प्राचीन ज्ञान के प्रसार के लिए भारत में सांस्कृलतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता : उपराष्ट्रपति

नई दिल्ली
जुलाई 7, 2019

आदि शंकराचार्य और स्वाममी विवेकानंद जैसे आध्यात्मिक गुरुओं ने हमारे नैतिक मूल्यों की नींव रखी ;
दस भाषाओं में लिखी पुस्तेक ‘विवेकदीपिनी’ का विमोचन किया

भारत के उपराष्ट्रपति, श्री एम वेंकैया नायडु ने कहा है कि भारतीय दर्शन के उत्कृसष्टं विचारों को आम जन तक पहुंचाने के लिए देश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण के साथ ही जागरूकता और ज्ञान-साझा करने के लिए व्याापक स्तजर पर अभियान चलाने की आवश्यशकता है।

उन्होंकने "शेयर और केयर" को भारतीय दर्शन का मूल बताते हुए एक ऐसे समाज के निर्माण की आवश्य कता पर बल दिया जो वास्त‍व में भारतीय दर्शन को परिलक्षित करता हो।

अंग्रेजी और भारत की नौ भाषाओं में लिखी गई सूक्तियों की लघु पुस्तिका 'विवेकदीपिनी' जिसमें भारतीय ज्ञान की झलक है, का विमोचन करने के पश्चात् उपराष्ट्रपति ने उपस्थित जनसमूह से कहा कि यह भारतीयों का सौभाग्य है कि शंकराचार्य और स्वामी विवेकानंद जैसे आध्यात्मिक गुरूओं ने हमारे देश के नैतिक मूल्योंक की नींव रखी।

श्री नायडु ने कहा कि आदि शंकराचार्य द्वारा प्रश्नोजत्तलर रत्नमालिका में भारतीय ज्ञान पर जो कुछ लिखा गया है उसकी धर्म और समुदाय विशेष से इतर सार्वभौमिक प्रासंगिकता है और ये सूक्तियाँ विश्वर के प्रति भारतीय सोच के नैतिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती हैं।

उन्हों्ने कहा "आप सहमत होंगे कि ज्ञान की ये सूक्तियां वास्तव में सार्वभौमिक हैं। यह एक ऐसी बौद्धिक विरासत है जिस पर हर भारतीय को न केवल गर्व करना चाहिए बल्कि दैनिक जीवन में इन मूल्यों को आत्मासात भी करना चाहिए।”

श्री नायडु ने कहा कि वे चाहते हैं कि वेदांत भारती जैसे गैर-सरकारी संगठनों के साथ देश भर के स्कूल और कॉलेज भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में समाहित सहिष्णुता, समावेश, सद्भाव, शांति, मंगल-भावना नैतिक आचरण, उत्कृष्टता और सहानुभूति के सार्वभौमिक संदेश को जोर-शोर से और स्पष्टता के साथ फैलाने का काम करें।

भारत के प्राचीन ज्ञान के जिस खजाने का सकारात्मसक प्रभाव पूरी दुनिया अनुभव करती है, उसकी फिर से खोज करने पर बल देते हुए श्री नायडु ने कहा कि यह एक ऐसी कड़ी है जो हमें अतीत से जोड़ती है। उन्होंने कहा, "यह एक ऐसा बहुमूल्यी खजाना है, जो हमें वैश्विक स्तर पर शांति, नैतिक आचरण और सतत विकास का प्रतिनिधित्वा करने के लिए प्रेरित करता है।"

उपराष्ट्र पति ने विवेकदीपिनी को नौ भारतीय भाषाओं में अनूदित करने के लिए प्रकाशकों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि प्राचीन भारतीय ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए आगे ऐसे और प्रयास करना बहुत जरूरी है।

उपराष्ट्रनपति ने श्री आदि शंकाराचार्य के ज्ञानपूर्ण संदेशों का अंग्रेजी, कन्नड़, हिंदी, तमिल, बांग्लाग, तेलुगु, मलयालम, मराठी, उड़ीया और गुजराती भाषाओं के माध्यथम से प्रचार-प्रसार करने के लिए वेदांत भारती की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि ये संदेश लोगों तक अपने सही अर्थों में पहुंचने चाहिएं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि सभी भारतीय भाषाओं में विवेकदीपिनी का अनुवाद किया जाएगा।

मातृभाषाओं के उपयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल देते हुए श्री नायडु ने कहा कि भाषा और संस्कृति का आपस में गहरा संबंध है।

लैं‍गिक और अन्य सभी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करने का आह्वान करते हुए श्री नायडु ने जातिवाद को समाज का सबसे बड़ा अभिशाप बताते हुए कहा कि जितनी जल्दी हो सके इसे खत्मन कर दिया जाना चाहिए।

यदाथोर श्री योगनादेश्वर सरस्वती मठ के पीठाधिपति श्री श्री शंकर भारती स्वामीजी, वेदांत भारती के निदेशक, डॉ. श्रीधर भट आइनाकाई, वेदांत भारती के ट्रस्टी, श्री ए रामास्वामी, श्री एसएस नागानंद और श्री सीएस गोपालकृष्ण तथा अन्यर गणमान्यर लोग भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

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