उपराष्ट्रपति ने जाति-विहीन एवं वर्ग-विहीन समाज के निर्माण का आह्वान किया

वर्कला, केरल
दिसम्बर 30, 2019

जाति व्यवस्था को समाप्त करने का आंदोलन समाज के दिल और दिमाग में आना चाहिए: उपराष्ट्रपति;
धार्मिक नेताओं से सभी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में काम करने के लिए कहा
सभी के लिए समान अवसरों वाले एक समतावादी विश्व के निर्माण का आह्वान किया;
हमारा राष्ट्र विविधता और असहमति के फलने-फूलने का एक सुरक्षित स्थान होना चाहिए: उपराष्ट्रपति
हमें कभी भी विभाजित करने वाली ताकतों को एकजुट करने वाली ताकतों से ज्यादा मजबूत नहीं होने देना चाहिए: उपराष्ट्रपति;
उपराष्ट्रपति ने श्री नारायण गुरु को श्रद्धांजलि दी
उपराष्ट्रपति ने केरल के वर्कला में 87वीं शिवगिरि तीर्थयात्रा बैठक का उद्घाटन किया

उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु ने आज जाति-विहीन समाज के निर्माण का आह्वान किया और कहा कि हम जिस राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं, उसमें सभी को अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करने और परिपूर्ण जीवन बिताने के लिए समान अवसर मिलने चाहिए।

वे आज केरल के वर्कला में शिवगिरी मठ में 87 वीं शिवगिरी तीर्थयात्रा बैठक का उद्घाटन कर रहे थे।

श्री नायडु ने सभी गुरुओं, मौलवियों, बिशपों और अन्य सभी धार्मिक नेताओं से सभी प्रकार के, विशेषकर जाति के नाम पर किए जाने वाले भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में अपना प्रयास करने को कहा। उन्होंने धार्मिक नेताओं को ग्रामीण क्षेत्रों और गांवों में अधिक समय बिताने और श्री नारायण गुरु जैसे महान संतों से प्रेरणा लेते हुए दबे, कुचले और शोषित लोगों के उत्थान के लिए काम करने को कहा।

उपराष्ट्रपति ने श्री नारायण गुरु की उपस्थिति से पावन हुए शिवगिरि मठ की यात्रा को अपने लिए अत्यंत आध्यात्मिक अनुभव बताते हुए कहा कि श्री नारायण गुरु एक महान संत, समाज सुधारक, दार्शनिक और क्रांतिकारी मानवतावादी थे।

श्री नारायण गुरु के "शिक्षा के माध्यम से ज्ञान, संगठन के माध्यम से ताकत, उद्योग के माध्यम से आर्थिक स्वतंत्रता" के मंत्र को उद्धृत करते हुए श्री नायडु ने कहा कि गुरु की शिक्षाएं वर्तमान में, विशेष रूप से सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के हमारे प्रयासों के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक हैं।

श्री नायडु ने कहा कि गुरु द्वारा 'तीर्थदानम’ या तीर्थयात्रा के लिए की गई परिकल्पना का उद्देश्य ज्ञान को आत्मसात करना और दैनिक जीवन में इसका प्रयोग और प्रचार है।

यह बताते हुए कि श्री नारायण गुरु सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान और आदर करते थे, उपराष्ट्रपति ने कहा कि मानवता के लिए गुरु की यह सलाह हमेशा याद रखनी चाहिए कि 'मूल रूप में सभी धर्म समान हैं'। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने घोषणा की थी कि इंसानों के बीच धर्म या ईश्वर का कोई भेद नहीं है और लोगों से सार्वभौमिक शांति, सद्भाव और समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए हिंसा और धार्मिक संघर्षों से दूर रहने का आह्वान किया था।

यह रेखांकित करते हुए कि गुरु ने जाति व्यवस्था और लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ करने वाली अन्य सभी विभाजनकारी प्रवृत्तियों को साहसपूर्वक खारिज कर दिया, उपराष्ट्रपति ने कहा कि श्री नारायण गुरु "अद्वैत" के वास्तविक संदेश को जन मानस में वापस लाए, जिसे उन्होंने "मानव के लिए एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर" के रूप में जीवन के शक्तिशाली व्यावहारिक दर्शन में परिणत कर दिया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत को सभ्यता की पालना करने वाली, संस्कृति की जननी के रूप में माना जाता है और यह भी कहा कि इसका एक गौरवशाली अतीत था जिसके दौरान इसकी अर्थव्यवस्था फली-फूली, इसका समाज प्रबुद्ध, प्रगतिशील और समावेशी था और इसका सांस्कृतिक लोकाचार अपने श्रेष्ठतम जीवंत स्वरूप में था।

श्री नायडु ने चिंता व्यक्त की कि आर्थिक और तकनीकी मोर्चों पर उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद, राष्ट्र में अभी भी ऐसे क्षेत्र हैं, जहां जातिगत भेदभाव जैसी सामाजिक बुराइयां बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि "हमें अपने मन में जरा भी संदेह नहीं रखना चाहिए कि कहीं भी होने वाला अन्याय हर जगह न्याय के लिए खतरा है"।

उन्होंने जोर देकर कहा कि यह समय हमारे लिए आत्मावलोकन करने और व्यावहारिक कदम उठाने का है। उन्होंने कहा कि भविष्य का भारत जाति-विहीन एवं वर्ग-विहीन होना चाहिए ।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि यद्यपि हमारे संविधान ने पहले ही अस्पृश्यता के घृणित और अमानवीय व्यवहार को अपराध घोषित कर दिया है और सरकार ने कई ऐसे कानून भी बनाए हैं, परंतु इन कानूनों को सही रूप में लागू करना समाज की मानसिकता पर निर्भर करता है।

उन्होंने कहा कि “जाति व्यवस्था को समाप्त करने का आंदोलन समाज के भीतर से आरंभ होना चाहिए। यह एक बौद्धिक क्रांति, एक करुणामय क्रांति, एक मानवतावादी क्रांति होनी चाहिए।

उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि हम विभाजित करने वाली ताकतों को एकजुट करने वाली ताकतों से ज्यादा मजबूत न होने दें।

यह बताते हुए कि गुरु का दृष्टिकोण मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक परिवर्तन के माध्यम से न कि मजबूरी और जबरदस्ती के माध्यम से सुधार लाने का था, उपराष्ट्रपति ने उम्मीद जताई कि गुरु का ज्ञान हमें मजबूत, संगठित, शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण समाज के निर्माण के हमारे प्रयासों में मार्गदर्शन प्रदान करता रहेगा।

इस अवसर पर केरल के माननीय राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान, माननीय केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री श्री वी. मुरलीधरन, सहकारिता, पर्यटन और देवासोम मंत्री श्री कड़कम्पल्ली सुरेन्द्रन, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री श्री ओमन चांडी और केरल विधानसभा के सदस्य और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे।

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