मानव तस्करी न केवल एक सामाजिक बुराई है बल्कि मानवता के विरुद्ध एक हिंसक अपराध भी है, उपराष्ट्रपति ने कहा

हैदराबाद
जुलाई 28, 2019

मानव तस्करी के विरुद्ध लड़ाई तब तक जारी रखनी होगी जब तक इसके अंतिम पीड़ित को बचा न लिया जाए और उसका पुनर्वास न कर दिया जाए और उसके अंतिम अपराधी को सजा नहीं मिल जाए; उन्होंने यौन तस्करी के पीड़ितों के लिए बने आश्रय गृहों के गृह प्रबंधन पर प्रशिक्षण पुस्तिका जारी की; सुझाव दिया कि स्थानीय भाषाओं में भी इसका अनुवाद किया जाए

भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु ने सरकारी एजेंसियों, नागरिक समाज और गैर सरकारी संगठनों से अपने प्रयासों को समन्वित करने और मानव तस्करी के विरुद्ध अपनी लड़ाई को अटल, दृढ़ और अनवरत तरीके से आगे ले जाने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि मानव तस्करी के विरुद्ध लड़ाई तब तक जारी रखनी होगी जब तक अंतिम पीड़ित को बचा नहीं लिया जाता और उसका पुनर्वास नहीं कर दिया जाता तथा इसके अंतिम अपराधी को सजा नहीं मिल जाती।

डॉ. सुनीता कृष्णन और उनके एनजीओ 'प्रज्जवला' द्वारा यौन तस्करी के पीड़ितों के लिए बने आश्रय गृहों के गृह प्रबंधन के लिए प्रकाशित की गई प्रशिक्षण पुस्तिका को आज हैदराबाद में जारी करने के बाद आयोजन में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि मानव तस्करी केवल एक सामाजिक बुराई नहीं बल्कि उससे भी कहीं अधिक है, और वह स्वयं मानवता के ही विरुद्ध एक हिंसक अपराध है। उन्होंने लोगों की बेहतर समझ के लिए प्रशिक्षण पुस्तिका का स्थानीय भाषाओं में भी अनुवाद किए जाने का सुझाव दिया।

उन्होंने कहा, “मानव तस्करी एक ऐसा खतरा है जो मानव अधिकारों, न्याय, गरिमा के सभी बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और इसे अक्सर आधुनिक काल की दासता कहा जाता है”।

उनका कहना था कि जो मौलिक अधिकार हमारे संविधान की आधारशिला का निर्माण करते हैं, वे प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता के अखंडनीय अधिकार और शोषण तथा बलात्श्रम, व तस्करी के सभी रूपों के प्रति अविच्छेद्य अधिकार की गारंटी देते हैं।

यह मत रखते हुए कि हमारे देश के प्रत्येक नागरिक के पास एक सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है उपराष्ट्रपति ने कहा कि हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को यह पावन दायित्व सौंपता है कि वह मानव तस्करी के उन्मूलन के लिए अथक प्रयास करे।

उन्होंने कहा, “पूरे समाज को इस कार्य के लिए एकजुट होना होगा। इस अपराध की प्रकृति और पीड़ितों को बचाने और उनका पुनर्वास करने पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए हमें यथासंभव प्रयास करने होंगे”।

श्री नायडु ने लोगों से मानव तस्करी के पीड़ितों को सामान्य जीवन जीने और समाज की मुख्यधारा से फिर से जुड़ने के लिए सहायता और समर्थन प्रदान करने के लिए

यह कहते हुए कि तस्करी से मुक्त कराये गए व्यक्तियों को विभिन्न सेवाएं प्रदान करने वाले सभी हितधारकों के लिए पीड़ितों और तस्करी से उन पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात है, उपराष्ट्रपति ने विचार व्यक्त किया कि सभी हितधारकों को पीड़ितों के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, वित्तीय और आध्यात्मिक स्वास्थ्य पर उनके साथ हुई हिंसा, क्रूरता, दुर्व्यवहार और शोषण से पड़ने वाले प्रभाव को पहचानना होगा।

श्री नायडु ने कहा कि तस्करी से मुक्त कराए गए व्यक्ति स्वस्थ हो पाएं और सामान्य जीवन जी सकें इसके लिए एक समर्थनकारी और सहायक तंत्र का सृजन करना और उन्हे शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना सबसे महत्वपूर्ण बात है।

उन्होंने कहा, “बाल पीड़ितों के मामले में विशेष ध्यान रखे जाने की जरूरत है क्योंकि वे अत्यधिक सदमे और आघात से गुज़रते हैं। उन्हें पूरी तरह से ठीक होने के लिए उच्च स्तर की देखभाल की आवश्यकता होगी”।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि इनकी देखभाल और सुरक्षा के लिए बनाए गए सुरक्षा गृह ऐसे गंभीर अत्याचारपूर्ण हालातों से आने वाले पीड़ितों के समग्र पुनर्वास के लिए एक समर्थनकारी माहौल पैदा करने के मामले में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, “जब पीड़ितों को शोषणकारी स्थितियों में से मुक्त कराया जाता है और वे ऐसी हिंसा के परिणामस्वरूप गंभीर प्रभावों से पीड़ित होते हैं, तब अंतत: अपने पुनर्वास की दिशा में उनकी पहली और सबसे प्रमुख जरूरत एक सुरक्षित स्थान और आश्रय की होती है”।

प्रज्जवला के प्रयासों को प्रोत्साहन और सहयोग देने के उद्देश्य से उपराष्ट्रपति ने अपना एक महीने का वेतन इस संगठन जो मानव तस्करी के पीड़ितों की देखभाल करता आ रहा है, को देने की घोषणा की ।

इससे पहले उपराष्ट्रपति ने मानव तस्करी पर एक प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।

महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री सुश्री देबाश्री चौधरी, प्रज्जवला एनजीओ की संस्थापक डॉ. सुनीता कृष्णन और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

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