21 जुलाई, 2010 को 1730 बजे सम्मेलन कक्ष में प्रो. ए. दामोदरन द्वारा 'एनसर्किलिंग दि सीमलेस: इंडिया, क्लाइमेट चेंज, एंड दि ग्लोबल कॉमन्स' नामक पुस्तक के विमोचन समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी का अभिभाषण प्रो. दामोदरन एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव करते हैं कि सबसे पहले विश्व की आम जनता स्थानीय जनता है। उनका यह निष्कर्ष भी समान रूप से प्रभावशाली है कि यदि विश्व की आम जनता को यंत्रीकरण और सुरक्षा के दायरे से मुक्त करके स्थानीय जनता के संघर्षों से जोड़ा जाता है तो उनका बेहतर तरीके से संरक्षण किया जा सकता है। इससे आधारभूत स्तर पर महत्वपूर्ण परिवर्तन आवश्यक हो जाएगा। यह कहना आसान है परंतु करना मुश्किल है। हम राष्ट्र-राज्यों की दुनिया में रहते हैं और ये अपने भीतर लोगों एवं समुदायों को जुटा कर बने हैं। हमें अन्तर-राज्य सहयोग को समाहित करने वाले अधिराष्ट्र और उपराष्ट्रीय समूहों के प्रति नए रूझानों तथा प्राय: राष्ट्रीय संप्रभुता का क्षरण करके वैश्विक मानकों को निर्धारित करने की प्रवृति की जानकारी है। प्रो. दामोदरन एक वैकल्पिक दृष्टिकोण पेश करते हैं। 'उनका कहना है कि 'वास्तविक प्राथमिकता एक वैश्विक शासन प्रणाली का होना है जो यंत्रवाद से मुक्त है। ऐसे संगठनों को, वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए, राष्ट्रीय और स्थानीय आकांक्षाओं एवं पहचानों को महत्व प्रदान' कराना चाहिए। तथा साथ ही इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि विश्व की आम जनता के संरक्षण का मसला प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंच सके। वह इस बात का आग्रह करते हैं कि इसे वैश्विक पर्यावरणीय शासन के सिद्धांत के रूप में विविधता के माध्यम से हासिल किया जा सकता है। इसलिए, वैश्विक अवधारणा और स्थानीय अनुप्रयोग को संयोजित करना तथा साथ ही संतुलन प्राप्त करना एवं बनाए रखना चुनौती पूर्ण है। पुस्तक के अंत में दिया गया उद्धरण इसे संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत करता हैऔर पढ़ें
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