खादी को बढ़ावा देने की आवश्यकता है अंतरराष्ट्रीय गांधी पुरस्कार, 2017 प्रदान किये

सेवाग्राम, वर्धा, महाराष्ट्र
फ़रवरी 25, 2018

गांधीजी के विचार और कार्य आज भी प्रासंगिक हैं : उपराष्ट्रपति

गांधीजी के दर्शन के विषय में विचार और मज़बूत हुए;

भारत के उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु ने कहा है कि गांधीजी के विचार और कार्य आज भी प्रासंगिक हैं I वे आज गाँधी मेमोरियल लेप्रसी फाउंडेशन द्वारा सेवाग्राम, वर्धा, महाराष्ट्र में आयोजित कार्यक्रम में डा. एम.डी. गुप्ते को वैश्विक कुष्ठरोग उन्मूलन कार्यक्रम में उत्कृष्ट योगदान देने और डा. अतुल शाह को कुष्ठरोग से प्रभावित व्यक्तियों के कष्ट को कम करने हेतु लोकोपकारी सेवा प्रदान करने के लिए अंतरराष्ट्रीय गाँधी पुरस्कार 2017 प्रदान करने के बाद उपस्थित व्यक्तियों को संबोधित कर रहे थे I महाराष्ट्र के ऊर्जा और राज्य उत्पाद शुल्क मंत्री, श्री चंद्रशेखर बावनकुले और अन्य पदाधिकारी इस अवसर पर उपस्थित थे I

उपराष्ट्रपति जी ने कहा कि कुष्ठरोग एक ऐसी बीमारी है जो काफी लम्बे समय से हमारे देश में व्याप्त हैI उन्होंने आगे कहा कि दृष्टिगोचर विकृतियों के साथ-साथ जानकारी और उपचार के अभाव में यह बीमारी एक खतरनाक बीमारी बन गयी है I उन्होंने आगे कहा कि कुष्ठरोग के साथ बहुत सारा भय, अंधविश्वास और कलंक जुड़ा हुआ है I

उपराष्ट्रपति जी ने कहा कि गांधीजी ने उन दिनों भी कुष्ठरोगियों और कुष्ठरोग से सम्बंधित कार्यों में काफी रूचि दिखाई जब कुष्ठरोग के लिए कोई विशिष्ट इलाज नहीं था I उन्होंने आगे कहा कि अब समय की मांग है कि हम कुष्ठरोग के मामलों की शीघ्र पहचान करने, उपयुक्त उपचार तक निष्पक्ष पहुँच प्रदान करने और एकीकृत कुष्ठरोग सेवा प्रदान करने हेतु हमारे प्रयासों में तेज़ी लाये I उन्होंने कहा कि जिन व्यक्तियों के साथ सामजिक पक्षपात हुआ है, उन्हें पक्षसमर्थन और सूचना प्रदान करने के माध्यम से सशक्त बनाने की आवश्यकता है I

उपराष्ट्रपति जी ने गांधीजी को उद्धृत करते हुए कहा -"हमें अपने देश और विश्व की बहुसांस्कृतिक प्रकृति को बनाए रखना होगा I मैं नहीं चाहता की मेरे घर के चारों ओर दीवारें खड़ी कर दी जायें और मेरी खिड़कियों को बंद कर दिया जाये I मैं चाहता हूं कि सभी देशों की संस्कृतियों की बयारें मेरे घर के आस-पास यथासंभव अनुकूल रूप से बहती रहें I परन्तु मैं उनके साथ बह नहीं जाऊंगा और मेरे पैर अपनी देश की धरती पर ही जमे रहेंगे I"

उपराष्ट्रपति जी ने कहा कि समय के साथ-साथ, कुष्ठरोग का अभिशाप मानवता पर एक धब्बा बनकर रह गया है I उन्होंने आगे कहा कि इस बीमारी की चिकित्सीय स्थिति से अधिक चिंता का विषय है, उससे जुड़ा सामाजिक कलंक I इस बीमारी के उपचार की जानकारी न होने और इसके सम्बन्ध में लगातार प्रचलित मिथकों के कारण कई बार कुष्ठरोग से पीड़ित व्यक्तियों का सामजिक बहिष्कार किया जाता है जिससे इस रोग से पीड़ित व्यक्तियों को बहुत कष्ट होता है I

उपराष्ट्रपति जी ने कहा कि स्वास्थ्य देखभाल कार्यकर्ताओं को त्वचा में ज़ख्म या संवेदिक परिवर्तनों वाले रोगियों में कुष्ठरोग की पहचान की संभावना के बारे में सजग रहने की आवश्यकता है I उन्होंने आगे कहा कि प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल और साथ ही विशेषज्ञ सेवाओं से सम्बंधित कार्यकर्ताओं को कुष्ठरोग की पहचान और प्रबंधन के बारे में जागरूक रहने और प्रशिक्षण प्राप्त करने की आवश्यकता हैI उन्होंने यह भी कहा कि नैदानिक परीक्षणों और नए टीकों के विकास के सम्बन्ध में शोध करवाने की भी आवश्यकता है I

उपराष्ट्रपति जी ने कहा कि इस रोग की शीघ्र पहचान को बढ़ावा देने हेतु पूरे समुदाय को जागरूक बनाने की भी अत्यंत आवश्यकता है I उन्होंने आगे कहा कि रोगियों को निदान को छुपाने से रोकने हेतु इससे जुड़े कलंक को कम करने के प्रयास आवश्यक हैं I उन्होंने आगे कहा कि स्नायु कार्यक्षमता विकार वाले रोगियों में अक्षमता की रोकथाम और उनका समुदाय में पुनर्वास महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं I

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