उपराष्ट्रपति ने कहा दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता भारत के आर्थिक सुधारों की सफलता गाथा है: उपराष्ट्रपति

नई दिल्ली
अगस्त 2, 2019

संहिता ने उधार लेने वालों के व्यवहार को नया रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है;
दिवाला कानून वित्तीय प्रणाली में स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है
श्री एम. वेंकैया नायडु ने दिवाला अनुसंधान फाउंडेशन का उद्घाटन किया

भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु ने कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता पारित करना भारतीय आर्थिक सुधारों की सफलता की गाथाओं में से एक है और इस संहिता ने उधार लेने वालों के व्यवहार को नया रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

उपराष्ट्रपति ने आज नई दिल्ली में दिवाला अनुसंधान फाउंडेशन (आईआरएफ) का उद्घाटन करने के बाद कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता (आईबीसी) ने ऋणदाताओं और कर्जदारों के बीच बेहतर बातचीत के लिए मंच तैयार करने में सहायता प्रदान की है।

उपराष्ट्रपति ने दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि "1 दिसम्बर, 2016 से लगभग 1500 कॉरपोरेट ऋण मामले सीआईआरपी के समक्ष आए हैं और 142 ऋण मामलों को पहले ही बंद कर दिया गया है, जबकि 63 मामलों को वापस ले लिया गया है। 302 मामलों का परिसमापन किया गया है और 72 मामलों में समाधान योजनाओं को मंजूरी दी गई है।

उपराष्ट्रपति ने जोर देते हुए कहा कि कारगर दिवाला कानून वित्तीय प्रणालियों की स्थिरता के लिए आवश्यक है और आर्थिक विकास तथा संपदा सृजन की बुनियाद है। ठोस दिवाला और शोधन अक्षमता प्रक्रिया से उद्यमियों के जोखिम या समस्याओं का जल्दी हल होगा।

उन्होंने कहा, "बिना शोधन अक्षमता कानून के यदि कोई संगठन ऋण अदा नहीं कर पाता है तो सभी दावेदार संगठन की परिसंपत्तियों में से हिस्सा लेने की दौड़ में शामिल हो जाते हैं। दावेदारों के इस संघर्ष से संगठन दिवालापन की ओर बढ़ता है, चाहे उसका व्यापार ढांचा आमतौर पर स्थिर क्यों न हो।'

उन्होंने कहा कि दिवाला प्रक्रिया का सार रूप में उद्देश्य ऐसी चुनौतियों से निपटने में मदद करना और उद्यमिता, व्यापार और जोखिम उठाने को प्रोत्साहन देना है। अत:, कानून के प्रभावों का अध्ययन करके, उसकी विशेषताओं और कमियों की नियमित रूप से जाँच करके कानून के विकास में निवेश को जारी रखना महत्वपूर्ण है।

श्री नायडु ने कहा कि अकादमिक प्रक्रिया विकसित देशों में नीति विकास, उद्योग अनुसंधान में सहायता प्रदान करने और उन्नत नवाचारी समाधान निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा कि अकादमिक जगत और उद्योग के बीच ठोस सहयोग होना चाहिए ताकि भारत में अनुसंधान संस्कृति में सुधार हो, विशेष रूप से दिवाला और शोधन अक्षमता के मामलों में।

उपराष्ट्रपति ने विविध क्षेत्रों में निवेश माहौल में सुधार करने के लिए आर्थिक सुधारों और भारत को आकर्षक निवेश गंतव्य बनाने के लिए सरकार के प्रयासों की सराहना की। इन सुधारों ने भारत की विकास गाथा में नया आयाम जोड़ा है।

इस अवसर पर वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य राज्य मंत्री श्री अनुराग ठाकुर, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण के अध्यक्ष श्री एस. जे. मुखोपाध्याय, कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्री इनजेती श्रीनिवास, आईबीबीआई के अध्यक्ष डा. एम. एस. साहू, आईआईसीए के डीजी सीईओ डा. समीर शर्मा और अन्य विशिष्टजन उपस्थित थे।

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