उपराष्ट्रपति श्री नायडु ने कोरोना से मिली सीख के आधार पर जीवन जीने के नए तरीकों का आह्वान किया

नई दिल्ली
मई 18, 2020

उन्होंने जीवन और मानवता के प्रति नए दृष्टिकोण का आह्वान किया
बीमारी या अर्थव्यवस्था सभी को नुकसान पहुंचाती है; उपराष्ट्रपति ने कहा कि परस्पर रूप से जुड़ कर जीना ही इसकी प्रमुख सीख है
कोविड से दार्शनिक और नैतिक मुद्दे सामने आए; आर्थिक त्रुटियों के प्रभाव उजागर हुए
उन्होंने कोविड को एक सभ्यतागत मुद्दा बताया
श्री नायडु ने कोरोना समय में जीवन के लिए 12-नए बिंदु सुझाए

भारत के उपराष्ट्रपति और राज्य सभा के सभापति श्री एम. वेंकैया नायडु ने कोरोना समय में जीवन जीने के नए तरीकों को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया और कोरोना महामारी से अब तक मिले सबक से सीखते हुए इस नई सामान्य स्थिति में वायरस से निपटने के लिए 12 सूत्रीय रूपरेखा का सुझाव दिया। पहले जितनी अपेक्षा थी, अब उससे अधिक समय तक वायरस के रहने के संकेत मिलने के बीच उन्होंने जीवन और मानवता के प्रति नए दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

प्रतिबंधों में काफी हद तक ढील के साथ बीती रात लॉक डाउन 4.0 की घोषणा के ठीक बाद श्री नायडु ने फेसबुक पर एक विस्तृत 1,539 शब्द का लेख लिखा जो कि कोविड-19 महामारी से सामने आए दार्शनिक और नैतिक मुद्दों और अब आगे किस तरह से जीवन जीने की जरूरत है, से संबंधित है। श्री नायडु का मुख्य जोर इस पर है कि जीवन को अलगाव में नहीं जीया जा सकता है और वायरस के प्रकोप ने जीवन की परस्पर-संबद्धता को उजागर किया है। उन्होंने कहा; ".. जो किसी भी व्यक्ति को कहीं भी प्रभावित करता है वह हर जगह हर किसी को प्रभावित करता है, चाहे वह बीमारी हो या अर्थव्यवस्था"।

'कोरोना से पहले' जीवन की प्रकृति का लेखा-जोखा देते हुए श्री नायडु ने कहा कि मनुष्य अपने सुख और भौतिक उन्नति की अपनी खोज में एक अकेला व्यक्ति बनकर उभरा है जिसमें उसने परिवार और समाज का मूल्य कम करके उसे केवल एक सहायक बना दिया है और अहंकार से भरे उसके विश्वास ने उसे यह भरोसा दिलाया है कि वह दूसरों के जीवन से बेखबर केवल अपने आप पर निर्भर रहते हुए अकेले रह सकता है। उन्होंने लिखा; "महामारी द्वारा पूर्व समय में मानवता को हुई क्षति के मुकाबले अब महामारी से लड़ने के लिए बेहतर साधनों से लैस होकर और जीन-सुधार, कृत्रिम बद्धिमता, विशाल डेटा आदि के साथ सशक्त होकर, आदमी भगवान बनना चाह रहा था।"

"कोरोना के बाद" जीवन पर श्री नायडु ने कहा कि कोरोना ने अपने बल पर जीने के मूल सिद्धांतों को हिला दिया है और प्रकृति और साथी मनुष्यों के साथ सामंजस्य बनाकर रहने की आवश्यकता को दर्शाया है। उन्होंने समुक्ति की कि “अदृश्य सूक्ष्म जीव ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जीवन बहुत जल्दी बदल सकता है। इससे जीवन में चलने वाली अनिश्चितता पूरी तरह सामने आयी है।"

