माननीय राष्ट्रपति के चुनिंदा भाषणों पर पुस्तक में उनकी विद्वत्ता को संकलित किया गया है।

नई दिल्ली
सितम्बर 6, 2019

उपराष्ट्रपति द्वारा भारत के माननीय राष्ट्रपति के चुनिंदा भाषणों के संकलन का लोकार्पण
राष्ट्रपति और मैं दोनों सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों का पालन अत्यंत आवश्यक मानते हैं – उपराष्ट्रपति;
भारत इतिहास के महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है जहां से वह सर्वस्पर्शी विकास सुनिश्चित कर सकता है - उपराष्ट्रपति

उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु ने आज समाज में व्याप्त कुरीतियों पर चिंता व्यक्त करते हुए लोगों से आग्रह किया कि वे अस्पृश्यता और लैंगिक भेदभाव जैसे सामाजिक विकारों के विरूद्ध जन अभियान में सक्रिय भागीदारी करें। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि सर्वस्पर्शी और स्थायी विकास को सुनिश्चित करने के लिए हम देश में उपलब्ध मेधा, नये विचारों और क्षमता को साथ में लाऐं और इसके लिए एक कारगर व्यवस्था विकसित करें।
आज नई दिल्ली के प्रवासी भारतीय केन्द्र में माननीय राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद के चुनिंदा भाषणों के संकलन “The Repubican Ethic (Vol. 2)” तथा “लोकतंत्र के स्वर (खंड 2)” का लोकार्पण करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत इतिहास के महत्वपूर्ण मोड़ पर है जहां से वह सभी बाधाओं और चुनौतियों को पार कर, समावेशी विकास सुनिश्चित कर सकता है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है और वे स्वयं तथा माननीय राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविन्द इस विषय की गंभीरता पर एकमत रहे हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय प्राथमिकतओं जैसे स्वच्छ भारत, सुशिक्षित और प्रशिक्षित भारत, स्वस्थ भारत, नवोन्मेषी भारत तथा सौहार्दपूर्ण, सशक्त भारत जैसे विषयों पर उनके और राष्ट्रपति के विचार समान हैं।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रपति जी के भाषणों में राष्ट्र की भावना, उसकी आकांक्षाऐं, उसके मूल्य, उसकी दृष्टि परिलक्षित होती है। विचारों की स्पष्टता, उनका नीर-क्षीर विवेक उनके भाषणों में सदैव दिखता है - फिर वे चाहे महत्वपूर्ण अवसरों पर राष्ट्र को संबोधित कर रहे हों या अपनी विदेश यात्राओं के दौरान विशिष्ट अतिथियों को संबोधन कर रहे हों या फिर देश के युवाओं को शिक्षा और नैतिक मूल्यों के प्रति सजग कर रहे हों।

श्री नायडु ने कहा कि राष्ट्रपति जी देश को सदैव हमारे अन्नदाताओं-किसान, वैज्ञानिक, उद्यमी और जवानों के उपकार और योगदान के प्रति कृतज्ञ रहने का आग्रह करते हैं।.

उपराष्ट्रपति ने कहा कि माननीय राष्ट्रपति के भाषणों में शिक्षा पर विशेष महत्व रहता है। श्री कोविंद के लिए शिक्षा, आंकड़े और तथ्य मात्र नहीं है बल्कि उनके लिए शिक्षा सशक्तिकरण का माध्यम है। राष्ट्रपति जी का मानना रहा है कि विश्वविद्यालय नये भारत के नये शक्ति केन्द्र बनें। वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों से उनको विशेष अपेक्षा रहती है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रपति नौकरशाही से करुणा और सर्मपण भाव से हमारे लोकतांत्रिक संविधान के लाभ जनता तक पहुंचाने की अपेक्षा रखते हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के चुनिंदा भाषणों का संकलन उनकी विद्वत्ता और विवेक का दस्तावेज है।

शांतिपूर्ण माध्यमों से भारत की संप्रभुता की सुरक्षा करने पर राष्ट्रपति के वक्तव्य को उद्धृत करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत ने सदैव ही शांति और सहयोग के मार्ग को अपनाया है लेकिन साथ ही उन्होंने चेताया भी कि हम किसी भी आक्रमण का मुहतोड़ जवाब देने में भी सक्षम हैं।

इस अवसर पर सूचना और प्रसारण मंत्री, श्री प्रकाश जावड़ेकर, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री श्री थावरचंद गहलौत सहित सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सचिव और उच्च अधिकारियों सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

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