नए भारत का निर्माण एक समावेशी प्रक्रिया होनी चाहिए: उपराष्ट्रपति

नई दिल्ली
दिसम्बर 17, 2019

उन्होंतने कहा कि नया भारत नवाचार और ज्ञान का केंद्र होगा
दिल्ली में छठा रवीन्द्रनाथ टैगोर स्मृति व्याख्यान दिया
शिक्षा प्रणाली में सहजता, रचनात्मकता और सौंदर्यपरक संवेदनशीलता के घटक शामिल किए जाने की जरूरत है: उपराष्ट्रपति
उपराष्ट्रपति ने सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आह्वान किया और भारतीय सभ्यता के मूल्यों और परंपराओं के संरक्षण और उन्हेंक बढ़ावा देने की जरूरत पर जोर दिया

भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम वेंकैया नायडु ने कहा कि नए भारत का निर्माण एक समावेशी प्रक्रिया होनी चाहिए और उन्होंने लोगों से इसे साकार करने के लिए निरंतर प्रयास करने का आह्वान किया।

शिमला स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी द्वारा नई दिल्ली में आयोजित छठा रवींद्रनाथ टैगोर स्मृसति व्यााख्यागन देते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने नए भारत के दृष्टिकोण को रेखांकित किया है और 2022 तक न्यू वाइब्रेंट इंडिया का निर्माण करने के लिए प्रयास किया है।

गरीबों और पददलित तबकों के उत्थान के उद्देश्य को देखते हुए उन्होंने कहा कि "यह तभी संभव है जब 1.25 बिलियन भारतीय एक 'संकल्पित भारत', 'सशक्त भारत', 'स्वच्छ भारत ' और 'श्रेष्ठ भारत'का निर्माण करने के प्रयास में शामिल हों। "

रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा देखे गए इसी प्रकार के स्वप्न का स्मलरण करते हुए श्री नायडु ने उनका उद्धरण देते हुए कहा कि "भारत में वास्त विक चुनौती यह है कि हमें खुद को पूरे देश का निर्माण करना है। ऐसे देश का निर्माण जिसमें सभी समुदाय और व्यक्ति भागीदारी करेंगे।"

यह उल्लेख करते हुए कि वह दिन बहुत ही गौरवशाली दिन होगा जब देश 2022 में अपनी आजादी के 75वें साल का जश्न मनाएगा, उप-राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि नया भारत नवाचार और ज्ञान का केंद्र होगा, जिसमें प्रतिभाशाली युवा, डिजिटली रूप से सशक्त उद्यमी, टेक्नोक्रेट, वैज्ञानिक और शिक्षाविद शामिल होंगे और जलवायु परिवर्तन से लेकर कृषि उत्पादकता बढ़ाने जैसी विभिन्न समस्याओं के स्वदेशी समाधान खोजने के लिए मिलकर काम करेंगे।

रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित संस्थाओं का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्र पति ने कहा कि शांति निकेतन शिक्षा को जीवन से जोड़ने, छात्रों को प्रकृति से जोड़ने और सामंजस्यपूर्ण तथा समग्र व्यक्तित्व का विकास करने का एक प्रयोग था। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली में सहजता, रचनात्मकता और सौंदर्यपरक संवेदनशीलता के घटकों को शामिल करने की जरूरत है।

गुरुदेव टैगोर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि रवींद्रनाथ टैगोर का कालातीत दृष्टिकोण भारत और विश्व के लिए आज भी बहुत प्रासंगिक है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि रवींद्रनाथ टैगोर ने शिक्षा, प्रकृति, राष्ट्रवाद, अंतर्राष्ट्रीयतावाद, नारीवाद, धर्म, भाषा, जाति व्यवस्था जैसे विभिन्न विषयों पर अपने विचार और अपने दृष्टिकोणों का वर्णन किया है जो उनकी बहुआयामी प्रतिभा के विस्तृत कार्य-क्षेत्र को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि "वे वास्तव में एक विश्व कवि थे जो प्राचीन वैदिक ऋषियों के सांचे में ढले थे और जिन्होंने हमें "वसुधैव कुटुम्बकम" का सार्वभौमिक दृष्टिकोण प्रदान किया"।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि गुरूदेव के बुद्धिमत्तापूर्ण उपदेशों पर ध्यान देना चाहिए कि हम किस प्रकार महान परंपराओं से जुड़कर, श्रेष्ठ विचारों को आकर्षित करके और अपनी शक्तियों को पुनः खोजकर भारतीय शिक्षा को पुनर्जीवित कर सकते हैं।

उन्होंनने सदियों पुरानी भारतीय सभ्यता के मूल्यों, परंपराओं और लोकाचारों के संरक्षण और उन्हें बढ़ावा देने का आह्वान करते हुए सांस्कृतिक पुनरुत्थान की जरूरत पर जोर दिया।

उन्होंहने उल्लेाख किया कि रवींद्रनाथ टैगोर ने गांधी जी के ग्राम स्वोराज्यं के दृष्टिकोण को साझा किया और वास्तविक आजादी के लिए ग्रामीण क्षेत्र के विकास को महत्वधपूर्ण कदम बताते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि टैगोर के लेखन में "रचनात्मक कार्यक्रम" और ग्रामीण उत्था न या ग्रामीण स्वराज की गूंज सुनाई देती है।

उपराष्ट्रापति ने कहा कि रवींद्रनाथ टैगोर को विश्वास था कि ज्ञान देश के बदलाव का मुख्य कारक है और इसलिए उन्होंने वैज्ञानिक अनुसंधान की वकालत की जिससे ग्रामीणों के जीवन की गुणवत्ताल में सुधार लाने में मदद मिले। टैगोर को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि ,"चीजों में बदलाव लाने का एकमात्र तरीका यह है कि उपेक्षित गांवों में अर्थव्य वस्थान, कृषि, स्वांस्य्ने और अन्यल सभी रोजमर्रा के विज्ञान का नव अर्जित ज्ञान लागू किया जाए।

इस अवसर पर उपराष्ट्र पति ने प्रो. एम. परांजपे द्वारा लिखित पुस्तक 'स्वामी विवेकानंद- हिंदुइज़्म एंड इंडियाज रोड टू मॉडर्निटी ’ का विमोचन किया।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी के अध्यक्ष प्रोफेसर कपिल कपूर, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य-सचिव श्री सचिदानंद जोशी, आईआईएएस के निदेशक प्रोफेसर मकरंद आर परांजपे, आईआईएएस के सचिव डा. वी के तिवारी भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

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