अनुच्छेद 370 का निराकरण एक राजनीतिक नहीं वरन एक राष्ट्रीय मुद्दा है : उपराष्ट्रपति लोगों से एकस्वर में बोलने का आह्वान किया

विजयवाड़ा,आंध्र प्रदेश
अगस्त 27, 2019

उपराष्ट्रपति ने राजनीतिक दलों से सार्वजनिक बातचीत के मानकों में सुधार करने और घटिया व्यक्तिगत छींटाकशी से बचने के लिए कहा;
मामलों के शीघ्र निपटान के लिए देश के विभिन्न भागों में अपील न्यायालय और उच्चतम न्यायालय की न्यायपीठों की स्थापना की बात कही;
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के 2 अक्तूबर तक एक बार प्रयोग में लाए जाने वाले प्लास्टिक के उपयोग को समाप्त करने के आह्वान का समर्थन किया

भारत के उपराष्ट्रपति श्री एम. वेंकैया नायडु ने जोर देकर कहा है कि अनुच्छेद 370 का निराकरण एक राजनीतिक नहीं वरन एक राष्ट्रीय मुद्दा है। उन्होंने लोगों से एकस्वर में विचार व्यक्त करने का आह्वान किया। उन्होंने सावधान करते हुए कहा कि एक पड़ोसी देश विचारों में विभेद का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दुरुपयोग कर सकता है।

श्री नायडु का उपराष्ट्रपति के रूप में दो वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के अवसर पर उनके मित्रों और शुभचिंतकों द्वारा आज विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश में आयोजित ‘मीट एंड ग्रीट’ कार्यक्रम में श्री नायडु ने कहा कि अनुच्छेद 370 के निराकरण की मांग लंबे समय से की जा रही थी क्योंकि यह देश की एकता और अखंडता से संबंधित है।

उपराष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि संविधान में अनुच्छेद 370 एक अस्थायी और सामयिक व्यवस्था मात्र थी और इसके तनुकरण से जम्मू-कश्मीर का औद्योगिकीकरण होगा, रोजगार के अवसरों का सृजन होगा तथा पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।

इस बात की ओर ध्यान दिलाते हुए कि जम्मू और कश्मीर पुर्नगठन विधेयक राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत तथा लोकसभा में 4/5 बहुमत से पारित हुआ था, उपराष्ट्रपति ने एक गैर सरकारी सदस्य के विधेयक पर 1964 में हुए वाद विवाद को याद किया जब सदस्यों ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उसके निराकरण की मांग की थी ।

उपराष्ट्रपति ने एक राष्ट्रीय दैनिक समाचार-पत्र द्वारा 1964 में प्रकाशित समाचार रिपोर्ट को उद्धृत किया और कहा कि लोकसभा में श्री प्रकाश वीर शास्त्री द्वारा उपस्थित किए गए गैर सरकारी संकल्प का श्री भागवत झा आज़ाद सहित कांग्रेस के अनेक सदस्यों, श्री सरजू पांडेय (सीपीआई), श्री के हनुमंतय्या, श्री एच. वी. कामथ(समाजवादी) तथा जम्मू-कश्मीर राज्य के सदस्यों ने भी समर्थन किया था।

श्री नायडु ने यह भी कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने 1963 में संसद में एक वाद-विवाद के दौरान कहा था कि संविधान का यह उपबंध सामयिक और अस्थायी है।

यह कहते हुए कि सबसे बड़े संसदीय लोकतंत्र के रूप में भारत को एक आदर्श और जीवंत संसदीय लोकतंत्र भी बनना चाहिए,श्री नायडु ने सार्वजनिक सेवाओं की आपूर्ति में प्रभावकारिता को बढ़ाने के लिए विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में सुधार लाने और समाज के हर वर्ग तक विकास का प्रतिफल पहुंचने की आवश्यकता सुनिश्चित करने पर बल दिया ।

साथ ही उपराष्ट्रपति ने सभी राजनीतिक दलों से अपने जनप्रतिनिधियों के लिए संसद और राज्य विधान सभाओं सहित विभिन्न स्तरों पर एक आचार संहिता विकसित करने का आह्वान किया। वे यह भी चाहते थे कि राजनीतिक दल सार्वजनिक बातचीत के मानकों में सुधार करें और एक दूसरे के प्रति घटिया व्यक्तिगत छींटाकशी से बचें और एक-दूसरे को दुश्मन नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी समझें।

श्री नायडु ने राजनेताओं के खिलाफ आपराधिक मामलों, चुनाव संबंधी याचिकाओं तथा राजनीतिक दलबदल के मामलों के शीघ्र एवं समय-बद्ध निपटान के लिए विशेष न्यायाधिकरण बनाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि इस तरह के मामलों को छह महीने से लेकर एक वर्ष की यथोचित अवधि के अंदर निपटाया जाना चाहिए।

उपराष्ट्रपति ने दलबदल से संबंधित संविधान की 10 वीं अनुसूची में खामियों को दूर करने का भी आह्वान किया। उन्होंने पीठासीन अधिकारियों द्वारा तीन महीने की निर्धारित समय सीमा में दलबदल के मामलों पर कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

श्री नायडु ने विभिन्न मामलों के शीघ्र निपटान के लिए देश के अलग-अलग भागों में अपील न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की न्यायपीठों की स्थापना किए जाने की भी वकालत की।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इस वर्ष 2 अक्तूबर तक एक बार प्रयोग में लाए जाने वाले प्लास्टिक के उपयोग को समाप्त करने के आह्वान का समर्थन करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोगों की सक्रिय भागीदारी के साथ स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ तथा प्रति बूंद-अधिक फसल जैसे अन्य कार्यक्रमों को राष्ट्रव्यापी जनांदोलन बनाया जाना चाहिए।

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