनती हैं। इन्हें बेहतर सुव्यवस्थित रूप से बदले जाने का सुझाव देते हुए, उन्होंने केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली (सीपीजीआरएएमएस) जैसे तंत्रों का उपयोग करते हुए शिकायतों का अधिक जवाबदेही और समयबद्ध तरीके से निपटान करने का आह्वान किया। उन्होंने सरकार के सूचकांक में आम आदमी के साथ वार्तालाप करके इन समस्याओं को आसान बनाने के लेखक के सुझाव का भी स्वागत किया।
श्री नायडू ने सुविधाओं में बेहतर सुधार के लिए और अधिक 'विश्वास-आधारित शासन' की आवश्यकता पर भी बल दिया। इस संदर्भ में सुधार के मामले में, सरकार की प्रशंसा करते हुए, उन्होंने कहा कि डिजिटल दस्तावेजों के रूप में स्व-सत्यापन को अब कई दस्तावेजों के लिए पर्याप्त माना जाता है। उन्होंने कर सुधारों की मिसाल का भी उल्लेख किया, जिसके माध्यम से कर अधिकारियों और करदाताओं के बीच के फिजिकल इंटरफेस को समाप्त करते हुए, आकलन और अपील को कार्यान्वित किया गया है।
श्री नायडू ने उल्लेख किया कि तकनीकी प्रगति के कारण सरकारें लोगों से जुड़ी हैं। उन्होंने कहा कि डिजिटल इंडिया, आधार से जुड़े बैंक खाते, स्वच्छ भारत जैसी योजनाओं की निगरानी के लिए जियो-टैगिंग का उपयोग जैसी प्रौद्योगिकियाँ शासन के लिए मील का पत्थर साबित हुई हैं।
ऐसे अधिक नवाचारों का आह्वान करते हुए, उपराष्ट्रपति ने जोर देते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक पर उचित ध्यान दिया जाना चाहिए। इस संबंध में, उन्होंने शासन के सभी पहलुओं में अधिक भारतीय भाषाओं के व्यापक उपयोग का सुझाव दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि लोगों द्वारा समझी जाने वाली भाषाओं का उपयोग कार्यालयों, विद्यालयों, अदालतों और सार्वजनिक स्थलों पर किया जाना चाहिए।
शासन के लिए एक 'परिणामोन्मुख दृष्टिकोण' का पक्ष लेते हुए, उपराष्ट्रपति ने सरकार के प्रयोजन और कार्यान्वयन के बीच के अंतर को कम करने का आह्वान किया। इस संदर्भ में, उन्होंने सरकारों को सलाह देते हुए कहा कि वे अपनी सेवा वितरण की गुणवत्ता का मूल्याँकन करे और इसमें मिलने वाली प्रतिक्रिया पर भी कार्य करें। उन्होंने विद्यालयों में दिशा मंच के माध्यम से वास्तविक समय परिणाम-मूल्याँकन दृष्टिकोण को अपनाने और ग्रामीण विद्युतीकरण के लिए सौभाग्य पोर्टल का भी उल्लेख किया। श्री नायडू ने कहा कि कम से कम समय में 'दृष्टिकोण को मिशन' और 'मिशन को लागू करने' में परिवर्तित करने के मूल मंत्र को सबसे कुशल तरीके से अपनाया जाना चाहिए।
शासन में सुधारों के महत्व को रेखांकित करते हुए, उन्होंने कहा कि सुधारों को सभी हितधारकों की भावनाओं और सुझावों के साथ लागू किया गया हैं। उन्होंने कहा कि इन सुधारों का उद्देश्य सार्वजनिक जीवन को और बेहतर बनाने की दिशा में कार्य करना और लोगों के जीवन में बदलाव लाना है।
सेवा प्रदान करने में भ्रष्टाचार को एक प्रमुख कारक बताते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि सार्वजनिक कार्यालयों में भ्रष्टाचार को समाप्त करना प्रक्रियाओं की सुगमता और जनता के प्रति अधिक जवाबदेही के माध्यम से ही संभव है।
शहरी क्षेत्रों में शासन के मुद्दों पर विचार व्यक्त करते हुए, श्री नायडू ने सुझाव दिया कि हमें बुनियादी ढांचे के साथ-साथ एक शहर में समाज के सभी वर्गों के लिए आनंदयुक्त स्थलों का भी निर्माण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुख्य ध्यान 'जीवन के अधिकारों' पर होना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों के संबंध में, उन्होंने कहा कि प्रमुख शासन के मुद्दे भूमि रिकॉर्ड, अदालतों में लंबित मामलों, बिजली आश्वासन, पेंशन में देरी और स्वास्थ्य एवं शिक्षा तक पहुंच से संबंधित है। उन्होंने भू-अभिलेखों के डिजिटलीकरण, सड़क संपर्क में सुधार, उज्ज्वला योजना के माध्यम से खाना पकाने के ईंधन तक पहुंच जैसी उल्लेखनीय पहलों की भी जानकारी दी, जिनके माध्यम से गांवों में दैनिक जीवन-यापन में आसानी आई है।
श्री नायडू ने स्थानीय निकायों के विकेंद्रीकरण और शक्तियों के विकास के महत्व पर भी चर्चा की। 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों का उल्लेख करते हुए, उन्होंने स्थानीय निकायों के लिए सूचीबद्ध 29 विषयों के अधिक प्रभावी हस्तांतरण का आह्वान किया।
विधायकों की भूमिका पर अपने विचार व्यक्त करते हुए, उन्होंने सुझाव दिया कि उन्हें नीतियों के कार्यान्वयन की समीक्षा करने, दक्षता और कमियों को उजागर करने और विधानसभाओं में सुझाव देने की पहल करनी चाहिए।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि सर्वोत्तम शासन प्रथाओं को साझा करने के साथ-साथ इसका प्रचार करते हुए और इसे व्यापक रूप से दोहराया जाना चाहिए। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से आग्रह किया कि वे शासन प्रथाओं और परियोजनाओं का एक व्यापक दस्तावेज तैयार करें ताकि सफलताओं और विफलताओं के संदर्भ में जानकारी का पता लगाया जा सके। उन्होंने कहा कि इससे और बेहतर कार्यान्वयन के का मार्ग प्रशस्त होगा।
श्री नायडू ने लोगों की 21वीं सदी की आकांक्षाओं को पूरा करने और भारतीय शासन को वैश्विक मॉडल बनाने की दिशा में मिलकर काम करने का आह्वान किया। उन्होंने नागरिकों को राष्ट्रीय विकास में सक्रिय भागीदार बनाने का सुझाव दिया। उन्होंने स्वच्छ भारत जैसे कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी और कोविड-19 पर देश की प्रतिक्रिया के महत्व को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सुशासन की परिकल्पना तभी साकार होती है जब लोगों को केवल लाभों के प्राप्तकर्ता के रूप में न देखकर परिवर्तन के वाहक के रूप में देखा जाता है।
इस वर्चुअल कार्य्रक्रम के दौरान भारत सरकार के पूर्व सचिव डॉ. एम. रामचंद्रन, भारत के पूर्व नियंत्रक और महालेखा परीक्षक, श्री विनोद राय, इकोनॉमिक टाइम्स के संपादक, श्री टी.के अरुण, कोपल पब्लिशिंग हाउस के प्रकाशक, श्री ऋषि सेठ, वरिष्ठ अधिकारी, प्रोफेसर और अन्य गणमान्य उपस्थित थे।

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