उपराष्ट्रपति ने राजनीतिक दलों से आग्रह किया कि वे अपने चुनाव घोषणापत्रों में सांसदों और विधायकों के लिए आचार संहिता को शामिल करें

नई दिल्ली
अगस्त 9, 2019

संसद और विधान सभाओं में व्यवधान के कारण जनता में चिंता पैदा होती है ;
कार्यवाही के सुचारू संचालन के लिए सत्तापक्ष और प्रतिपक्षों से आपस में लगातार संवाद करने को कहा

उपराष्ट्रपति और राज्य सभा के सभापति श्री एम. वेंकैया नायडु ने सभी राजनीतिक दलों से आग्रह किया है कि वे अपने चुनाव घोषणापत्रों में सांसदों और विधायकों सहित सभी जन प्रतिनिधियों के लिए आचार संहिता को शामिल करें।

आचार संहिता में ये नियम शामिल किए जाए कि सदस्य सदन में आसन के सामने हंगामा नहीं करेंगे, नारेबाजी नहीं करेंगे, कार्यवाही में व्यावधान उपस्थित नहीं करेंगे और कागज को फाड़ने तथा उन्हे सदन में फेंकने जैसा उद्दण्ड व्यवहार नहीं करेंगे।

श्री नायडु ने आज उपराष्ट्रपति भवन में राज्य सभा के वरिष्ठ अधिकारियों और मीडिया को दोपहर के भोजन पर आमंत्रित किया था। इस अवसर पर उन्होंने संसद के हाल ही में समाप्त हुए सत्र की सफलता पर प्रसन्नता जताई। उन्होंने कहा कि राज्य सभा में इस बार सत्र के दौरान जितने प्रश्न उठाए गए और उत्तर दिए गए, विशेष उल्लेख और शून्य काल उल्लेख किए गए वह एक प्रकार से ऐतिहासिक है।

उन्होंने कहा कि विधायी कार्य निष्पादन मामले में राज्य सभा का हाल ही में समाप्त हुआ सत्र, जिसमें 35 बैठकों के दौरान 32 विधेयक पारित किए गए, पिछले 17 वर्षों में सर्वोत्तम रहा।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि सभी राजनीतिक दलों का नेतृत्व और सांसद क्रियाशील संसद के महत्व को पहचानेंगे और हाल ही में समाप्त सत्र की तरह आगे भी सकारात्मक गतिशीलता को बनाए रखेंगे।

राज्य सभा के सभापति ने कहा कि वे हमेशा इस बात पर जोर देते रहे हैं कि सदस्य चर्चा में भाग लें, वाद-विवाद करें और निर्णय लें तथा संसद एवं विधान सभाओं की कार्रवाई में कोई व्यवधान या अड़चन न डालें, क्योंकि इस तरह के व्यवहार से लोगों में चिंता पैदा होती है।

श्री नायडु ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि कुछ राज्यों में विपक्षी दलों के भीतर सदन का बहिष्कार करने की प्रवृति देखी जा रही है, जबकि कुछ ऐसी घटनाएं भी हुईं हैं जहां विपक्ष को बाहर भेज दिया गया है। कुछ राज्यों में, विधान सभा की बैठक थोड़े दिनों के लिए बुलाई जाती है, जबकि कुछ अन्य विधानसभाओं में लगातार व्यवधान होता रहता है।

उपराष्ट्रपति ने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे संसद और विधानसभाओं की कार्यवाही के सुचारू संचालन में सहयोग करें और यह भी सुनिश्चित करें कि वाद-विवाद के स्तर में सुधार हो। उन्होंने कहा, "लोगों का ऐसा मत है कि सार्वजनिक चर्चा का स्तर गिर रहा है।"

यह कहते हुए कि राजनीतिक दल केवल एक-दूसरे के विरोधी हैं, दुश्मन नहीं, उनका दृढ़ विचार था कि सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष को लगातार आपस में संवाद करना चाहिए, ताकि संसद और विधानसभाओं की कार्यवाही सुचारु रूप से चल सके।

यह कहते हुए कि संसदीय लोकतंत्र का अर्थ लोगों के प्रति सुशासन के माध्यम से उत्तरदेयता सुनिश्चित करना है, श्री नायडु ने ‘विधान, विचारशीलता और उत्तरदेयता’ को विधान सभाओं के तीन महत्वपूर्ण कार्यो के रूप में वर्णित किया। उन्होंने कहा, ‘हमें देश और जनता की बेहतरी के लिए आवश्यक कानून बनाने चाहिए, लोकहित के मुद्दों का सम्बोधन और उन पर चर्चा करनी चाहिए और वर्तमान सरकार के उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करना चाहिए। "

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