राज्यसभा ने अपनी अभी तक की यात्रा और भविष्य की दिशा पर चर्चा की

नई दिल्ली
नवम्बर 18, 2019

सभापति श्री नायडु ने इसके योगदान की प्रशंसा की किंतु कहा कि 'सब ठीक नहीं है'
सभा के बेहतर कार्यकरण के लिए विचार हेतु 10 सुझाव दिए

राज्यसभा ने आज अपने ऐतिहासिक 250वें सत्र के पहले दिन 'भारतीय राजतंत्र में राज्यसभा की भूमिका और भविष्य की दिशा' पर चर्चा की। चर्चा के लिए पृष्ठभूमि तैयार करते हुए सभापति श्री एम.वेंकैया नायडु ने कहा है कि अपनी पिछली 67 वर्षों की यात्रा के दौरान राज्यसभा ने देश के सामाजिक आर्थिक रूपांतरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है किंतु 'सब ठीक नहीं है'।

श्री नायडु ने स्वतंत्रता प्राप्ति के समय गरीबी, निरक्षरता, खराब स्वास्थ्य देखभाल, औद्योगीकरण और आर्थिक विकास के निम्न स्तर, सामाजिक रूढ़िवादिता, निम्नस्तरीय अवसंरचना, बेरोजगारी आदि से ग्रसित देश की स्थिति में परिवर्तन लाकर लोगों के जीवन की गुणवत्ता में संतोषजनक सुधार लाने के अलावा आज देश को आर्थिक विकास का एक अग्रणी चालक तथा एक ऐसा राष्ट्र बनाने, जिसके विचारों को जटिल वैश्विक व्यवस्था में महत्व दिया जा रहा है, में राज्यसभा की भूमिका का उल्लेख किया।

सभा के 250वें सत्र के ऐतिहासिक अवसर पर सभापति ने सभा की अभी तक की यात्रा पर एक सामूहिक चिंतन और गंवाए हुए अवसरों पर निष्ठापूर्वक आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा न कर पाने पर 'स्वयं को अप्रासंगिक बनाने का जोखिम अंतर्निहित है'।

श्री नायडु ने सभा के कार्यकारण के संबंध में जनता की व्यापक चिंता के संदर्भ में सदस्यों से इस प्रश्न कि 'क्या हम सभा के भीतर और बाहर अपनी कथनी और करनी के द्वारा इस पवित्र संस्थान की प्रतिष्ठा को बढ़ाने में अपना योगदान दे रहे हैं' का उत्तर खोजने के लिए सदस्यों से अंतरावलोकन करने को कहा।

सभापति श्री वेंकैया नायडु ने अब से सभा के कार्यकरण में एक सकारात्मक अंतर लाने के लिए सभा के सदस्यों द्वारा विचार किए जाने हेतु 10 सुझाव दिए। ये सुझाव इस प्रकार हैं;

  1. 1. विधानों की प्रकृति और संख्या तथा सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए उपलब्ध समय को ध्यान में रखते हुए अब सभा की एक वर्ष में लगभग 60 से 70 दिनों के लिए बैठक के संदर्भ में बैठकों की संख्या की पर्याप्तता
  2. 2. सभा के वर्तमान कार्य विषयक नियमों की पर्याप्तता और अपेक्षित परिवर्तन, यदि कोई हो;
  3. विधायी प्रस्तावों पर अपने विचार प्रस्तुत करने और लोक महत्व के मुद्दे उठाने हेतु सदस्यों के लिए वर्तमान में उपलब्ध विभिन्न तंत्रों की पर्याप्तता और प्रभावोत्पादकता;
  4. सभा में वर्तमान में अनुसरण की जा रही विद्यमान प्रक्रियाओं की पर्याप्तता और प्रभावोत्पादकता;
  5. वाद विवादों में सदस्यों की उचित और व्यापक प्रतिभागिता को संभव बनाने के लिए अनुसरण किए जाने वाले मानक;
  6. यह सुनिश्चित करना कि सभा में वाद विवाद को समृद्ध बनाने के लिए सही पृष्ठभूमि और योग्यताओं वाले सदस्य भेजे जाएं;
  7. सभा के व्यवस्थित कार्यकरण के लिए कार्य विषयक नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए सदस्यों द्वारा स्वयं को अनुशासित रखा जाना सुनिश्चित करना;
  8. सभा के वाद विवादों में जागरूक योगदान को संभव बनाने के लिए सदस्यों को अवसंरचनात्मक सहायता की आवश्यकता;
  9. संपूर्ण कार्यवाही के दौरान सभा में और सभा की विभाग संबंधित स्थायी समितियों तथा अन्य समितियों की बैठकों में सदस्यों की पर्याप्त उपस्थिति सुनिश्चित करना; और
  10. सदस्यों के कार्यकरण को बेहतर बनाने और सभा की कार्यवाही के अधिक रोचक संचालन के लिए प्रौद्योगिकी को अपनाना

यह कहते हुए कि अविश्वास प्रस्तावों और धन विधेयको के मामलों को छोड़कर उच्च सदन और निम्न सदन को वस्तुतः समान अधिकार प्राप्त हैं, श्री नायडु ने कहा कि राज्यसभा की एक विशिष्ट भूमिका और अधिदेश है जो संविधान सभा में हुई चर्चाओं से विकसित हुआ। इनका मूल यह है कि सदस्यों को सभा के विचाराधीन प्रत्येक मुद्दे पर अपनी बुद्धिमता, जानकारी और विशेषज्ञता का प्रयोग करते हुए विविध परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करते हुए सभा की कार्यवाही को प्रबुद्ध चर्चाओं और वाद विवादों से समृद्ध बनाना चाहिए।

उच्च सदन की भूमिका पर श्री नायडु ने भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति और राज्यसभा के ज्ञानवृद्ध सदस्य को उद्धृत किया और कहा "राज्य सभा के सदस्यों के लिए यह वांछनीय होगा कि वे यह याद रखें कि उन्हें अवरोधक और निरर्थक बनने के मध्य एक उत्कृष्ट संतुलन बनाए रखना होगा। राज्यसभा दुर्भावना से ग्रस्त होकर लोकसभा द्वारा पारित किए गए प्रत्येक प्रस्ताव के लिए निषेधाधिकार का प्रयोग करके अवरोधक नहीं बन सकती और उसी प्रकार, इसे लोकसभा द्वारा पारित किए गए किसी भी प्रस्ताव को बिना सोचे समझे स्वीकृति भी प्रदान नहीं करनी चाहिए अन्यथा इसका अस्तित्व ही व्यर्थ हो जाएगा"।

श्री नायडु ने राज्यसभा में उचित गुणवत्ता और योग्यता वाले सदस्यों को भेजने और उन्हीं के नामनिर्देशन का भी आह्वान किया।

सभापति ने कहा कि 13 मई 1952 को आयोजित इसकी पहली बैठक से लेकर पिछले 249वें सत्र तक राज्यसभा ने 5,466 बैठकें की और 3,817 विधेयक पारित किए।

श्री नायडु ने अभी तक राज्यसभा के सदस्य रहे सभी 2,282 व्यक्तियों, पीठासीन अधिकारियों, पैनल के उपाध्यक्षों, मंत्रियों, सभा और विपक्ष के नेताओं और सभी अन्य संबंधितों को राज्यसभा की 67 वर्षों की यात्रा में उनकी प्रतिभागिता और योगदान के लिए बधाई दी।

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