उपराष्ट्रपति ने महसूस किया कि महामारी से जीवन के अर्थ और उद्देश्य के बारे में सवाल उठे हैं, जिसमें साथी प्राणियों के साथ संबंधों की प्रकृति और विकास के मौजूदा मार्गों से जुड़े नैतिक मुद्दे, इनके प्रकृति और समानता पर प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, शामिल हैं। उन्होंने कहा; "वायरस ने प्रभाव के संदर्भ में समाज में विकास के मार्ग द्वारा बनाए गए आर्थिक दोषों के परिणामों पर प्रकाश डाला है। अनिश्चितता लोगों को परेशान करती रहती है। अनिश्चितता चिंता का ज्ञात स्रोत है जो मनोवैज्ञानिक समस्याओं को जन्म दे सकता है। इस समस्या से कैसे निपटा जाए? शांत रहिए और आश्वस्त रहिए और जीवन का एक नया सामान्य तरीका अपनाइए।"

यह बताते हुए कि किसी भी सभ्यता का लक्ष्य मनुष्य के जीवित रहने की संभावना को बढ़ाना है, श्री नायडु ने जोर देकर कहा कि कोरोना चुनौती व्यक्तिगत जीवन की तुलना से अधिक सभ्यता से संबंधित मुद्दा है और वर्तमान सभ्यता को बचाने के लिए जीवन के नए मानदंडों और लोकाचारों को विकसित किया जाना चाहिए।

यह देखते हुए कि जीवन को लंबे समय तक घरों में बंद रहकर नहीं जीया जा सकता है, श्री नायडु ने लॉकडाउन 4.0 के लिए कल रात घोषित की गई नई छूट का स्वागत किया। एचआईवी वायरस से संक्रमित लोगों के बारे में जिक्र करते हुए, जिसकी लंबे समय से दवा नहीं है पर आदतों में परिवर्तन से जिसका प्रभाव कम हुआ है, श्री नायडु ने लोगों से आग्रह किया कि यदि कोरोना वायरस पहले अनुमानित समय की तुलना में ज्यादा समय तक लोगों के बीच रहता है, तो आदतों को बदलकर और जीवन और साथी मनुष्यों के प्रति दृष्टिकोण को बदलकर कोरोना वायरस का सामना करना सीखें।

श्री नायडु ने कोरोना काल के दौरान 12 बिन्दुओं वाले एक नए सामान्य जीवन का सुझाव दिया। जिसमें प्रकृति और साथी प्राणियों के साथ सद्भाव से रहना, यह जानना कि जीवन की सुरक्षा और संरक्षा परस्पर संबंधित हैं, वायरस के प्रसार पर तर्कसंगत रूप से हर कदम या कार्रवाई के प्रभाव का विश्लेषण करना, स्थिति पर आवेगपूर्ण ढंग से प्रतिक्रिया न करना और इसके बजाय विज्ञान पर भरोसा रखते हुए इस विश्वास में जीना कि इस समस्या का समाधान आ सकता है, अब तक प्रारंभ हो चुके व्यवहार संबंधी बदलावों का सख्ती से पालन जैसे मास्क पहनना, शारीरिक दूरी बनाए रखना और स्वच्छता सुनिश्चित करना, दोषारोपण को रोकना ताकि संक्रमित स्वेच्छा से उपचार के लिए आएं, वायरस के वाहक के रूप में साथी नागरिकों के विरुद्ध दुष्प्रचार और पूर्वाग्रहों को रोकना और सामूहिक विवशता की भावना को साझा नियति के साथ परस्पर रूप से जुड़े हुए जीवन के गुण की भावना में बदलना।

उपराष्ट्रपति ने सभी प्रकार के मीडिया का आह्वान किया कि वे वायरस और बीमारी के बारे में सही और वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करें न कि इसे एक आपदा के रूप पेश करें।

श्री वेंकैया नायडु ने लोगों से “अलग तरह से जीवन जीने और सुरक्षित रहने” का आह्वान किया।

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